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Tuesday, June 8, 2021

अफ़सोस

 

दरवाजे की घंटी बजी तो रजनी बड़े ही बेमन से उठी. घंटी दुबारा बजी तो रजनी बड़बड़ाई – ऐसी भी क्या जल्दी है इसे, हुंह. लोग कुछ सेकंड इंतज़ार भी नहीं कर सकते.

दरवाजा खोला तो सामने डाकिया खड़ा था – आपकी रजिस्ट्री है मैडम. उसने लिफ़ाफा और कलम आगे बढ़ा दिया. सरकारी लिफाफे की रंगत और खुशबु ही अलग होती है. रजनी समझ गई कि इसमें उसकी तकदीर का फैसला बंद है.

 

अभी पिछले शुक्रवार ही तो उसका और अनिर्बन का तलाक हुआ है. शनिवार और रविवार की छुट्टियाँ अनिर्बन की गलतियों को याद करके कोसने में गुज़र गईं. सोमवार को ऑफिस में इस तलाक के ही चर्चे थे. होते भी क्यूँ नहीं, आखिर अनिर्बन भी तो उसी ऑफिस का एक हिस्सा है. कुछ लोगों ने रजनी को आज की आज़ाद नारी बताया तो कुछ ने उसके अकेले हो जाने का दुःख जताया. पीठ पीछे लगभग सभी ने कहा कि मारवाड़ी लड़की और बंगाली लड़के की शादी वैसे भी नहीं टिकने वाली थी. किसी ने कहा कि अच्छा हुआ इनके कोई बच्चा नहीं है, वरना उसका क्या होता? किसी ने व्यंग मारा – चार सालों के प्यार के बाद की शादी साल भर भी नहीं टिक पायी!

जितने मुहँ, उतनी बातें! घूमते-घूमते कुछ बातें रजनी के कानों तक भी आ पहुँची. जिन लोगों पर भरोसा करके उसने अपने जीवन के राज़ साझा किए थे, वे भरोसे के कच्चे और ज़ुबान के चटोर निकले. अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत? इस ज़हरीले वातावरण में अब रजनी का दम घुटने लगा था. उसने बॉस को मैसेज भेजा – “बॉस, मेरी तबियत ठीक नहीं है. मैं घर जा रही हूँ. शायद कल भी न आ पाऊँ.”

“ओके”, बॉस का जवाब तुरंत ही आ गया.

 

आज बुधवार है. अदालत से तलाकनामा मंज़ूर हो कर आ गया है. रजनी को तो वैसे खुश होना चाहिए था पर जाने क्यों, बार-बार उसकी आँखें गंगा-जमुना हुआ चाहती हैं.

 

Saturday, June 5, 2021

कीमत


फ़ोन की घंटी लगातार बज रही थी। अमर ने सरसरी निगाह डाली। कोई अनजान सा नंबर था। उसने फोन को पलट कर रख दिया। घंटी फिर बजी। वही नंबर, अनजाना सा। उसने फिर से फ़ोन को पलट कर रख दिया। घंटी जब तीसरी बार बजी तो वह झल्ला उठा – “हेल्लो”।
पता नहीं फ़ोन करने वाले ने क्या कहा पर अमर के चेहरे के भाव कई बार बदले।
“रॉंग नंबर”, अमर ने फ़ोन काट दिया।
वो कौन था जो इतनी बार फोन कर रहा था? आखिर वह क्या चाहता था?
"कौन था?" रसोईघर से बेला की आवाज आई।
"कोई नही। यूँ ही, कोई अनजान नंबर था।"
"अनजान था, तो इतनी देर तक क्या बातें कर रहे थे?" बेला अब अमर के सामने खड़ी थी।
"अरे कुछ नही। बस कुछ मांग रहा था।" अमर ने बात को टालने की कोशिश की। मगर बेला और भी घबरा गई।
"क्या? क्या मांग रहा था? कहीं हर्ष भैया तो नही थे? घर का किराया मांग रहे थे क्या?"
"नही बाबा, अब नाश्ता दे दो। थक गया हूँ।"

अमर एक फैक्ट्री में काम करता था। कोरोना की वजह से लॉकडाउन हुआ तो मालिक ने लॉकआउट कर दिया। नौकरी तो गई ही, आमद के साधन भी गए। एक साल यूँ गुजरा, मानो एक उम्र हो। पेट की आग जब जलाती है तो तन, मन, इच्छाएँ, आत्मसम्मान, सब जला डालती है। अमर अभी अभी दूध और अखबार वितरित कर लौटा था। दस बजे से भोजन के तलबगारों के आनलाइन आर्डर की तामील में लग जाएगा। कोई खाएगा, तभी तो उसका परिवार भी खाएगा!

दस बजे दरवाजे की घंटी बजी। दरवाजा खोला तो सामने सहज खड़ा था।
"अंकल, ये आपके बारे में पूछ रहे थे।" वह दो अजनबियों के सामने से हट गया। पीछे खड़े दोनों व्यक्तियों ने नमस्कार मे अपने हाथ जोड़े। अमर ने इन्हें कभी नही देखा था।
“जी, कहिए”
“हमने ही आपको फ़ोन किया था। पता चला कि आप कोरोना को मात दे चुके हैं। अब आप ही हमारी उम्मीद हैं।”
“देखिए, मैंने पहले ही कहा है कि आप गलत नंबर डायल कर रहे हैं।”
शोरगुल सुन कर बेला भी आ गयी थी। उसने अमर को टोका – “आप सभी अन्दर क्यों नहीं आ जाते? सहज बेटा धन्यवाद, इन्हें घर तक लाने के लिए।” सभी अब अन्दर आ चुके थे।
“कोई मुझे भी बताएगा कि माजरा क्या है?” बेला उत्सुक भी थी, नाराज़ भी।
“देखिए बहन जी, मेरा बेटा कोरोना संक्रमित है। डॉक्टर ने कहा है कि प्लाज्मा थेरेपी ही उसकी जान बचा सकता है। अमर जी का ब्लड ग्रुप मेरे बेटे के ब्लड ग्रुप से मिलता है। अगर आप खून दें तो मेरे बेटे की जान बच जाएगी।” एक व्यक्ति हाथ जोड़ भावुक हो गया था।
“देखिए भाई साहब। मैंने पहले ही कह दिया है – ये नहीं हो पाएगा।”
“ऐसा मत कहिए भैया। आप अपनी संतान के बारे में सोचे। अगर मेरी स्थिति में आप होते तो आपको कैसा लगता।”
“हमारी कोई संतान नहीं है”, बेला ने कुछ बुझे से स्वर में कहा। किन्तु अमर का स्वर अब तेज़ हो गया –
“एक शर्त है”
“क्या?”
“सत्तर हज़ार रुपये लगेंगे, वो भी पेशगी। मंज़ूर हो तो बोलो वरना अपना रास्ता नापो।”


