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Monday, June 10, 2013

दिल जंपिंग जपाक जम्पक जम्पक

जिस देश में क्रिकेट धर्म हो और जहाँ की जनता "ॐ क्रिकेटाय: नमः" से अपना दिन शुरू करती हो, मैं उस देश में परदेशी की तरह हूँ। यूँ तो मुझे क्रिकेट का कोई ख़ास क्रेज नहीं है लेकिन हाल के दिनों में जो कुछ हुआ, उसने मुझे क्रेजी ज़रूर कर दिया है। मैंने सोचा कि क्यों न एक बार भईया से मिल कर अपनी बात कहूँ। सो मैं उनके घर पहुँच गया।
"भईया प्रणाम"
"अरे! तुम! आओ-आओ" भईया बोले।
मैंने बैठते ही सवाल दागा, "भईया, ये क्रिकेट में क्या हो रहा है?"
"अरे कुछ नहीं। खेल है, खेल हो रहा है।"

Tuesday, May 21, 2013

राजा कौन?

इस वर्ष ठंड का ये दूसरा दौर शुरू हो चुका है। कुहासे के आगे सूर्य-देव भी लाचार नज़र आते हैं। एक गुनी-जन ने बताया कि ये ठण्ड ग्लोबल वार्मिंग का नतीजा है! उनकी बातें सुन कर मुझे भईया की याद आई। इनकी बात की तरह भईया की बातों को समझना भी मेरे लिए कठिन होता है। भईया की याद आई तो ये भी याद आया कि उनसे मिले तो अरसा हो गया है। सो मैं उनके घर पहुँच गया।
"भईया, भईया।" मैंने जोर से आवाज़ लगायी।
"कौन है?" अन्दर से भैया की आवाज़ आई। साथ ही दरवाज़ा खुला - "अरे तुम! आओ, आओ।"
"भईया  प्रणाम। आप तो आज-कल मुझे याद भी नहीं करते। कितने दिन हो गए, आप आये भी नहीं।" मैंने शिकायत की।
"ठण्ड ज्यादा थी न, इसलिए अति-आवश्यकता होने पर ही निकलता था। और सुनाओ"
"दिल्ली में इतना बड़ा काण्ड हो गया और आप मौन हैं?" मैंने उन्हें छेड़ा। 

Thursday, June 14, 2012

मैं कार्टून...

 यूँ तो मैं बहुत व्यस्त हो गया था लेकिन थोड़ी सी फुर्सत मिली कि मटकू भईया की याद आई. फिर क्या था, सुबह-सवेरे उनके घर पहुँच गया. 
"भईया प्रणाम"
"अरे कईसे हो? बहुत दिनों बाद हमारी याद आई?"
"क्या भईया, आप भी तो हमें भूल गए?" मैंने शिकायत की.
"अभी परसों ही तो तुम्हारे घर गया था. बच्चों ने बताया कि तुम आज-कल ज्यादा ही व्यस्त रहने लगे हो."
मैं थोडा लज्जित हुआ पर सँभलते हुए बोला, "अच्छा भईया, जरा ये बताइए कि जिसका लक्ष्य हमें गुदगुदाना हो, वह सर-फुटव्वल का कारण बन जाये तो आप क्या कहेंगे?"
"मैं कहूँगा, मैं हूँ कार्टून!" भईया मेरा इशारा पूरी तरह से समझ गए थे.

Friday, March 18, 2011

उम्मीद पर दुनिया कायम है!

