'खट' की आवाज़ से मेरा ध्यान दरवाज़े की ओर गया तो देखा कि मटकू भइया खड़े हैं।
"भइया प्रणाम। आईए ना..." मैंने आग्रह किया।
"क्या बात है... काफी परेशान दिख रहे हो?"
"हाँ भइया.... इन्फ्लेशन ११% के पार चला गया। घर के लिए क़र्ज़ लिया था। वो अब भारी पड़ने लगा है। रिज़र्व बैंक की हाल की घोषणा के बाद तो लगता है कि ये और भी भारी हो जाएगा।"
"फिर क्या सोचा? कुछ पैसवा बचा है तो क़र्ज़ चुका दो।"
"हाँ भइया। सोचा तो है। फिर सोचता हूँ कि बैंक ज़मा पैसा पर भी तो ज्यादा ब्याज देगा! इसी उधेर-बुन में हूँ कि लोन चुका दूँ या पैसा फिक्स कर दूँ! आप क्या सलाह देते हैं?" मैंने उनके विचार जानने चाहे। हमेशा मुफ्त की सलाह देने वाले मटकू भइया पहले तो सोच में पड़े... फिर दार्शनिक अंदाज़ में बोले...
"देख बबुआ, हम ता ठहरे पुरान (पुरानी) बुद्धी वाले। फिर भी हम ऐ गो पुरान बात दोहरा देते हैं ...
ज्यों जल बाढै नाव में, घर में बाढै दाम।
दोनों हाथ उलीचिये, यही सयानो काम।।
कम कहे पर ज्यादा समझना! अब चलता हूँ।" मटकू भइया तो चल दिए पर उनकी बातें अभी तक मेरे दिलो-दिमाग में गूँज रही हैं।
Sunday, June 29, 2008
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