2
“आपको क्या ज़रुरत थी उनसे ऐसे बात करने की?” बेला ने अमर को पानी का ग्लास देते हुए पूछा। अमर ने बेला का हाथ थाम लिया। ज़िन्दगी का दर्द दोनों की आँखों से छलक आया।
“चलो, अब भोजन तो परोसो। क्या मुझे भूखा ही मारोगी? पूरी दुनिया को भोजन पहुंचाते-पहुंचाते मुझे भी भूख लग आई है।” अमर ने बात सँभालने की गरज से कहा। अभी दोनों खाने बैठे ही थे कि दरवाजे की घंटी फिर से बजी।
“मैं देखती हूँ।” बेला ने कहा।
“नहीं-नहीं। मैं देख लेता हूँ। तुम खाती रहो।”
अमर ने दरवाजा खोला। सामने चार लोग खड़े थे। दो तो वही थे, जो सुबह आये थे। दो नए थे।
“आप लोग फिर आ गए?”
“जरा एक मिनट हमारी बात तो सुनिए।” एक अजनबी बोला।
“ऐसा है कि हम अभी-अभी भोजन के लिए बैठे हैं श्रीमान। तो बेहतर हो यदि आप इंतज़ार करें।”
“पर हम आपका ज्यादा समय नहीं लेंगे।”
“इंतज़ार करना है या लौट जाना है, आप पर निर्भर है।” अमर ने दरवाज़ा बंद कर लिया।

3
“अगर आप वही बात कहने आये हैं, तो मेरा जवाब अब भी वही है। मंज़ूर हो तो हाँ, वरना अपना और मेरा समय बर्बाद न करें।” अमर ने उन्हें देखते ही कहा।
“अरे-अरे, आप तो नाराज़ हो गए।” एक अजनबी बोला। “पहले मैं अपना परिचय तो दे दूं। मैं विमल। मेरी दवा की दूकान है – विमल मेडिकल। आपने आते-जाते देखा होगा। और ये हैं सर्वेश्वर। स्थानीय थाने के दारोगा हैं।”
“नमस्कार”, सर्वेश्वर ने हाथ जोड़े। “आप बड़े गरम मिजाज मालूम होते हैं। अरे भई, एक ज़िन्दगी का सवाल है।”
“यदि मैं गरम मिजाज का हूँ तो आप यहाँ आये ही क्यों? मैंने तो आपको नहीं बुलाया?” अमर को भी गुस्सा आ गया। “मैंने अपनी बात कह दी है। अगर आपके लिए ज़िन्दगी का सवाल बड़ा है तो पैसे का सवाल छोटा होना चाहिए।”
“अमर जी, पैसे का क्या है? हाथ का मैल है। आज है, कल नहीं। आखिर इंसानियत भी कोई चीज़ होती है।” विमल बोला।
“ऐसा है विमल बाबू कि आपके मुहं से इंसानियत की बात अच्छी नहीं लगती। कल ही आपकी दूकान से २० रूपए का मास्क २५ में खरीद कर आया हूँ। आपके कर्मचारी ने रसीद देने से भी मना कर दिया था। तो गैर-कानूनी काम करने वाले, इंसानियत की बात करते भले नहीं लगते। अगर आपको इनसे इतनी ही हमदर्दी है तो आप ही पैसे दे दो। वैसे भी, आपके लिए तो पैसा हाथ का मैल है। इस विकट घड़ी में भी आप जनता को लूटने से बाज नहीं आए। आपदा में अवसर जो तलाश लिया था आपने! तो पैसे की कमी तो होगी नहीं। कुछ पुण्य ही मिल जाये!”
अमर के कटाक्ष ने चारों के घमंड को चूर कर दिया था। मगर वो घमंड ही क्या जो आपको सर्वश्रेष्ठ मानने का दुस्साहस ने दे! बड़ी ही विचित्र बात है। जब घमंड हावी हो जाए, तो विरोधी का आत्मसम्मान भी घमंड लगने लगता है और अपना घमंड भी आत्मसम्मान। तर्क के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं। संवाद एकतरफा हो जाता है। मजा तो तब है जब घमंड को पद और पैसे की ताकत का सहारा मिल जाए। फिर तो जीत ही एकमेव विकल्प रह जाता है।

“ऐसा है अमर, हम इस इलाके के दारोगा हैं। दारोगा होकर कुछ माँग रहे हैं। और तुम मना कर रहे हो।” दारोगा को गुस्सा तो आ गया था लेकिन उसने शब्दों को संभाला।

“दारोगा जी, आप “कुछ” नहीं माँग रहे, बल्कि मेरे शरीर का खून माँग रहे हैं।” अमर ने “कुछ” शब्द पर जोर देकर कहा। “और हाँ, आप दारोगा ही हैं, कोई भगवान नहीं।”

“अब तुम हद से आगे जा रहे हो। दारोगा हैं हम। दारोगा! इतने केस में अन्दर करेंगे कि निकल नहीं पाओगे। जिद छोड़ दो।” सर्वेश्वर के पद का मद उस पर हावी हो गया। विमल ने बात सँभालने की कोशिश की –
“अमर जी, आप तीस हज़ार ले लो। हम इस से ज्यादा नहीं दे पाएंगे। आपको इंसानियत का वास्ता।”

“सुनिए दारोगा जी,” अमर ने विमल को अनसुना करते हुए कहा। “जब मैं अस्पताल में भर्ती हुआ तो सत्तर हज़ार का बिल थमा दिया गया। बिल में कई खामियाँ थीं। मैंने कई लोगों से मदद माँगी। किसी ने बिल ठीक करवाने में मदद नहीं की। अस्पताल से यह भी अनुरोध किया कि बिल थोड़ा कम कर दिया जाए। किसी ने मेरी न सुनी। मुझे कुछ नहीं सूझा तो बाज़ार से पाँच टका ब्याज पर पैसे उठाए। पाँच टका ब्याज समझते हैं आप? सौ के मूूल पर हर महीना पाँच रूपया! मूूल न दे पाया तो साल का साठ प्रतिशत! आप तो दारोगा हैं! अस्पताल वालों को अन्दर करेंगे? या फिर उस सूदखोर को? दूर क्यों जाना? मैं इसी विमल के खिलाफ बीस का मास्क पच्चीस में बेचने की शिकायत, लिखित में दूंगा। है आपमें हिम्मत? करेंगे इस पर कार्रवाई?”