आज सुबह-सुबह बाज़ार पहुंचा तो देखा कि रामजतन पानवाले की दुकान पर मटकू भईया "किरकिटिया चर्चा" में व्यस्त हैं. मुझे तो जैसे मौका मिल गया -
"क्या भईया? आप भी क्रिकेट में रस लेने लगे?"
"धुर बुरबक, हमरा चलता तs ई खेलवे को "राष्ट्रीय आपदा" घोषित कर देते!"
"अच्छा भईया, आपको क्या लगता है? इस बार वर्ल्ड कप भारत आएगा कि नही?"
भईया शुरू हो गए -
"एक धोबी के पास एक गधा था. धोबी उसको जी-भर के काम कराता, खाना भी नही देता और आना-कानी करने पर गधे की खूब पिटाई करता. अगल-बगल के गधों को अपने साथी की ये हालत देखी नही जाती थी. एक दिन मौका मिलने पर एक ने उससे पूछा - भाई, तुम्हारा मालिक तुम पर इतना ज़ुल्म करता है, फिर भी तुम चुप-चाप सहते हो. आखिर क्यों? भाग क्यों नही जाते?
पहला गधा दार्शनिक अंदाज़ में बोला - क्या बताऊँ दोस्त, बात तो तुम्हारी ठीक है पर मेरी एक मजबूरी है.
दूसरे ने पूछा - कैसी मजबूरी?
पहले ने कहा - मेरे मालिक की बेटी बहुत ही सुन्दर है. वो जब भी कोई बेवकूफी का काम करती है, मालिक कहता है कि अगर तू नही सुधरी तो तेरी शादी इस गधे से कर दूंगा."
भईया बोल कर यूँ गायब हो गए जैसे गधे के सर से सींग; और हम अपना सर खुजाते रहे.

Thursday, January 6, 2011

हैप्पी न्यू इयर

नए साल की पहली सुबह मैं बाज़ार की ओर निकला तो सामने से मंद-मंद मुस्काते, झूमती चाल से आते मटकू भईया दिख गए!
हाथ जोड़ कर हमने कहा - "भईया प्रणाम. हैप्पी न्यू इयर!"
अचानक भईया ने हमें गले से लगाया और बोले, "तुम्हे भी नया साल मुबारक. वैसे इस नए साल में कुछ भी नया नही होगा."
मैंने व्यंग के तीर छोड़े, "आप इतने निराशावादी क्यों बन जाते हैं?"
"तुम्ही बताओ -

जब होगा नया साल
नेता नहीं करेंगे घोटाले?
पुलिसवाला नही खायेगा माल?
बाबू नही रहेंगे बैठे-ठाले?

हत्याएं नही करेंगे माओवादी?
बराबरी का समाज होगा?
बेलगाम नही होंगे अपराधी?
क्या कानून का राज होगा?

ठण्ड से कांपते हाथों को
अलाव की गर्मी मिलेगी?
भूख से ठिठुरी अंतरियों को
भोजन की नरमी मिलेगी?

यूँ तो चचा "ग़ालिब" कह गए
दिल बहलाने को ये ख़याल अच्छा है.
होगी नयी सुबह, कई साल नए
गर दिल में अरमान सच्चा है."

मैं मुस्कुरा दिया तो भईया भी मुस्कुराने लगे. बोले,"कई राष्ट्रवादियों को लगता है कि हमें अंग्रेजी कैलेंडर छोड़ कर हिंदी कैलेंडर अपनाना चाहिए."
"आपको क्या लगता है?" मैंने सवाल दागा.
"मुझे ये लगता है कि ईसाई कैलेंडर अगर ईसा-मसीह के जन्म से शुरू होता है तो क्रिसमस १ जनवरी को क्यों नही मनाते हैं, २५ दिसंबर को क्यों मनाते हैं?"
मुझे हैरान-परेशान कर भईया फिर चले गए थे....

