Friday, July 3, 2009

Think Again: Swine Flu

Yesterday's Hindustan Dainik had a really informative and thought provocative article. I'm posting it here. If it is not appearing correctly, the link may be of help.
 
 
 
 
 

Thursday, July 2, 2009

तीन टांगो वाला आदमी

"मटकू भइया राम-राम"
"अचानक इ राम-राम कइसे सूझा?"

"भइया, एक किताब पढ़ रहे थे जिसमे गाँव का एक आदमी मरते समय अपने बेटा को कहता है कि
१ हमेशा छावँ में काम पर जाओ और काम से आओ
२ मुसीबत में तीन टांग वाले से मदद लो।"

"अब एक कहानी सुनो" मटकू भइया बोले।

"एक गाँव में किसी लड़के कि शादी थी। बारात की तैयारी धूम धाम से चल रही थी। साथ ही लड़की-पक्ष कि एक विचित्र शर्त भी चर्चा में थी - बारात में सारे जवान होंगे! खैर, जब बारात चलने लगी तो एक बूढा आ कर साथ चलने कि जिद्द करने लगा। वैसे तो उसे कोई भी ले जाने को तैयार नही था पर उसकी जिद्द के आगे जवानों की एक न चली। बूढा बस की छत पर जा कर लेट गया। बारात पहुँची तो उसका स्वागत धूम-धाम से हुआ। जवानों ने आँख बचा कर बूढे-बाबा के लिए भी पकवानों कि व्यवस्था कर दी।
जब लड़का मंडप पर बैठ गया तो लडकी वालों ने एक और विचित्र शर्त सामने रखी। कहा गया कि गाँव में जो तालाब है, उसे लड़के-वाले दूध से भर दें, तभी शादी होगी। कुछ अति-उत्साही लड़के तालाब देखने गए पर उसे देख कर उनके होश उड़ गए। वह काफी बड़ा तालाब था! सरे लोग बस के पास विचार करने में लगे थे। उनको परेशान
देख बूढे-बाबा बोले - कोई परेशानी है क्या? पहले तो किसी ने उन पर गौर नही किया पर फिर सबने अपनी समस्या सुना दी। बाबा बोले - इतनी सी बात? अब तो लड़के उखर गए - इतना बड़ा तालाब है, खाली भी करना है और भरने के लिए दूध का भी इन्तेजाम करना है, आधी रात में हमारा दिमाग ख़राब हो रहा है और आप.... जैसे-तैसे सबों को शांत किया गया। फिर बाबा ने अपनी तरकीब बता दी। अब तो लड़के खुशी-खुशी मंडप पर पहुंचे - ऐसा है भाई कि हमलोगों ने तालाब देख लिया है, दूध का भी इन्तेजाम कर लिया है। अब लड़की-वालों की जिम्मेदारी है कि जल्दी से तालाब से पानी निकाल दें ताकि हम उसमे दूध भर सकें!

यही है तीन-टांगो वाले आदमी का कमाल। कुछ समझे?"

मैं हर बार की तरह सिर्फ़ अपना सर हिलाता रह गया!

Sunday, April 19, 2009

जूता पुराण

बाज़ार गया तो जूते की दूकान में मटकू भैया दीख गए. उन्हें छेड़ने का मौका मैं कहाँ छोड़नेवाला था? छूटते ही शुरू हो गया, "क्या भैया? अब आप भी?"
"क्या हुआ?"
"मतलब अब आप भी?"
"अरे मूरख, आगे भी कुछ बोलेगा?"
मटकू भैया को गुस्सा होते देख मुझे मज़ा आने लगा था लेकिन सोये शेर के साथ छेड़खानी तभी तक अच्छी जब तक वो सोया हुआ है.... वरना तो आप समझ ही गए होंगे.
"भैया, बुश से शुरु हुआ सिलसिला PM-in-waiting  अडवाणी तक पहुँच गया है..... पर आप किस पर खफा हैं?"
भैया मेरा इशारा समझ कर हँसने लगे.
बोले "खफा तो पब्लिक है भाई.... अब पब्लिक को भाषण नही, रासन चाहिए. जो देगा, उ वोटवा पायेगा, अ नही ता जूता खायेगा."
हम दोनों साथ में हंस पड़े.

Tuesday, March 24, 2009

दिल है छोटा सा.. छोटी सी आशा..