“आप लोग अब सुनिए। आप ने मेरा काफी समय बर्बाद कर दिया है। अब आप लाख रूपया भी दें, तब भी मैं अपना खून नहीं दूँगा।” अमर ने नमस्कार में हाथ जोड़ दिए। एक व्यक्ति ने कुछ कहना चाहा पर अमर ने उन्हें बाहर निकल जाने का इशारा किया।

4
दरवाज़े की घंटी फिर बजी। अब अमर को गुस्सा आ गया। उसने दरवाज़ा खोला। वही दो लोग, सुबह वाले। अमर कुछ बोल पाता, इस से पहले उन्होंने अमर के हाथ में एक लिफाफा रख दिया।
“आप लोग फिर आ गए?” अमर का गुस्सा अब भी सातवें आसमान पर था।
“आप एक बार लिफाफा देख तो लें।” एक ने चिरौरी की। अमर ने लिफाफा खोला। तीस हज़ार रूपए थे। एक पत्र भी था। अमर ने उसे खोला। वह एक नियुक्ति पत्र था - अमर के नाम। अमर को पंद्रह हज़ार की नौकरी का प्रस्ताव दिया गया था।
"ये क्या है?"
“मना मत करना दोस्त। भूल हो गई जो तुम्हारी हालत नहीं समझ पाया। मेरी कंपनी में जगह खाली थी। मालिक बड़ी ही मुश्किल से माना। जितना हो सका, लाया हूँ। आगे तुम्हारी मर्जी।” वो अजनबी, जो शायद बच्चे का पिता था, हाथ जोड़, उम्मीद लगाए अमर को देख रहा था।
अमर निःशब्द था। एक पिता भले ही ऊपर से सख्त हो पर संतान के लिए वो कहाँ तक झुक जाता है, ये अमर को आज समझ आया। इंसान का सर्वोच्च धर्म इंसानियत है। जिसमे इंसानियत नहीं, वह इंसान नहीं। अमर ने लिफाफा उन्हें वापस कर दिया।
“इसकी जरूरत नहीं। आप थोड़ी देर इंतज़ार करें। मैं अभी आपके साथ चलता हूँ।”
“हमें आपकी परेशानियों की जानकारी हुई तो हम खुद को रोक नहीं पाए। ये खून की कीमत नहीं है, भाई का प्यार है। मना मत करिए। अपनी हैसियत कम ही सही, मगर वक़्त पर अपने भाई के साथ खड़ा नहीं हो पाया तो क्या फायदा?”
सच भी है। आपदा है। लोग अवसर तलाशेंगे। कुछ लोग लूट का, कुछ इंसानियत का। कुछ विरले होंगे जो हाथ थामेंगे, सहारा बनेंगे। उनकी बदौलत इस बात पर विश्वास बना रहेगा कि दुनिया अभी ख़त्म नहीं होगी।

Tuesday, September 27, 2016

रोको मत जाने दो


1
मैं लगभग दौड़ते हुए रेलवे ओवर ब्रिज पर चढ़ा. तभी ट्रेन ने आवाज़ दी और धीरे से आगे बढ़ी. मैंने अपनी रफ़्तार बढाई पर तेजी से सरकती हुई साढ़े-छः बजे की सियालदह लोकल मेरे सामने से निकल गई. मैं खीज और हताशा में उसे जाते देखता रहा. मैंने सोचा – “अगली ट्रेन बीस मिनट बाद आने वाली थी. पता नहीं तब तक मैं क्या करूँगा.” मैंने अपने अगल-बगल का जायजा लिया. कंधे पर बैग लटकाए स्त्री-पुरुष अपने-अपने काम-धंधे पर जाने को तैयार हैं. चाय के ठेलों पर चाय-बन का नाश्ता करने वालों की लाइन लगी है. एक और ठेले पर ब्रेड-ऑमलेट मिल रहा है. इन दोनों के आस-पास कुछ आवारा कुत्ते खाना पाने की चाहत लिए घूम रहे हैं. स्टेशन के प्रवेश द्वार से जितने यात्री आ रहे हैं, उससे ज्यादा लोग पटरियों के किनारे-किनारे चल कर आ रहे हैं.

तभी घोषणा हुई कि हावड़ा जाने वाली लोकल दो नंबर प्लेटफार्म पर आने वाली है. प्लेटफार्म की सरगर्मी अचानक से बढ़ गई. जो बैठे थे, वे खड़े हो कर ट्रेन आने का इंतज़ार करने लगे. जो खड़े थे, वे ट्रेन की दिशा में झाँक रहे हैं. मेरे मन में विचार आया कि यहाँ बैठे रहने से अच्छा है कि क्यों न हावड़ा चला जाये. ट्रेन आने की देर थी कि मैं धक्का-मुक्की कर सामने के दरवाज़े से प्रवेश कर गया. मेरी किस्मत अच्छी है कि मुझे एक सीट मिल गई. मैंने सोचा – चलो अच्छा हुआ कि बैठने की व्यवस्था हो गई वरना तो घंटा भर खड़े-खड़े ही जाना पड़ता. इसी भीड़ से बचने के लिए मैं साढ़े-छः की लोकल लेता हूँ वरना तो मेरा ऑफिस साढ़े-नौ बजे खुलता है.

ट्रेन के खुलते ही ताज़ी हवा के झोंके ने भीड़ से राहत दी. मेरे अगल-बगल ज्यादातर खोमचेवाले हैं. उन्ही के बीच मेरे सामने की सीट पर एक कन्या बैठी है, सहमी सी, सकुचाई सी, अपने दोनों हाथों से अपने बैग को सीने से भींचे हुए, मानो उसका सारा खज़ाना उसी में हो. उसके घुंघराले बाल और मछली जैसी बड़ी-बड़ी आँखें उसके बंगाली होने की पुष्टि कर रही हैं. पर ये हिरनी-सी चंचल आँखें इतनी डरी हुई सी क्यों हैं? अचानक बगल से जब दूसरी ट्रेन धड़धड़ाती हुई गुज़री तो मैं अपने ख्यालों से वर्तमान में आ गया. हावड़ा में हम साथ ही उतरे पर भीड़ ने उसे अपने में यूँ समेट लिया कि बस....

 

  

 

2

आज सात दिन हो गए जब से मैंने छः-चालीस की हावड़ा लोकल को ही अपना बना लिया है. इंजन से तीसरे डब्बे में ही हर दिन वो दिखाई दे जाती है. फिर हावड़ा उतरना, स्टीमर से घाट पार करना और फिर लोकल बस का सफ़र, यही सिलसिला चल रहा है. अरे, ये क्या? आज हावड़ा स्टेशन आने वाला है पर लगता है उसे उतरने की कोई जल्दी नहीं है. अच्छा है! आज बात करने का मौका मिलेगा.