Sunday, October 17, 2010

नमो-नमः

आज थोड़ी फुर्सत मिली तो मटकू भईया की याद आयी। उनसे मिले तो ज़माना हो गया! मैं भी थोडा मसरूफ था, और भईया का तो खैर, कहना ही क्या? फिर तो मैंने सारा आलस छोड़ा और चल दिया भईया के घर की ओर...
मैं तेज़ क़दमों से बढ़ा चला जा रहा था कि सामने से भईया आते दीख गए!
"भईया प्रणाम"
"आनंद से रहो .....
माता रानी की कृपा तुम सबों पर बनी रहे...
इतनी तेजी से कहाँ चले?"
"आप ही से मिलने जा रहा था। बहुत दिन हो गए थे ना... आपका आशीर्वाद लिया नही था।"
भईया सिर्फ मुस्कुराये।
"कहाँ थे इतने दिनों? आप भी कभी इधर आये नही?" मैंने उलाहना दिया।
"अरे भाई, मैं भी दुर्गा-पूजा का आनंद ले रहा था! नए कपडे खरीदे, जूता खरीदा, नयी घडी ली.... और हाँ, नया मोबाइल भी लिया!" भईया बिलकुल बच्चों की तरह चहक रहे थे! उनका ये रूप मेरे लिए भी नया था!
"पत्नी-बच्चों के संग इस बार घूमा भी खूब!"
"क्या-क्या देखे?"
"अरे भाई, पूजा की रौनक देखी, श्रधालुओं का रेला देखा, चारों ओर भीड़ देखी, और साथ मेला देखा।"
"आप तो कविता करने लगे।" मैं मुस्कुराया।
"नही मेरे भाई, मैंने और भी बहुत कुछ देखा।
ज़बरदस्ती लिया जाने वाला चंदा देखा,
पंडाल के नाम पर गोरखधंधा देखा,
लोगों की कतार की परवाह किये बिना
पिछले दरवाज़े से, माँ का भोग बिकते देखा
पुलिस रही मौन, पूजा-समिती वालों को
ज़बरदस्ती गाडी रोक कर, 'पार्किंग' वसूलते देखा
गाड़ी पर सवार हो, भोंपू बजाते बाईकर्स को
माँ की भक्ति का माखौल उड़ाते देखा।"
भईया अचानक से गंभीर हो गए थे।
"मैंने एक और भी चीज़ देखी।"
"क्या?"
"एक बच्ची... चार-पांच साल की। रस्सी पर करतब दिखा रही थी। उसके माता-पिता ढोलक बजा रहे थे। दिल में आया कि उन्हें डांटू... खेलने की उम्र में काम करवा रहे हो?"
"फिर आपने क्या किया?"
"ई बताओ की हम तुमको समझदार लगते हैं कि बुरबक?" भईया ने पलटवार किया था। मैं भौंचक रह गया।
"क्या भईया आप भी? अरे आप से ज्यादा समझदार कोई है?"
"इसी लिए हम उसकी कटोरी में दस रुपये डाल आये......."
भईया की नज़रें झुक गयी थी। कुछ छ्णों तक यूँ ही रहने के बाद वो तेज़ी से वहां से चले गए और अपने दिल का तूफ़ान मेरे दिल में उतार गए।

Saturday, May 29, 2010

अथ श्रीखैनी कथा

सुबह सवेरे पान की दूकान पर मटकू भईया दिख गए। उनसे मिले लम्बा समय हो गया था। अतः सोचा कि 'मौका भी है, दस्तूर भी' ऐसे मौके को हाथ से क्यों जाने दूं?
"भईया प्रणाम"
"आनंदित रहो"
"ये क्या भईया? सारी दुनिया तम्बाकू के दुष्प्रभावों की बात कर रही है, तम्बाकू को 'बाई-बाई' करने को कह रही है और एक आप हैं कि..... सुबह सवेरे पान की गुमटी पर नज़र आ रहे हैं?"
एक क्षण को लगा कि भईया की भृकुटी तनी, पर दूसरे ही पल वो मुस्कुराते नज़र आये।
"...तो आज भाषण पिलाने के मूड में हो?"
मैं हँसने लगा। भईया भी हँसने लगे।
"एक बात जानते हो? भारत के कितने किसानों के परिवार इस नगदी फसल के भरोसे चलते हैं? कितने पेट में ये अनाज बन कर जाता है? कितने बच्चों के हाथों में पकड़ी किताब के रूप में ढल जाता है? कितनी मरीजों के दवा का बिल चुकाता है?"
"नही"
"तम्बाकू बुरी चीज़ है, मैं भी मानता हूँ, पर पहले इस रोज़गार पर आश्रित लोगों को वैकल्पिक रोज़गार दो, वो खुद ही ये काम बंद कर देंगे। वैसे एक मजेदार बात बताऊँ?"
"हाँ भईया, ये भी कोई पूछने वाली बात है?"
"खैनी (तम्बाकू) भिखारी को भी ऊपर होने का एहसास कराती है और हाँ, देश की एकता और अखंडता कायम रखने में इसका बड़ा योगदान है।"
इस अजीबो-गरीब बात से चौंकना लाजिमी था, सो मैंने भी रस्म निभा दी।
"वो कैसे?"
"देखो, जब तुम किसी को कुछ देते हो तो दाता का हाथ ऊपर होता है और लेने वाले का हाथ नीचे होता है, है कि नही?"
"बिलकुल ठीक"
"लेकिन क्या तुमने कभी देखा है कि जब कोई किसी को खैनी देता है तो लेनेवाला देनेवाले की खुली हथेली पर रखी खैनी को अपनी चुटकी में उठता है? तो लेनेवाले का हाथ ऊपर हुआ कि नही?"
"और भईया, देश की एकता ...."
"हाँ सुनो।" मेरी बात बीच में ही काट कर भईया बोले।
"जब एक खैनी बनानेवाला अपनी हथेली पर तम्बाकू रगड़ता है, बाकी के खानेवाले बिना जाति-धर्म-राज्य-बोली या गोरा - काला देखे उसमे अपनी हिस्सेदारी पक्की करते हैं। बोलो सही या गलत?"
इस अद्भुत ज्ञान ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया। इस "खैनी-पुराण" के बाद मैंने दोनों हाथ जोड़े और दूकान में लटके रेडी-मेड "राजा छाप खैनी" को पूरे भक्ति-भाव से प्रणाम किया।

