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Tuesday, November 12, 2024

क्रांति क्या है?

 जब धाराएँ विपरीत हों

उछलती कूदती तेज गति

किनारे तोड़ देने को आतुर 

धारा के विपरीत तैरना ही नही

डट कर जगह पर स्थिर रहना 

भी, किसी क्रांति से कम नही।



.

Sunday, July 25, 2021

पारिजात


 

Tuesday, April 6, 2021

शंखनाद

 जो युद्ध चाहते हैं

वो नफरत करते हैं

स्वाद, सुगंध, संगीत से

चित्त की स्थिरता से


अराजकता, कोलाहल 

भय का दावानल

लोग - डरे, सनके,

हथियार हैं उनके


स्वाद लग जाए जब

इंसानी खून का तब

आदमखोर कहलाता

पशु मार दिया जाता


रक्त पिपासु ये, इनकी

प्यास नही बुझती, जिनकी

फितरत में नफरत है

वो युद्ध चाहते हैं।















Tuesday, March 23, 2021

पानी

 पानी रखो,

पात्र मे भी

आँख मे भी


खत्म हुआ तो

शरीर मर जाएगा 

आत्मा मर जाएगी।

Sunday, March 21, 2021

कविता क्या है?

 कविता क्या है?


ढलते सूरज की लाली,

पंछियों का कलरव है।

देर रात सा सन्नाटा,

होली सा उत्सव है।


हरसिंगार की खुशबू

गुलमोहर की लाली है।

कोयल की गूँजती कूक 

बौराए आम की डाली है।


सूरज की तेज धूप 

समन्दर का शोर है।

गाँव की पगडंडी सा,

पत्थर सा कठोर है।


बूढ़े की चिंता सा,

बच्चे की हँसी है।

मन भावों को पकड़े,

उस अनंत का अंत है।


कविता क्या है?

मन ने, और मौन ने,

जो धारण किया है

वह वस्त्र है!




विश्व कविता दिवस। #worldpoetryday



Thursday, October 8, 2020

डूबता सूरज

 डूबता सूरज 


नीले आसमान को

नारंगी करता हुआ 

लाल-बैंगनी-काला

अंधेरा भरता हुआ 


डूबेगा सूरज तो

निकलेंगे सूरज कई

जुगनुओं में, दीपों में 

तारों में, ले रौशनी नई


Monday, October 5, 2020

गिद्ध

 गिद्ध

तुम नोचते

मरणोपरांत 

नोच कर मारना

मार कर नोचना 

बस इंसानो की 

खासियत है 



#truth

Sunday, September 20, 2020

दोबारा मत पूछना

 टी वी ने कहा

पूछ डाला तो 

लाइफ झिंगालाला 


तो हमने पूछा 

महँगाई घटेगी?

वे बोले - तुम हो

जिम्मेदार इसके 


आबादी बढ़ाते,

बढ़ाते ही जाते

हर एक जगह 

लाइन हो लगाते


हमने फिर पूछा 

शिक्षा हमारी 

क्यों है लचर?

क्या है बीमारी?


वे बोले - अभी 

बताया तो था

कि तुम ही हो

जिम्मेदार इसके 


हमने फिर से 

नया सवाल दागा 

स्वास्थ्य व्यवस्था 

किधर है भागा?


वे गुस्सा हो गए

कितनी बार बताऊँ

कि तुम ही हो

जिम्मेदार इसके


गंदगी फैलाते तुम

तंबाकू चबाते तुम

खुद दवाईयाँ खरीद 

डाक्टर बनते तुम 


हमने किया अपने

ब्रह्मास्त्र का वार

क्यों नहीं है काबू

देश में भ्रष्टाचार?


इस बार तो वे बस

मुस्कराए, फिर हँसे

अबकी बार तुम

बिलकुल सही फँसे!


हाथी के दाँत हैं 

इस पर तुम सोचना 

और हाँ। खबरदार!