प्लेटफार्म पर ट्रेन के रुकते ही यात्री उतर कर यूँ भागने लगे मानो किसी ने उन्हें ये कह रखा हो कि ट्रेन में बम है. हो सकता है मैं अतिशयोक्ति कर रहा होऊं पर अगर आपने कोलकाता की ओर आनेवाली किसी लोकल में सफ़र किया होगा तो इस बात को समझ जायेंगे. भीड़ ने मुझे भी ट्रेन से उतार दिया है. प्लेटफार्म पर मेरी आँखें उसे ही ढूंढ रही हैं. वो रही, वहाँ. धीमे निराश कदमों से निकास-द्वार की ओर बढती हुई. मैं उसके पीछे दौड़ा.

“आज भीड़ कुछ ज्यादा ही थी.”

उसने प्रश्नवाचक निगाहों से मुझे देखा. मैंने अपना प्रश्न सुधारा –

“आपनी कोथाय जाबेन?”

उसकी आँखों में आँसू भर आये –

“कोथाय जाबो? अब जाने को कोई जगह नहीं.”

“क्यों? क्या हुआ?”

“मालिक ने नौकरी से निकाल दिया है. माँ-बाबा को कुछ नहीं बताया. हर दिन की तरह काम पर निकल आई.”

“आप चाय पियेंगी?”

इस एक प्रश्न ने मेरे लिए संभावनाओं के द्वार खोल दिए. उसका नाम मौनी है. बाबा डनलप की फैक्ट्री में काम करते थे. फैक्ट्री बंद हो जाने से बाबा की नौकरी चली गई. मजबूरी में गाँव जा कर खेती-बारी कर रहे हैं. स्कूल की पढाई ख़त्म कर मौनी एक प्राइवेट नौकरी कर रही थी, थी इसलिए कि अब वो भी नहीं रही. उसे डर है कि उसकी नौकरी जाने की बात सुन उसके बाबा को सदमा न लगे, इसलिए बताया नहीं.

इंसान जब मजबूर हो, तकलीफ में हो तो औरों से अपने तकलीफ की मान्यता चाहता है. ऐसे में मौनी को मेरा साथ किसी अपने के साथ की तरह महसूस हुआ. मैंने तय किया कि आज ऑफिस से छुट्टी ले लूँगा और दोनों मिल कर उसके लिए नौकरी ढूंढेंगे. मैंने परशुराम को फ़ोन लगाया –

“बॉस, आज मैं नहीं आ पाउँगा. मेरा सी एल चढ़ा दीजिएगा.”

“क्यों भई. क्या हुआ?” परशुराम ने अमरीश पुरी जैसी आवाज़ में पूछा. लंबी कद-काठी, रौबदार मूंछ और अमरीश पुरी जैसी आवाज़ के साथ-साथ वह “परशुराम” की तरह गुस्सैल भी है. मैंने झूठ बोलना मुनासिब नहीं समझा और उसे सारी बात बता दी.

“तो इसके लिए तुम्हे छुट्टी लेने की क्या जरूरत? उसे साथ लेते आओ. अगर वह एक छोटा सा इम्तिहान पास कर ले तो उसे यहीं रख लेंगे.”

बस तीन घंटे और मौनी एक अजनबी सहयात्री की जगह अब मेरी सहकर्मी थी, वो भी पिछले वेतन से तीन सौ की बढ़ोत्तरी के साथ! उसका दुःख दूर कर मुझे एक अजीब सा सुकून मिला. आज रात मैं अच्छी नींद ले सकूँगा, एक अच्छा काम जो किया था मैंने.

 

                                                

3

रात के ग्यारह बज रहे हैं और मैं अभी-अभी घर लौटा हूँ. वाह! आज का दिन भी क्या दिन था, मेरी ज़िन्दगी का यादगार दिन! आज से ठीक एक माह पहले १० मार्च को मैं मौनी से पहली बार मिला था – ट्रेन में. वैसे देखा जाए तो उसे मिलना नहीं कहते. मैंने बस उसे पहली बार देखा था. भीड़ में गुम हो जाने वाली किसी भी साधारण लड़की की तरह ही थी वो, पर कोई तो बात थी उसमें कि मैंने सियालदह लोकल छोड़ कर हावड़ा लोकल का दामन थाम लिया था.

गर्मी के दिन तो सबके लिए परेशानी भरे होते हैं पर ये कलकत्ता की गर्मी भी न, यहाँ गर्मी से ज्यादा उमस आपकी जान ले लेती है. मैंने पंखा चला दिया. खिड़की खोलते ही हवा से ज्यादा बाज़ार का शोर अंदर आने लगा. वैसे तो मुंबई के बारे में कहा जाता है कि ये शहर कभी नहीं सोता, लेकिन मैं कहता हूँ कि आप एक बार कोलकाता आ कर देखो, ये शहर भी नहीं सोता है. पसीने से तर शर्ट खूंटी पर टंगा फड़फड़ा रहा है, बिल्कुल मेरे विचारों की तरह. यादों के रेले, समुन्दर की लहरों की तरह, उठते हैं, एक दूसरे में उलझते हैं और किनारे आ कर दम तोड़ देते हैं. उनमें उलझा मैं, अपने आप में खोया हुआ, कभी मुस्कुराता हूँ, कभी गुम हो जाता हूँ.

आज पगार-दिवस था. हर नौकरी-पेशा को इस दिन संकट-मोचक श्री (लक्ष्मी) के दर्शन होते हैं. मौनी को भी आज पहली तनख्वाह मिली थी. “अमरीश पुरी” ने हम दोनों को आधे दिन की छुट्टी अपने दायित्व पर दे दी थी, इस हिदायत के साथ कि छुट्टी से एक घंटा पहले आ कर दस्तख़त कर देना तो पूरे दिन की हाज़िरी दे दूंगा. मैंने मन-ही-मन सोचा – ये अमरीश पुरी आज आलोक नाथ कैसे बन गया? पर मुझे क्या? वैसे भी, इंसान को अपने काम से काम रखना चाहिए.

एक बजे मैं और मौनी साथ निकले. हमारे ऑफिस के नीचे ही एक सड़क-छाप ढाबा है जहाँ हम सब खाना खाते हैं. आज हम दोनों आगे बढ़ कर एक रेस्त्रां में घुस गए. दाल-लुची खाते हुए मैंने मौनी से कहा –

“मौनी, बहुत दिनों से तुमसे एक बात कहना चाहता था.”

“हाँ, तो बोलो न.”

“मुझसे...” मैं ठिठका.

“मुझसे शादी करोगी?”

उसने कोई जवाब नहीं दिया. बस अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से मुझे देखती रही. मुझे लगा कि शायद मैंने कुछ गलत तो नहीं पूछ लिया. बैरा बिल लेकर आया तो उसने अपने हिस्से के पैसे देने के लिए पर्स का मुहँ नहीं खोला. मैंने इसे ही उसकी मौन स्वीकृति समझा. वहाँ से जब हम निकले तो उसने धीरे से मेरा हाथ थाम लिया. ये उसकी स्वीकृति की पूर्णता थी. हाथों में हाथें डाले हम बेवजह इधर-उधर घूमते रहे. जब थक गए तो पार्क की बेंच ने हमें सहारा दिया.