Sunday, February 7, 2010

भक्त और भगवान

मैं कुछ दिनों से सोच में डूबा था काफी दिन हो गए, मटकू भईया से मुलाकात नही हुई थी. आज सोचा कि चल कर मिल ही आऊँ. घर से निकला ही था कि सामने से भईया आते दिखे. मैं प्रसन्न हो गया. यूँ लगा जैसे कुआँ खुद प्यासे के पास चला आ रहा हो.

"भईया प्रणाम" मैंने कहा.
"आनंद से रहो" भईया के श्री-मुख से आशीर्वाद पा कर अच्छा लगा.
"क्या बात हो गयी भईया?" मैंने उलाहना दिया. "दिसंबर गया, जनवरी गयी और आप मुझे अब मिल रहे हो?"
"अरे कोई ख़ास बात नही है. मैं एक महीने की ट्रेनिंग लेने मुंबई गया था."
"पर वहां के हालात तो बिगड़े हुए हैं. ठाकरे-द्वय ने तो जंग छेड़ रखी है. कभी बॉलीवुड को निशाना बनाते हैं तो कभी हिन्ढी-भाषियों को. अभी IPL मसले पर भिड़े हुए हैं. आपको क्या लगता है? क्या होगा मुंबई का?"
"अरे कुछ नही होगा" भईया पूरी तरह से बेपरवाह थे.
"अच्छा भैया, ये बताइए कि राहुल गाँधी के स्वागत की तो बड़ी-बड़ी बातें हुई थी. फिर क्या हुआ? गरजनेवाले बरसे नही!"
मैंने सोचा था कि कोई तगड़ा जवाब मिलेगा पर भईया तो सिर्फ मुस्कुरा कर रह गए.
"क्या भईया? कुछ तो बोलिए. यहाँ बोलनेवाले क्या-क्या नही बोल जाते हैं. अपनी लोकप्रियता का नाजायज़ फायदा उठाते हैं." मैंने भईया को उकसाया.
भईया ने धीरे से मेरे कंधे पर हाथ रखा और बोले, "भक्त है तो भगवान है."
वो तो धीरे से आगे बढ़ गए पर मैं सोचता रहा.

Saturday, October 3, 2009

सच का सामना

"भैया प्रणाम. क्या बात है? गाँधी-जयंती के दिन उदास?"
"आओ-आओ. उदास नही हूँ, बस ज़रा सोच में डूबा हूँ."
मटकू भैया के तेवर देख मैं हैरान था. जलेबी जैसे सीधे-सादे हमारे भैया को क्या हो गया? शक हुआ तो रहा नही गया,
"भैया, आपकी तबियत तो ठीक है?"
"आज एक अजीब वाकया हुआ. हमलोग बाज़ार से आ रहे थे. इतने में क्या देखता हूँ कि एक आदमी गांधीजी की तरह धोती बांधे, चश्मा पहने हाथों में तिरंगा लिए नंगे पांव शान से चला जा रहा है. हमरा बिटवा बोला - पापा देखो. वो आदमी गांधीजी के 'fancy dress' में जा रहा है."
"फिर क्या हुआ?" अब मेरे मन में भी उत्सुकता जागने लगी.
" फिर क्या... पता नही क्यों, हमरे मुहं से निकल गया - गांधीजी के ड्रेस में fancy क्या है?"
"फिर क्या हुआ भैया?"
"हमरा बिटवा फिर बोला - पापा, देखिये! सब लोग उसको देख कर हस रहे हैं.  हमरे मुहं से अनायास फिर निकल गया - बेटा, जिस देश में सच से सामना होते ही घर टूट जाएँ, लोग आत्महत्याएं कर लें, वहां इस तरह सत्य पर लोग सिर्फ हंस ही सकते हैं. असल में वे उसपर नही, अपने आप पर हंस रहे हैं .... 'सच से भागने' की अपनी कमजोरी छुपाने के लिए."
कड़वे सच का सामना करने की हिम्मत मुझमे भी नही थी.