दोबारा मत पूछना 

Tuesday, September 8, 2020

अंतर्द्वंद

 


अनमयस्क सा आकाश 

अनासिक्त सा अंतर्मन 

ख्वाहिशों की डोर कभी

हाथ आती, छूट जाती


Saturday, August 15, 2020

आजादी

आजादी 

सोचने की 

समझने की 

सुनने की

बोलने की 


सम्मान 

व्यक्ति का

राष्ट्र का

देने की आजादी 

पाने का भी हक


समानता 

विचार में 

व्यवहार में 

भागीदारी में 

सम्मान में 


उम्मीद - कि

नेक बनेंगे 

एक बनेंगे 

एक रहेंगे 

संग चलेंगे 



चौहत्तरवें स्वतंत्रता दिवस की बधाई।

Wednesday, July 15, 2020

प्रवासी

रोटी की आस लिए
सपने कुछ पास लिए
घर गाँव जवार छोड़

आधा इधर छूट गया
आधा उधर छूट गया
माटी से मुँह को मोड़

रात दिन मजूरी की
रोटी की चिरौरी की
अपना हाड़ हाड़ तोड़

सपने तो सपने हैं
सपने कहाँ अपने हैं
सच से है कहाँ जोड़?


Monday, April 13, 2020

अखबार कह रहा है

जिस पन्ने पर छपा है
कोई भूख से मर गया
उसी पन्ने में लपेट
रोटी लाया है दुखिया

इश्तेहार है जिस पन्ने पर
सुपर-स्पेश्यलिटी का
सरकारी रूग्णालय में
उसी पन्ने पर सोए काका

जिस पन्ने पर छपा है
कन्या पूजन की बात
उसी पन्ने में लिपटी मिली
कूड़े के ढेर में नवजात

खबर छपी: नेताजी अब
नहीं सहेंगे भ्रष्टाचार
उनके काले धन की गड्डी
बंधी रखी थी उस अखबार

खबरों और पन्ने में
अजीब जंग जारी है
अखबार कह रहा है
वक्त सब पर भारी है 

Tuesday, March 10, 2020

जाने कैसी होली आई

बड़ी अनोखी होली आई
बंटे हुए कई रंग लाई
हरा है तेरा, मेरा भगवा
कहते हैं अब भाई-भाई

रंग बिरंगे चेहरे होते
रंग बदलता था न कोई
अब तो रंगा सियार हर तरफ
जाने कैसी होली आई

गली-गली में रंग थे बहते
मिलते गले, मुबारक कहते
अब मिलने से भी डर लगता
जाने कैसी होली आई

भेद भाव सब मिट जाते थे
राग द्वेष सब छंट जाते थे
मन में ईर्ष्या, रंग हाथों में
जाने कैसी होली आई

Friday, February 21, 2020

स्त्रियाँ

स्त्रियाँ
जिनके चेहरे नहीं होते 
जिनके घर भी नहीं होते 
जो बनाती हैं दुनिया को
फिर लड़ती रहती हैं ताउम्र
अपनी दुनिया बनाने को
जो हैं सृजनकर्ता 
पर मालिक नहीं हैं 
स्त्रियाँ

Tuesday, January 14, 2020

बागबाँ

बागबाँ भगवान नही,
एक इंसान ही तो है
वो चाहता है कि हों

उत्तर दिशा में दो सहेलियाँ
लाल-नारंगी बोगिनबेलिया
हरे भरे अशोक के बीच
लाल-लाल गुलमोहर पलाश

पूरब है सूरज का कोना
सूरजमुखी वहाँ है होना
तालाब में पानी कम हो
दलदल में खिले कमल हो

पश्चिम में हो मुख्य द्वार
ट्यूलिप के चार कतार
दक्षिण में चमेली के घेर
और लाल-पीले कनेर

कभी काटता है, कभी छाँटता
कभी पूरी क्यारी उखाड़ता
उसे नीले फूल बिलकुल भी
पसंद नहीं, तो लगाया नहीं