“मौनी...”

“हूँ....”

“एक बात कहूँ....”

“हूँ...”

“जब तुमने पैसे नहीं दिए, तभी मैं समझ गया कि तुम भी मुझसे प्यार करती हो.”

“इसका क्या मतलब?”

“कुछ नहीं, बस ऐसे ही...”

“ऐसे ही, कैसे ही? तुम कहना क्या चाहते हो?” उसका स्वर तेज हो गया.

“अरे बाबा कुछ भी नहीं कहना चाहता हूँ.” मैंने हथियार डालते हुए कहा.

“तुम मर्दों को औरतों का फायदा उठाना खूब आता है. जरा सी मदद क्या कर दी कि समझने लगे कि औरत उनकी गुलाम हो गई.”

“अब इसमें फायदा उठाने की बात कहाँ से आ गई?”

“कैसे नहीं आई? अगर तुम मेरी मदद नहीं करते तो तुम्हारी हिम्मत थी मुझे शादी के लिए पूछने की? बोलो... चुप क्यों हो?”

“तुम गलत समझ रही हो...”

मैं जितना समझाता, बात उतनी बिगड़ती जाती. हार कर मैंने चुप रह जाना ही श्रेयस्कर समझा. मेरी चुप्पी ने उसकी बौखलाहट बढ़ा दी. अगल-बगल से गुजरने वाले अब हमें तमाशा समझने लगे थे. मेरा संयम भी अब जवाब देने लगा था. फिर भी मैंने बात तो सँभालने के लिए मजाक किया -

“तुम्हारे माँ-बाबा ने बेकार ही तुम्हारा नाम मौनी रखा. तुम्हारा नाम तो बक-बक रखना चाहिए था.”

“देखो... मेरे माँ-बाबा को बीच में लाया तो अच्छा नहीं होगा.”

इसके बाद तो जो तू-तू मैं-मैं का सिलसिला शुरू हुआ कि मेरी चीख और उसके आँसू पर जा कर थमा. वो जा चुकी थी और मैं दोनों हाथों से अपना सर पकड़े पार्क की बेंच पर बैठा अपने आँसू छिपाने की कोशिश कर रहा था. मेरी प्रेम कहानी शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो चुकी थी.

मैं जी भर के रोया. मन हल्का हुआ तो अन्दर से आवाज़ आई – वो तुम्हारे साथ नहीं रहना चाहती. वो जाना चाहती है. उसे रोको मत, जाने दो.

मन फैसला कर चुका था. मैं उठा, हाथ-मुहँ धोये, मुस्कुराया और ऑफिस की ओर यूँ चल दिया मानो कुछ हुआ ही न हो. अन्दर घुसते ही परशुराम सर के अर्दली ने आकर खबर की कि साहब बुला रहे हैं. मन में कई तरह के विचार उमड़ने लगे. कहीं मौनी ने मेरी शिकायत तो नहीं कर दी. दुनिया भी बड़ी अजीब है, जिसकी मदद करो वही आपकी कब्र खोदने में लग जाता है. खैर, जब तीर कमान से निकल चुका हो तो पछता कर भी क्या फायदा?

अन्दर घुसते ही परशुराम सर ने बड़े प्यार से मुझे बिठाया और कहा –

“बेटा कुलंजन...”

“सर मेरा नाम मनोरंजन है, कुलंजन नहीं.” मैंने विरोध किया.

“इसलिए पूरी दुनिया का मनोरंजन कर आये?”

मैं समझ गया कि जरूर मौनी ने नमक-मिर्च लगा कर “अमरीश पुरी” से मेरी शिकायत की है. मुझे ऑफिस से निकाले जाने का उतना डर नहीं था जितना पुलिस-केस होने का था. मैं अन्दर ही अन्दर सिहर गया. हे भगवान! अब क्या होगा. फिर भी मैंने परशुराम सर को बीते एक महीने की सारी बातें तफ्सील से बता दीं. वे मुस्कुराये. फिर हँसे. फिर ठहाके लगाने लगे. उन्होंने अर्दली भेज मौनी को बुलाया. जब वो आई तो उसकी बड़ी-बड़ी आँखें सूजी हुई सी लग रही थीं. उसके व्यवहार ने एक बात तो साफ़ कर दी थी – उसने मेरी शिकायत नहीं की थी. सर के सामने वो सर झुकाए खड़ी रही. उन्होंने उससे उपस्थिति-पुस्तिका पर हस्ताक्षर करवाए और कहा –

“मौनी बेटा, आज की तुम्हारी छुट्टी. घर जाओ, आराम करो.”

मौनी ने सर को देखा, मुझे देखा और केबिन से निकल गई. सर अब मुझसे मुखातिब थे.

“तेरी बहुत इज्ज़त करती है. शायद प्यार भी करती है. उसे रोको, मत जाने दो.”

मैं समझ चुका था कि मुझे क्या करना है. उसके माँ-बाबा का आशीर्वाद लेकर जब मैं रात की साढ़े-दस की लोकल पर सवार हुआ तो लगा कि रिश्तों के मायने बदल गए हैं. मुझ अनाथ को एक परिवार मिल गया था. नींद कह रही है कि जल्दी सो जाओ. कल एक नई सुबह आने वाली है.

 

  

Saturday, August 29, 2015

शुक्रिया


 

1

सुबह के आठ बजे हैं। यूँ तो इस वक़्त जीवन के हाथों में चाय का प्याला होता है किन्तु आज ऐसा नहीं है। बॉस ने कल ही ताकीद की थी कि कल दस बजे तक चाईबासा पहुँच जाना। कंपनी के नए विपणन कार्यालय का उद्घाटन होना है। सारे इंतजामात की जिम्मेदारी जीवन के सर डाल बॉस तो निश्चिन्त थे किन्तु जीवन? बेचारा! मरता क्या न करता। सुबह से बॉस दसियों बार फ़ोन कर चुके थे। अपनी बाइक पर बैठ उसने पलट कर देखा। वर्षा दरवाज़े पर खड़ी थी।उसकी मुस्कराहट ने जीवन के अंदर मानो नवजीवन का संचार कर दिया। जाती हुई बाइक की आवाज़ जब तक आती रही, वर्षा दरवाज़े पर ही खड़ी रही।