Thursday, July 2, 2009

तीन टांगो वाला आदमी

"मटकू भइया राम-राम"
"अचानक इ राम-राम कइसे सूझा?"

"भइया, एक किताब पढ़ रहे थे जिसमे गाँव का एक आदमी मरते समय अपने बेटा को कहता है कि
१ हमेशा छावँ में काम पर जाओ और काम से आओ
२ मुसीबत में तीन टांग वाले से मदद लो।"

"अब एक कहानी सुनो" मटकू भइया बोले।

"एक गाँव में किसी लड़के कि शादी थी। बारात की तैयारी धूम धाम से चल रही थी। साथ ही लड़की-पक्ष कि एक विचित्र शर्त भी चर्चा में थी - बारात में सारे जवान होंगे! खैर, जब बारात चलने लगी तो एक बूढा आ कर साथ चलने कि जिद्द करने लगा। वैसे तो उसे कोई भी ले जाने को तैयार नही था पर उसकी जिद्द के आगे जवानों की एक न चली। बूढा बस की छत पर जा कर लेट गया। बारात पहुँची तो उसका स्वागत धूम-धाम से हुआ। जवानों ने आँख बचा कर बूढे-बाबा के लिए भी पकवानों कि व्यवस्था कर दी।
जब लड़का मंडप पर बैठ गया तो लडकी वालों ने एक और विचित्र शर्त सामने रखी। कहा गया कि गाँव में जो तालाब है, उसे लड़के-वाले दूध से भर दें, तभी शादी होगी। कुछ अति-उत्साही लड़के तालाब देखने गए पर उसे देख कर उनके होश उड़ गए। वह काफी बड़ा तालाब था! सरे लोग बस के पास विचार करने में लगे थे। उनको परेशान
देख बूढे-बाबा बोले - कोई परेशानी है क्या? पहले तो किसी ने उन पर गौर नही किया पर फिर सबने अपनी समस्या सुना दी। बाबा बोले - इतनी सी बात? अब तो लड़के उखर गए - इतना बड़ा तालाब है, खाली भी करना है और भरने के लिए दूध का भी इन्तेजाम करना है, आधी रात में हमारा दिमाग ख़राब हो रहा है और आप.... जैसे-तैसे सबों को शांत किया गया। फिर बाबा ने अपनी तरकीब बता दी। अब तो लड़के खुशी-खुशी मंडप पर पहुंचे - ऐसा है भाई कि हमलोगों ने तालाब देख लिया है, दूध का भी इन्तेजाम कर लिया है। अब लड़की-वालों की जिम्मेदारी है कि जल्दी से तालाब से पानी निकाल दें ताकि हम उसमे दूध भर सकें!

यही है तीन-टांगो वाले आदमी का कमाल। कुछ समझे?"

मैं हर बार की तरह सिर्फ़ अपना सर हिलाता रह गया!

Sunday, April 19, 2009

जूता पुराण

बाज़ार गया तो जूते की दूकान में मटकू भैया दीख गए. उन्हें छेड़ने का मौका मैं कहाँ छोड़नेवाला था? छूटते ही शुरू हो गया, "क्या भैया? अब आप भी?"
"क्या हुआ?"
"मतलब अब आप भी?"
"अरे मूरख, आगे भी कुछ बोलेगा?"
मटकू भैया को गुस्सा होते देख मुझे मज़ा आने लगा था लेकिन सोये शेर के साथ छेड़खानी तभी तक अच्छी जब तक वो सोया हुआ है.... वरना तो आप समझ ही गए होंगे.
"भैया, बुश से शुरु हुआ सिलसिला PM-in-waiting अडवाणी तक पहुँच गया है..... पर आप किस पर खफा हैं?"
भैया मेरा इशारा समझ कर हँसने लगे.
बोले "खफा तो पब्लिक है भाई.... अब पब्लिक को भाषण नही, रासन चाहिए. जो देगा, उ वोटवा पायेगा, अ नही ता जूता खायेगा."
हम दोनों साथ में हंस पड़े.