उसे फलदार वृक्ष भी
नापसंद, समय लगता है,
सेवा चाहिए, फल के लिए
फूल तो हर दिन आते हैं

उसे नील-माधव और
नीलकंठ भी नही जँचते
शेष-शैय्या शायी, श्रीपति
ही एक उसके आराथ्य हैं

उसे बच्चों से प्यार है
करता उनसे बातें खूब
बाग के बीचों बीच बने
फव्वारे की सीढियों पर

नित नए ढब, नए करतब
नए फसाने, नई कहानियाँ
बच्चे खुश, वो भी खुश
यही तो वो चाहता है

क्या करे बेचारा आखिर
बागबाँ भगवान नही
एक इंसान ही तो है

Monday, December 30, 2019

अलविदा 2019

अलविदा
गुजरे साल
बहुत दिया तुमने
अच्छा लगा, तुम्हारा यूँ
आँसू, खुशी, निराशा, आशा लाना
सहने, लड़ने, डरने, भिड़ने, तत्पर रहने
स्व को स्वनिर्मित करने का जज्बा उभारने
मुझे खुद से बेहतर बनाने के लिए, शुक्रिया।





Monday, December 23, 2019

सर्दियाँ

सर्दियाँ
मौसम नही
एक एहसास है
खुशी का, उत्सव का
अमीरों के गुलाबी शाम हैं
खनकती हँसी, हाथों में जाम है
गरीबों के लिए ठिठुरन, बुझती अलाव है
सुबह जिंदा हैं, यही उत्सव, यही घाव है।

Wednesday, December 4, 2019

सावन की धूप

सावन की धूप

आँगन में पसारे गीले कपड़े
हवा से डोलते, इधर-उधर
काले सफेद बादलों से
आँख मिचौली, खेल खेलती
छन रही सावन की धूप

मुँडेर पर बैठे कबूतर दो
रसोई में चींटियों की कतार
जुटा रहे अपना खाना
क्या पता, कब बदरा बरसे
खो जाए सावन की धूप

बरसाती हवा संग झूलते
मधुमालती के लाल-सफेद फूल
गौरैया के बच्चे, भूखे, गीले
इंतजार- माँ का, भोजन का
उनका संबल - सावन की धूप

धोकर विपुल वट वृक्ष पर्ण
छुपती गायों को गीला करती
अंबर के स्नेह रसबूँदों में
खुद को खोकर, इंद्रधनुष
बन जाती सावन की धूप

Friday, July 20, 2018

अमलतास के पीले फूल

अमलतास के पीले फूल
होड़ लेते नव अरूण से
कौन कितना हो सुनहरा 

खुशी की आभा बिखेरे
रास्ते करते हैं रौशन 
हो विटप या हो धरा

भार तज निज किसलयों का 
पुष्प का श्रृंगार करके 
ग्रीष्म भूपति बन खड़ा 

छाँव में इक साँस ले लूँ 
स्वर्ण लड़ियों को निहारूं
देखूँ जी भर के जरा

अमलतास के पीले फूल 

Tuesday, January 3, 2017

नव वर्ष की शुभकामनाएँ



वक़्त की मुट्ठी से रिसकर
लम्हा-लम्हा गिरता जाता
रुकता नहीं किसी के लिए
समय सदा ही बढ़ता जाता

जाने क्या है ये समय?
जाने किस अनंत से आता
घंटे, दिन और साल बनाता
जाने किस अनंत को जाता

सोचता हूँ, क्या समय ही
है निरपेक्ष? है सर्वव्यापी?
क्या काल-चक्र की गति पर
है टिकी दुनिया हमारी ?

कहते हैं, जब समय साथ दे
दुनिया से पहचान कराता
और समय जब रूठ जाये तो
अपनों की पहचान कराता

माना जश्न है नए साल का
इस पल को तुम खूब मनाओ
पल-पल से ही जीवन बनता
हर पल का उल्लास मनाओ