जीवन को घर से निकले आधा घंटा बीत चुका है और वह कुल-जमा नौ किलोमीटर की दूरी तय कर पाया है। उसने मन-ही-मन हिसाब लगाया। अभी लगभग सैंतालीस किलोमीटर का फासला बचा था। अगर हालात ऐसे ही रहे तो उसे अभी दो से ढ़ाई घंटे और लगेंगे। अचानक उसे लगा जैसे उसके मोबाइल की घंटी बज रही हो। मन-ही-मन वह झल्ला उठा - "ज़रूर बॉस होगा। बेवक़ूफ़! उसे लगता है कि बार-बार फ़ोन करने से काम जल्दी हो जाता है।" उसने बायाँ ब्लिंकर जलाया और गाड़ी सड़क किनारे खड़ी कर दी। उसने फ़ोन जेब से निकाला। वह अभी तक बज रहा था। स्क्रीन पर निगाह डाली तो नाम लिखा था - अरशद।

“हेलो”

“जीवन, यार मैं बड़ी मुसीबत में आ गया हूँ। नादिरा की प्रेगनेंसी में कंप्लीकेसी आ गयी है। उसे जीवन-ज्योति नर्सिंग होम में भर्ती करवाया है। डॉक्टर ने फ़ौरन सिजेरियन को कहा है। ऑपरेशन के लिए खून चाहिए। तू अभी-के-अभी आ जा मेरे भाई।”

अरशद की कातर ध्वनि ने उसके दिमाग में खतरे की घंटी बजा दी। मुझे अभी लौट चलना है, यह फैसला लेने में उसे क्षण भर भी सोचना नहीं पड़ा। उसने अरशद को सांत्वना दी –

“तू फ़िक्र मत कर मेरे भाई। मैं अभी पहुँचता हूँ। तू बस धीरज रख... और हाँ.... अस्पताल का क्या नाम बताया?”

“जीवन-ज्योति नर्सिंग होम”

“हाँ... हाँ... मैं समझ गया। तू पेपर्स रेडी कर। मैं बस पहुँचता हूँ।”

 

 

2

जीवन और अरशद जब ब्लड बैंक पहुँचे तो वहाँ ज्यादा चहल-पहल नहीं थी। अरशद ने स्वागत-कक्ष में बैठी महिला की ओर अपने कदम बढ़ा दिए। उसे अस्पताल के कागज़ सौंप वह माहौल का जायज़ा लेने लगा। खानापूर्ति में लगभग पाँच मिनट लगे होंगे। अब वे दोनों रक्त-दान कक्ष में श्री राव के सामने थे। ब्लड-ग्रुप की जाँच के बाद उन्होंने आगे की कार्रवाई अपने सहकर्मी डॉ एंजेला मुर्मू को सौंप दी। डॉ एंजेला डॉक्टर नहीं, जादूगर थीं। उनकी बातों-बातों में रक्त-थैली कब भर गई, इसका पता न तो जीवन को चला, ना ही अरशद को।

जीवन जब रक्त-दान कक्ष से बाहर निकला तो देखा कि अरशद बड़ी बेसब्री से उसका इंतज़ार कर रहा है। उसने अपने हाथ में पकड़ा कागज़ अरशद की ओर बढ़ा दिया –

ये पेपर्स जल्दी से जमा कर दे तुझे रिप्लेसमेंट में ब्लड मिल जायेगा।”

अरशद ने एक नज़र उस कागज़ को देखा। उसकी आँखों में मानो छलक उठने को बेताब समंदर उमड़ रहा था। कृतज्ञता ने मानो उसकी ज़ुबान लड़खड़ा दी। हाथों को जोड़ वह धीमे स्वर में सिर्फ इतना ही कह पाया –

“शुक्रिया”

शब्द निकले तो लहरों ने भी सीमाएँ लाँघ दी। आँखों से गंगा-जमुना बह निकली। भावनाओं का समंदर इस कदर उफना कि शरीर और आवाज़, दोनों कांपने लगे।

“शुक्रिया मेरे भाई”

दोस्त के आँसू देख जीवन भी अपने को रोक नहीं पाया। बस एक कदम की ही तो बात थी। दोनों को गले मिला देख ब्लड बैंक के कर्मचारी भी आश्चर्यचकित थे। “खून का रिश्ता” भला इससे अच्छा क्या होता होगा?

 

 

 

3

अस्पताल के प्रसूति-कक्ष के सामने माहौल बड़ा ही अजीब था। जिन्हें खुशखबरी मिल चुकी थी, वे अपने रिश्तेदारों तक उसे अग्रसारित करने में लगे थे। जिन्हें अभी खुशखबरी का इंतज़ार था, वे बरामदे में चहलकदमी कर रहे थे। प्रसूति-कक्ष का दरवाज़ा जरा भी आवाज़ करता तो सारे उस ओर लपकते। अरशद गुमसुम सा एक कोने में खड़ा था। जीवन बरामदे में लगे पोस्टर पढ़ने में व्यस्त था। समय काटने का इससे अच्छा तरीका भला और क्या हो सकता था। जीवन ने देखा कि तमाम सादे पोस्टरों के बीच एक चमकीले लाल रंग का पोस्टर है। उसने नजदीक जा कर देखा। वह रक्तदान से संबंधित एक पोस्टर था जिसमें लिखा था – एक रक्तदान तीन लोगों की ज़िंदगियाँ बचा सकता है।

अचानक प्रसूति-कक्ष का दरवाज़ा खुला और एक नर्स ने बाहर निकल कर आवाज़ दी –

“नादिरा के साथ कौन है?”

अरशद तुरंत हरकत में आया –

“जी... मैं हूँ।”

“मुबारक हो, नादिरा को लड़की हुई है। माँ और बच्चे को दो घंटे बाद पोस्ट-ऑपरेटिव वार्ड में शिफ्ट कर देंगे। फिर आप उनसे मिल सकते हैं। चलिए... यहाँ साइन कीजिए।”

साइन करके अरशद पलटा तो जीवन पीछे ही खड़ा था। उसने अरशद को मुबारकबाद दी। दोनों बाहर निकलते वक़्त उसी पोस्टर के सामने से गुज़रे। उसे देख जीवन थोड़ा ठिठका। अरशद ने पूछा –

“क्या हुआ?”

“कुछ नहीं” जीवन ने कहा।

“बस ये सोच रहा हूँ कि अगर एक रक्तदान तीन ज़िंदगियाँ बचा सकता है तो दो ज़िंदगियाँ तो आज मैंने बचा लीं। अब पता नहीं कि तीसरी ज़िन्दगी किसकी बचेगी।”

दोनों ने एक दुसरे को देखा और मुस्करा दिए। अरशद बोला –

“तू भी न यार...”

 

 

4

सुबह के दस बज चुके हैं और जीवन बड़ी तेज़ी से अपने नाश्ते को निपटाने में व्यस्त है। हो भी क्यों नहीं? उसे कल ही चाईबासा पहुँच कर सारा इंतज़ाम मुकम्मल करना था किंतु इंसानियत का तकाज़ा कुछ और ही था। जीवन इस बात से प्रसन्न था कि उसने इंसानियत को शर्मसार नहीं होने दिया। वह इस बात से भी खुश था कि बॉस ने भी उसकी बात समझी थी, लेकिन नादिरा और बच्ची से मिल कर लौटने में रात ज्यादा हो गयी। खैर, जैसे-तैसे नाश्ते को ख़त्म कर उसने पत्नी को आवाज़ दी –

“वर्षा... ओ वर्षा!”