Tuesday, March 24, 2009

दिल है छोटा सा.. छोटी सी आशा..

बैंक गया तो मटकू भैया मिल गयेI
दुआ-सलाम के बाद मैने उनको अपनी मुफ्त की सलाह दे डाली, "भैया, अच्छा हुआ आप मिल गयेI आज ही टाटा की 'नैनो' आई हैI आप भी एक ले लोI"
"बात तो तुम बहुत अच्छा कहे हो, पर तुम्हे तीन बातें बोलता हूँI"
"क्या भैया?"
"पहली ये कि एक लाख गाड़ी के लिए एक-एक लाख का बुकिंग अमाउंट जमा होने पर टाटा को कम-से-कम कितने करोड़ मिलेंगे, कभी सोचा है?"
"नही भैया..."
"दूसरी ये कि जब बड़े-बड़े खिलाड़ी लग्ज़री गाड़ी पर ध्यान लगाए बैठे थे, टाटा ने आम उपभोक्ता की उमीद से आगे जा कर उनके सपनो को पंख दिएI उनके छोटे से दिल की छोटी सी आशा की गाड़ी के रूप में 'नैनो' पेश किया...है कि नही?"
"और तीसरी बात भैया?"
"गाड़ी तो आ गयी, बिकेगी भी खूब... पर सड़क के गड्ढे और अतिक्रमण करते वाहनो, दुकानो का हमारे नेताओं के पास क्या समाधान है?"
"......" मैं चुप थाI

Friday, November 28, 2008

उजाले की कोख का अँधेरा

सुबह का अखबार हाथ में आते ही सन्न रह गया। खून-ही-खून, चारों ओर। ये हो क्या रहा है? अपने ही देश में दुम दबा कर भाग रहे हैं हम, और कुछ कुत्ते शेर की मानिंद शिकार करते घूम रहे हैं।

मैंने झट मटकू भइया को फ़ोन लगाया।

"भइया प्रणाम। ये सब क्या हो रहा है?"

"क्या कहें, ई ता एक दिन होना ही था...."

"काहे भइया?"

"कलयुग में ये क्या हो रहा, तमस प्रकाश पर भारी पर रहा

दैदीप्यमान आलो की कोख से, कैसा अन्धकार पैदा हो रहा।

झुलसाती-लपलपाती ज्वाला, प्यासी है खून की

तांडव है मौत का, सरफिरों के दर्प की।

टी वी कैमरों पर नज़र आने की मारामारी चल रही है,

ब्रेकिंग न्यूज़ से TRP ब्रेक करने की तैयारी चल रही है।

नेता बोले, उनके इरादे नेक नही थे,

होते भी कैसे, हम एक नही थे।

मराठियों का महाराष्ट्र, बिहार में बिहारी बसता है,

हिन्दुस्तान में हिन्दुस्तानी नही, यही दर्द डंसता है।

हिंद के प्रकाश "दिनकर", लौट कर फिर आ जाओ,

कृष्ण की बन कर तुम वाणी, गीता पुनःश्च दोहराओ।

"क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो,

उसको क्या जो दंतहीन, विषहीन, विनीत, सरल हो।" "

Wednesday, October 22, 2008

गांधीजी की याद में....