बैंक गया तो मटकू भैया मिल गयेI
दुआ-सलाम के बाद मैने उनको अपनी मुफ्त की सलाह दे डाली, "भैया, अच्छा हुआ आप मिल गयेI आज ही टाटा की 'नैनो' आई हैI आप भी एक ले लोI"
"बात तो तुम बहुत अच्छा कहे हो, पर तुम्हे तीन बातें बोलता हूँI"
"क्या भैया?"
"पहली ये कि एक लाख गाड़ी के लिए एक-एक लाख का बुकिंग अमाउंट जमा होने पर टाटा को कम-से-कम कितने करोड़ मिलेंगे, कभी सोचा है?"
"नही भैया..."
"दूसरी ये कि जब बड़े-बड़े खिलाड़ी लग्ज़री गाड़ी पर ध्यान लगाए बैठे थे, टाटा ने आम उपभोक्ता की उमीद से आगे जा कर उनके सपनो को पंख दिएI उनके छोटे से दिल की छोटी सी आशा की गाड़ी के रूप में 'नैनो' पेश किया...है कि नही?"
"और तीसरी बात भैया?"
"गाड़ी तो आ गयी, बिकेगी भी खूब... पर सड़क के गड्ढे और अतिक्रमण करते वाहनो, दुकानो का हमारे नेताओं के पास क्या समाधान है?"
"......" मैं चुप थाI

Tuesday, December 2, 2008

The smiling face of god!

Yesterday evening, my daughter came running, "Papa, Papa, look!" and pulled me out to show something. What I saw was a mesmerizing experience.

I'm putting up the snap I clicked. I've named it as: The smiling face of god! But before the snap, a cutting of article published in "Hindustan" (1st Dec)

Friday, November 28, 2008

उजाले की कोख का अँधेरा

सुबह का अखबार हाथ में आते ही सन्न रह गया। खून-ही-खून, चारों ओर। ये हो क्या रहा है? अपने ही देश में दुम दबा कर भाग रहे हैं हम, और कुछ कुत्ते शेर की मानिंद शिकार करते घूम रहे हैं।

मैंने झट मटकू भइया को फ़ोन लगाया।

"भइया प्रणाम। ये सब क्या हो रहा है?"

"क्या कहें, ई ता एक दिन होना ही था...."

"काहे भइया?"

"कलयुग में ये क्या हो रहा, तमस प्रकाश पर भारी पर रहा

दैदीप्यमान आलो की कोख से, कैसा अन्धकार पैदा हो रहा।

झुलसाती-लपलपाती ज्वाला, प्यासी है खून की

तांडव है मौत का, सरफिरों के दर्प की।

टी वी कैमरों पर नज़र आने की मारामारी चल रही है,

ब्रेकिंग न्यूज़ से TRP ब्रेक करने की तैयारी चल रही है।

नेता बोले, उनके इरादे नेक नही थे,

होते भी कैसे, हम एक नही थे।

मराठियों का महाराष्ट्र, बिहार में बिहारी बसता है,

हिन्दुस्तान में हिन्दुस्तानी नही, यही दर्द डंसता है।

हिंद के प्रकाश "दिनकर", लौट कर फिर आ जाओ,

कृष्ण की बन कर तुम वाणी, गीता पुनःश्च दोहराओ।

"क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो,

उसको क्या जो दंतहीन, विषहीन, विनीत, सरल हो।" "

Friday, November 7, 2008

Wings of life

A few days back, I saw my my daughter running behind something.
"What are you upto?"
"I'm trying to catch a butterfly, but am not able to. But papa, can you tell me, why do we don't see lot of butterflies these days? Earlier, they were quite a lot and I managed to catch one of them easily!"

Suddenly I recalled that an article in newspaper said that the number of sparrows in cities have gone down by around 40%! The journey of sensex has become so important for us that we seem to be more reluctant towards issues that may affect our existence. We are breaking barriers, crossing our limits. When nature strikes back, we cry in woe.

Butterflies play an important role in cross-pollination. They maintain the bio-diversity in the plant kingdom. Sparrows play an important role in controlling the population of pests and insects.

But why have they gone? The high amount of pesticides, chemicals, fuel residues (from vehicles) and wave signals of DTH, FM and mobiles interrupt with their normal life. The high noise and pollution is also forcing them to shift from cities. But who cares....

Being delicate and sensitive towards change, they are reacting to it but when will we wake up? Are these factors NOT affecting our lives? The bell is ringing. It is upto us that we wake up or ignore it.