किचन में व्यस्त वर्षा के कानों में जैसे ही उसकी आवाज़ पहुंची, उसने प्रत्युत्तर दिया –

“जी... आई”

जीवन ने जब तक अपने हाथ धोये, वर्षा तौलिया लिए पीछे खड़ी रही। हर रोज़ की तरह बैग उठाए वह अपनी मोटरसाइकिल की ओर बढ़ गया। वर्षा भी दरवाज़े पर खड़ी उसे जाते हुए देखते रही। मोटरसाइकिल पर बैठ जब वह पलटा तो पाया कि पत्नी मुस्कुरा रही है। उसे आत्मिक शान्ति की अनुभूति हुई। कोई तो है जो उसके घर से जाने के बाद उसके वापस लौटने की राह तकता है। एक स्वतःस्फूर्त मुस्कान उसके अधरों पर खेलने लगी।

पति को विदा कर वर्षा जब अन्दर आई तो देखा कि घड़ी में साढ़े-दस बज रहे हैं। उसे याद आया कि उसके पसंदीदा धारावाहिक का समय हो चला है। सोफे पर बैठ, धारावाहिक देखते-देखते कब वह लेट गई और लेटे-लेटे कब नींद ने उसे अपनी आगोश में ले लिया, उसे पता भी न चला। अचानक फ़ोन की ध्वनि से उसकी नींद उचट गई। उसने घड़ी की ओर नज़र घुमाई। ये क्या? ये तो ढ़ाई बज गए! फ़ोन अभी भी बज रहा था। उसने फ़ोन उठा लिया –

“हेलो”

“क्या ये मिस्टर जीवन का नंबर है?”

“जी हाँ, मैं उनकी पत्नी। जी कहिए।”

“जी मैं सदर अस्पताल से इंस्पेक्टर संजय चौबे बोल रहा हूँ। उनका एक्सीडेंट हो गया है।”

“क्या?”

“जी हाँ, अच्छा होगा अगर आप तुरंत ही यहाँ चले आयें। उनका काफी खून बह गया है। वार्ड नंबर ३ के बेड नंबर ७ पर उन्हें खून चढ़ाया जा रहा है।”

वर्षा का दिमाग इस खबर से मानो सुन्न हो गया। वह धम्म से सोफे पर बैठ गयी। एक पल को उसे अपने आस-पास की दुनिया आभासी लगने लगी। अनिष्ट की आशंका ने सोचने-समझने की शक्ति को ही मानो क्षीण कर दिया था। आँखों के आगे धुंधली काली चादर यूँ लहरा रही थी मानो साक्षात् काल हो। हिम्मत बटोर कर उसने सामने पड़े ग्लास को उठाया। उसमें अब भी दो-तीन घूँट पानी था। सूखता गला जब तर हो गया तो जैसे दिमाग को भी नया जीवन मिला। उसने तुरंत फ़ोन कर अरशद को बुलाया।

दोनों जब अस्पताल पहुँचे तो देखा कि जीवन को खून चढ़ाया जा चुका है। वह पूरी तरह से होश में था। उसे सही-सलामत देख वर्षा के दिल का सारा डर आँसू बन बह निकला। पति के बगल बैठ उसने जीवन का हाथ अपने दोनों हाथों से कस कर थाम लिया। उसके प्रेम के आवेग को जीवन भी पूरी तरह से महसूस कर पा रहा था। जब उसका एक्सीडेंट हुआ था तो उसे ऐसा लगा था कि अब वह कभी भी अपनी पत्नी को नहीं देख पाएगा। अब जब वर्षा का हाथ उसके हाथ में था, उसे यकीन होने लगा था कि दोनों कभी जुदा नहीं होंगे।

अचानक जीवन की नज़र पीछे खड़े अरशद पर पड़ी। उसने अपना दूसरा हाथ आगे बढ़ाया तो अरशद ने भी आगे बढ़ कर उसका हाथ थाम लिया। दोनों मुस्कुरा उठे। जीवन ने कहा –

“यार अरशद! आज तीसरी ज़िन्दगी भी बच गयी यार।”

 

Thursday, February 12, 2015

अछूत


आज अट्ठाईस दिसंबर है। बच्चों की परीक्षाएँ ख़त्म हुए पूरे चार दिन बीत चुके हैं। इन चार दिनों में वे जितना खेलने की सोच सकते थे, उतना खेल चुके थे। आज छुट्टी का पाँचवा दिन है। शैतान-मंडली सुबह से ही सुस्त है। रौनी और चिंकी अपने दोस्तों के साथ सर्दी की अलसाई धूप में खुद भी अलसाये-अलसाये से लॉन में पड़े हैं –

“यार, बोर हो गए।” रौनी बोला।

चिंकी ने भी भाई की हाँ-में-हाँ मिलाया - “हाँ यार। ये मम्मी-पापा भी ना; कहीं घुमाने कहो तो बहाना बनायेंगे कि छुट्टी नहीं है।”

बहन का साथ पा कर रौनी का गुस्सा फूट पड़ा - “देखना, आज सन्डे है लेकिन बहानों का संडे कभी नहीं आता।”

तभी बाहर से आवाज़ आई – “आदित्य, ओ आदित्या!”

“क्या है मम्मी?”

“जल्दी से घर आ जाओ। पापा आ गए हैं और हम सब जू घूमने जा रहे हैं।”

“अभी आया! बाय रौनी। बाय चिंकी। बाय सैडी।”

सैडी यानि सुन्दरमण भी उठ चुका था, “बाय रौनी। बाय चिंकी। मैं भी अब चलता हूँ।”

“बाय अंकल”

“बाय बेटा।” बाज़ार से लौट रहे शास्त्री जी ने जवाब दिया। अंदर घुसते ही उनका सामना रौनी-चिंकी से हुआ। उनके उतरे चेहरे देख कर उन्हें किसी अनहोनी का अंदेशा तो हुआ पर उन्होंने तूफ़ान को छेड़ना उचित नहीं समझा। अंदर मिसेज शास्त्री ने आँखों-आँखों में बच्चों की नाराज़गी का कारण बता दिया। फिर क्या था! बस घंटे भर की बात थी और पूरा परिवार सिटी-पार्क में था।  