बड़े दिनों बाद मटकू भइया फिर मिल गए। दुआ-सलाम से फारिग होते ही मैंने तीर चलाया:
"कहाँ थे भइया? आपके बिना गांधी-जयंती यूँ ही बीत गई। आज कल तो गांधीजी को कोई याद नही करता। एक आप ही हैं जो ऐसी बातें समझ सकते हैं... वरना..."
मेरी बात बीच में ही काट कर भइया बोले "गांधीजी को लोग आज भी उतना ही मानते हैं। मेरी कहानी सुनो... ड्राइविंग लाइसेंस में पता बदलवाना था... डीटीओ ऑफिस के चक्कर लगा-लगा कर थक गया। वहां का बाबु बोला कि गवाह लेकर आओ। हम उसको बोले कि अभी तो हम नया-नया वहां गए हैं, गवाह कहाँ से लायें? तो जानते हो कि क्या बोला?... बोला कि अगर गांधीजी गवाही दें तो....."
"गांधीजी की गवाही?"
"अरे हम भी अइसने बुरबक वाला सवाल कर दिए... उ ऊपर नीचे हमको देखा और बोला कि १००० रु निकालो, तब काम होगा!"
"अच्छा-अच्छा" मैं अपनी मूर्खता पर हँसने लगा। मुझे ये पहले ही समझ जाना चाहिए था।
"वैसे तुमको एक बात बताएं।" भइया शुरू हो गए। "अगर गांधीजी के अहिंसा का पालन होता तो आज दुनिया कुछ और होती। जानते हो कि अमरीका का रक्षा बजट बहुत से देशों के जीडीपी से ज़्यादा है। हम बम-बारूद पर जितना खर्च करते हैं, उतने में हम पृथ्वी से बीमारियों का नामोनिशान मिटा सकते थे, हर मुहं को रोटी दे सकते थे, हर हाथ को काम दे सकते थे।"
"एक और बात कहें... गांधीजी जिस ग्राम-स्वराज की कल्पना किए थे, उस पर चल कर न सिर्फ़ हम सबको रोज़गार दे सकते हैं बल्कि आर्थिक मंदी की आंधी से भी बच सकते हैं। अब भासन बहुत हो गया। गांधीजी से गवाही दिलवाने के बाद मेरा मूड थोड़ा ख़राब है। बाद में मिलते हैं।"

Sunday, August 10, 2008

उद्यम-सार

आज बड़े दिनों बाद मटकू भइया फिर से दीखे।
"भइया प्रणाम"
"आनंदित रहो! कहाँ था? दिख नही रहा था?"
"था तो यहीं, लेकिन इधर काम का कुछ बोझ बढ़ गया था। इसलिए देर तक काम करना पड़ रहा था। आप सुनाइए... आजकल नीतीश के सुशासन के बड़े चर्चे चल रहे हैं। अखबारों में देखा कि नरेगा की सफलता ने पंजाब में बिहारी मजदूरों की किल्लत कर दी है । "
"अब जब तुम बात निकालिए दिए हो तो तुमको एक छोटा सा कहानी सुनाते है। एक पंजाबी और एक बिहारी को एक ढाबे में रोटी बनाने की नौकरी मिली। दोनों नया था... कभी रोटी तऽ बनाया नही था। खैर... जैसे तैसे दोनों सीखने लगा। जिस दिन बिहारी का रोटी गोल बना वो कोशिश करने लगा कि रोटी कैसे बढ़िया फूले। जब रोटी फूलने लगा तऽ दिन रात यही कोशिश में लगा रहता था की रोटी और ज्यादा गोल कैसे हो... और ज्यादा कैसे फूले।"
"और पंजाबी का क्या हुआ भइया?" मैंने पुछा।
"जिस दिन पंजाबी का रोटी गोल होकर फूल गया, वो बगल में दूसरा ढाबा खोल लिया! कुछ समझा?"
मैं समझने की कोशिश करता रहा.....

Sunday, June 29, 2008

दोनों हाथ उलीचिये ......

'खट' की आवाज़ से मेरा ध्यान दरवाज़े की ओर गया तो देखा कि मटकू भइया खड़े हैं।
"भइया प्रणाम। आईए ना..." मैंने आग्रह किया।
"क्या बात है... काफी परेशान दिख रहे हो?"
"हाँ भइया.... इन्फ्लेशन ११% के पार चला गया। घर के लिए क़र्ज़ लिया था। वो अब भारी पड़ने लगा है। रिज़र्व बैंक की हाल की घोषणा के बाद तो लगता है कि ये और भी भारी हो जाएगा।"
"फिर क्या सोचा? कुछ पैसवा बचा है तो क़र्ज़ चुका दो।"
"हाँ भइया। सोचा तो है। फिर सोचता हूँ कि बैंक ज़मा पैसा पर भी तो ज्यादा ब्याज देगा! इसी उधेर-बुन में हूँ कि लोन चुका दूँ या पैसा फिक्स कर दूँ! आप क्या सलाह देते हैं?" मैंने उनके विचार जानने चाहे। हमेशा मुफ्त की सलाह देने वाले मटकू भइया पहले तो सोच में पड़े... फिर दार्शनिक अंदाज़ में बोले...
"देख बबुआ, हम ता ठहरे पुरान (पुरानी) बुद्धी वाले। फिर भी हम ऐ गो पुरान बात दोहरा देते हैं ...

