Sunday, April 19, 2009

जूता पुराण

बाज़ार गया तो जूते की दूकान में मटकू भैया दीख गए. उन्हें छेड़ने का मौका मैं कहाँ छोड़नेवाला था? छूटते ही शुरू हो गया, "क्या भैया? अब आप भी?"
"क्या हुआ?"
"मतलब अब आप भी?"
"अरे मूरख, आगे भी कुछ बोलेगा?"
मटकू भैया को गुस्सा होते देख मुझे मज़ा आने लगा था लेकिन सोये शेर के साथ छेड़खानी तभी तक अच्छी जब तक वो सोया हुआ है.... वरना तो आप समझ ही गए होंगे.
"भैया, बुश से शुरु हुआ सिलसिला PM-in-waiting अडवाणी तक पहुँच गया है..... पर आप किस पर खफा हैं?"
भैया मेरा इशारा समझ कर हँसने लगे.
बोले "खफा तो पब्लिक है भाई.... अब पब्लिक को भाषण नही, रासन चाहिए. जो देगा, उ वोटवा पायेगा, अ नही ता जूता खायेगा."
हम दोनों साथ में हंस पड़े.

Tuesday, March 24, 2009

दिल है छोटा सा.. छोटी सी आशा..

बैंक गया तो मटकू भैया मिल गयेI
दुआ-सलाम के बाद मैने उनको अपनी मुफ्त की सलाह दे डाली, "भैया, अच्छा हुआ आप मिल गयेI आज ही टाटा की 'नैनो' आई हैI आप भी एक ले लोI"
"बात तो तुम बहुत अच्छा कहे हो, पर तुम्हे तीन बातें बोलता हूँI"
"क्या भैया?"
"पहली ये कि एक लाख गाड़ी के लिए एक-एक लाख का बुकिंग अमाउंट जमा होने पर टाटा को कम-से-कम कितने करोड़ मिलेंगे, कभी सोचा है?"
"नही भैया..."
"दूसरी ये कि जब बड़े-बड़े खिलाड़ी लग्ज़री गाड़ी पर ध्यान लगाए बैठे थे, टाटा ने आम उपभोक्ता की उमीद से आगे जा कर उनके सपनो को पंख दिएI उनके छोटे से दिल की छोटी सी आशा की गाड़ी के रूप में 'नैनो' पेश किया...है कि नही?"
"और तीसरी बात भैया?"
"गाड़ी तो आ गयी, बिकेगी भी खूब... पर सड़क के गड्ढे और अतिक्रमण करते वाहनो, दुकानो का हमारे नेताओं के पास क्या समाधान है?"
"......" मैं चुप थाI

Tuesday, December 2, 2008

The smiling face of god!

Yesterday evening, my daughter came running, "Papa, Papa, look!" and pulled me out to show something. What I saw was a mesmerizing experience.

I'm putting up the snap I clicked. I've named it as: The smiling face of god! But before the snap, a cutting of article published in "Hindustan" (1st Dec)

Friday, November 28, 2008

उजाले की कोख का अँधेरा

सुबह का अखबार हाथ में आते ही सन्न रह गया। खून-ही-खून, चारों ओर। ये हो क्या रहा है? अपने ही देश में दुम दबा कर भाग रहे हैं हम, और कुछ कुत्ते शेर की मानिंद शिकार करते घूम रहे हैं।

मैंने झट मटकू भइया को फ़ोन लगाया।

"भइया प्रणाम। ये सब क्या हो रहा है?"

"क्या कहें, ई ता एक दिन होना ही था...."

"काहे भइया?"

"कलयुग में ये क्या हो रहा, तमस प्रकाश पर भारी पर रहा

दैदीप्यमान आलो की कोख से, कैसा अन्धकार पैदा हो रहा।

झुलसाती-लपलपाती ज्वाला, प्यासी है खून की

तांडव है मौत का, सरफिरों के दर्प की।

टी वी कैमरों पर नज़र आने की मारामारी चल रही है,

ब्रेकिंग न्यूज़ से TRP ब्रेक करने की तैयारी चल रही है।

नेता बोले, उनके इरादे नेक नही थे,

होते भी कैसे, हम एक नही थे।

मराठियों का महाराष्ट्र, बिहार में बिहारी बसता है,

हिन्दुस्तान में हिन्दुस्तानी नही, यही दर्द डंसता है।

हिंद के प्रकाश "दिनकर", लौट कर फिर आ जाओ,

कृष्ण की बन कर तुम वाणी, गीता पुनःश्च दोहराओ।

"क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो,

उसको क्या जो दंतहीन, विषहीन, विनीत, सरल हो।" "