शहर के बीचों-बीच बना ये पार्क शहर की शान है। शहर की तेज़-रफ़्तार ज़िन्दगी यहाँ आ कर थम सी जाती है। करीने से बनी क्यारियों में भाँति-भाँति के पुष्प हों या उनका रस पीने को तत्पर तितलियाँ, पेड़ों पर भागती गिलहरियाँ हों या पत्तों के बीच लुक-छुपी करते पंछी, जीवन के अनेक रंग यहाँ बिखरे पड़े हैं। मुग़ल-गार्डेन के फूलों को निहारते-सराहते, फव्वारों के किनारे चलते-चलते परिवार अब चिल्ड्रेन-पार्क तक आ पहुँचा था।

“बच्चों, तुम दोनों मम्मी के साथ यहाँ खेलो। तब तक मैं लंच ले आता हूँ।” दोनों बच्चों ने आगे कुछ सुनने की बजाय झूले की ओर दौड़ लगा दिया। शास्त्रीजी ने पत्नी की ओर देखा और दोनों मुस्कुरा दिए।

“तुम इनका ख्याल रखना, मैं अभी आता हूँ।”


कुछ आधे घंटे में ही मिसेज शास्त्री ने शास्त्री जी को आते देखा। उनके हाथों में जो थैला था, उसके वजन के अंदाज़े से लग रहा था कि आज तो जम कर मौज होने वाली है। उन्होंने तुरंत बच्चों को आवाज़ लगाई -
"रॉनी! चिंकी! बेटा पापा आ गए हैं। तुम दोनों भी आ जाओ। जल्दी करो वरना खाना ठंडा हो जाएगा।" 

एक खुली सी शांत और साफ़ जगह देख कर शास्त्रीजी ने चादर बिछा दी। बात की बात में प्लेटें सज गईं और लाजवाब व्यंजनों का दौर शुरू हो गया।

“मम्मी, जरा चिली-चना तो बढ़ाना।” रौनी बोला।

“मेरे लिए पनीर-मसाला...” ये चिंकी थी।

सब अपनी मस्ती में खा रहे थे कि अचानक रौनी ज़ोर से चिल्लाया – “शू... हट... चल भाग यहाँ से।” यह एक आवारा कुत्ता था जो शायद भोजन की सुगंध से खिंचा चला आया था। शास्त्रीजी ने ऐसा दिखाया जैसे कि उनके हाथ में पत्थर हो और उसे कुत्ते की दिशा में फेंकने का नाटक किया। इसका असर हुआ और कुत्ता उलटे पाँव भाग चला। रौनी अब सहज हो चला था। उसने निश्चिंत होकर जैसे ही मुहँ में कौर डाला, उसकी निगाहें पेड़ की ओट में खड़े दो मलिन-मुख बालकों से जा टकराई। उसने सरसरी निगाह से देखा, दोनों ने फटे हुए वस्त्र धारण कर रखे थे जो शायद किसी वयस्क के थे। दोनों ही खाने को ललचाई निगाहों से एकटक घूर रहे थे। रौनी फिर असहज हो गया। उसकी असहजता  सहज ही परिजनों की  निगाहें उस ओर ले गयी जिधर रौनी देख रहा था। चार जोड़ी आँखों को अपने ऊपर टिका देख पहले तो दोनों सकपकाए, फिर पेड़ की ओट से निकल कर थोड़ा निकट आ कर खेलने लगे। उनकी निगाहें अब भी भोज्य-सामग्री पर ही टिकी थीं।

बालकों के निकट आ जाने से पूरा परिवार असहज हो उठा। सबने जल्दी-जल्दी खाना ख़त्म किया और जूठा समेटने लगे। रौनी ने देखा कि उन्होंने जो जूठा फेंका था, दोनों बच्चे उसमें से बचा-खुचा निकाल कर खा रहे हैं। मिसेज शास्त्री ने शायद बेटे की स्थिति भांप ली थी। उन्होंने बैडमिंटन उठाया और रौनी के साथ खेलने लगी। माहौल फिर से खुशनुमा हो चुका था। शाम ढ़लने लगी थी और ठंड भी बढ़ रही थी। अब समय आ गया था कि घर को प्रस्थान किया जाए। शास्त्री परिवार सामान समेट कर चलने को हुआ कि दोनों बच्चे फिर से आ धमके। उनकी उपस्थिति ने मिसेज शास्त्री के अंदर गुस्से की लहर दौड़ा दी थी। शायद दोनों बच्चों ने इसे समझ लिया था, इसलिए वे उनकी तरफ ही हाथ फैलाये बढे –

“माई, कुछ दे दो माई।”

“हटो! पीछे हटो” कहते हुए मिसेज शास्त्री खुद ही पीछे जाने लगीं पर बच्चे भी कहाँ मानने वाले थे। एक ने बाएँ हाथ से उनका दुपट्टा पकड़ लिया और दाहिने हाथ से बार-बार उनके पैर छू कर प्रणाम करने लगा। मिसेज शास्त्री इस अप्रत्याशित हमले के लिए तैयार नहीं थीं। उन्होंने झटका दे कर अपना दुपट्टा छुड़ाया और पति के पीछे जा छुपी। इतनी देर में शास्त्रीजी ने समझ लिया था कि इन बच्चों से पीछा छुड़ाना आसान नहीं होगा। उन्होंने झट से दस का एक नोट निकाला और मामले को निपटाया किन्तु मिसेज शास्त्री का मूड ख़राब हो चुका था।

“आवारा! भिखमंगे! सारा मूड ख़राब कर दिया।” मिसेज शास्त्री का गुस्सा तो जैसे सातवें आसमान पर था।

“देखा आपने! उसने मुझे छू लिया! मेरे कपड़े गंदे कर दिए। वाहियात गंदे बच्चे।” मिसेज शास्त्री अब अपने पति से मुखातिब थीं।

“मम्मी-मम्मी, क्या वे अछूत बच्चे हैं जो उनके छू लेने से आप इतनी नाराज़ हो?” ये चिंकी थी।

“..........................”

नन्हीं बच्ची के मासूम सवाल का निहितार्थ इतना गहरा था कि मिसेज शास्त्री अवाक् रह गई। पत्नी के गुस्से और बच्ची की जिज्ञासा में टकराव न हो, इसलिए शास्त्रीजी बोले, “रौनी-चिंकी, देखूं तो कि दोनों में कौन गाड़ी के पास पहले पहुँचता है!” सब कुछ भूल कर पल में ही दोनों हवा से बातें करने लगे।

इधर एक पेड़ के नीचे खड़े दोनों लड़के मिस्टर और मिसेज शास्त्री को जाते देख रहे थे। एक ने दूसरे से कहा –

“भाई ये अच्छे कपड़े वाले हमें अछूत क्यों समझते हैं?”

“अबे अच्छा ही है कि अछूत समझते हैं। इसी बहाने हमें पैसे तो मिल जाते हैं”

दोनों ही मस्ती में खिलखिला दिए।