ज्यों जल बाढै नाव में, घर में बाढै दाम।
दोनों हाथ उलीचिये, यही सयानो काम।।

कम कहे पर ज्यादा समझना! अब चलता हूँ।" मटकू भइया तो चल दिए पर उनकी बातें अभी तक मेरे दिलो-दिमाग में गूँज रही हैं।

Monday, June 2, 2008

जय जवान, जय किसान

शाम को बाज़ार निकला तो रास्ते में मटकू भइया मिल गए। नाम से इनको कोई भइया टाइप चीज़ समझने की गफलत मत पालियेगा। जब पैदा हुए तो नामकरण किया गया - पद्मलोचन। नाम के अनुरूप बड़े-बड़े नयन। प्यार से किसी ने कहा, "बचवा की आंखें बड़ी मटकती हैं"। बस, फिर क्या था, पद्मलोचन हो गए मटकू बबुआ। जब बड़े हुए तो हो गए मटकू भइया।
"भइया प्रणाम, कैसे हैं?"
"क्या रहेंगे बबुआ, ई कमर तोड़ महंगाई में नौकरी वाला भी ससुरा बी पी एल हो गया है। सोचो कि गरीबों का क्या होगा?"
"बी पी एल क्या?" मैं ज़रा अनजान बन गया। भइया को मेरी नादानी पर गुस्सा करने का मौका मिला, "ऐतनो नही बुझाता है क्या रे तुमको? बी पी एल माने गरीबी रेखा के नीचे वाला लोग, हिन्दी में कहेंगे लाल कार्डधारी। अब त समझिए गया होगा।"
" जी - जी"
"कहाँ जा रहा है?"
" जी, ज़रा सोचा कि कुछ सब्जियां ले लूँ। "
" थैला भर के पैसा लाया है न? पहले पॉकेट में पैसा लाते थे और थैला में सब्जी ले जाते थे। अब त ज़माना ही उल्टा हो गया है!"
"आप कहते हैं की चावल-दाल-सब्जी का भाव बढ़ गया है। फिर किसान क्यों खुदकुशी कर रहे हैं ?" मैंने मटकू भइया को छेड़ा।
"तुम लोग को बुझायेगा... अरे तुमको का लगता है... सेंसेक्स ऊपर चढ़ गया त किसानों के जिंदगी का ग्राफ ऊपर चला गया? फसल ज्यादा हो या कम, किसान दोनों तरफ़ से मरता है। कम हुआ तो क़र्ज़ चुकाने लायक भी पैसा नही आता है... ज्यादा हुआ तो फसल का दाम कम मिलता है। अब त किसानों सब चालाक हो गया है। अनाज-सब्जी छोड़ के सूरजमुखी, एलो-वेरा और गेंदा लगाने लगा है। आख़िर पैसा किसको अच्छा नही लगता है?"
"अच्छा भइया, जय जवान-जय किसान... ... ..."
"अरे तुम क्या बोलेगा," मेरी मुहं की बात मुहं में ही रह गयी। "जवान भी अब नौकरी से तौबा कर रहा है। पैसा तो पहले भी ज्यादा नही था लेकिन इज्ज़त खूब था। अब त उसी का इज्ज़त है जिसके पास पैसा है। तभी तो तेज़ विद्यार्थी फौज के बदले ऑफिस का काम पसंद करता है। आराम का आराम... और पैसा भी दुनिया भर का।"
"आपकी बात में तो दम है" मैंने कहा।
".... तुम्हारे चक्कर में मेरा भी काम गड़बड़ हो जाएगा। तुम जाओ सब्जी-मंडी... मैं चला अपने रस्ते..."