Friday, November 7, 2008

Wings of life

A few days back, I saw my my daughter running behind something.
"What are you upto?"
"I'm trying to catch a butterfly, but am not able to. But papa, can you tell me, why do we don't see lot of butterflies these days? Earlier, they were quite a lot and I managed to catch one of them easily!"

Suddenly I recalled that an article in newspaper said that the number of sparrows in cities have gone down by around 40%! The journey of sensex has become so important for us that we seem to be more reluctant towards issues that may affect our existence. We are breaking barriers, crossing our limits. When nature strikes back, we cry in woe.

Butterflies play an important role in cross-pollination. They maintain the bio-diversity in the plant kingdom. Sparrows play an important role in controlling the population of pests and insects.

But why have they gone? The high amount of pesticides, chemicals, fuel residues (from vehicles) and wave signals of DTH, FM and mobiles interrupt with their normal life. The high noise and pollution is also forcing them to shift from cities. But who cares....

Being delicate and sensitive towards change, they are reacting to it but when will we wake up? Are these factors NOT affecting our lives? The bell is ringing. It is upto us that we wake up or ignore it.

Wednesday, October 22, 2008

गांधीजी की याद में....

बड़े दिनों बाद मटकू भइया फिर मिल गए। दुआ-सलाम से फारिग होते ही मैंने तीर चलाया:
"कहाँ थे भइया? आपके बिना गांधी-जयंती यूँ ही बीत गई। आज कल तो गांधीजी को कोई याद नही करता। एक आप ही हैं जो ऐसी बातें समझ सकते हैं... वरना..."
मेरी बात बीच में ही काट कर भइया बोले "गांधीजी को लोग आज भी उतना ही मानते हैं। मेरी कहानी सुनो... ड्राइविंग लाइसेंस में पता बदलवाना था... डीटीओ ऑफिस के चक्कर लगा-लगा कर थक गया। वहां का बाबु बोला कि गवाह लेकर आओ। हम उसको बोले कि अभी तो हम नया-नया वहां गए हैं, गवाह कहाँ से लायें? तो जानते हो कि क्या बोला?... बोला कि अगर गांधीजी गवाही दें तो....."
"गांधीजी की गवाही?"
"अरे हम भी अइसने बुरबक वाला सवाल कर दिए... उ ऊपर नीचे हमको देखा और बोला कि १००० रु निकालो, तब काम होगा!"
"अच्छा-अच्छा" मैं अपनी मूर्खता पर हँसने लगा। मुझे ये पहले ही समझ जाना चाहिए था।
"वैसे तुमको एक बात बताएं।" भइया शुरू हो गए। "अगर गांधीजी के अहिंसा का पालन होता तो आज दुनिया कुछ और होती। जानते हो कि अमरीका का रक्षा बजट बहुत से देशों के जीडीपी से ज़्यादा है। हम बम-बारूद पर जितना खर्च करते हैं, उतने में हम पृथ्वी से बीमारियों का नामोनिशान मिटा सकते थे, हर मुहं को रोटी दे सकते थे, हर हाथ को काम दे सकते थे।"
"एक और बात कहें... गांधीजी जिस ग्राम-स्वराज की कल्पना किए थे, उस पर चल कर न सिर्फ़ हम सबको रोज़गार दे सकते हैं बल्कि आर्थिक मंदी की आंधी से भी बच सकते हैं। अब भासन बहुत हो गया। गांधीजी से गवाही दिलवाने के बाद मेरा मूड थोड़ा ख़राब है। बाद में मिलते हैं।"

Friday, October 10, 2008

लौहनगरी में दुर्गापूजा

आख़िर रावण जल गया और दुर्गापूजा समाप्त! नवरात्र के नौ दिन देवी दुर्गा के नौ रूपों की आराधना के साथ-साथ मौज-मस्ती के भी रहे। यूँ तो कोलकाता अपने भव्य उत्सवों के लिए जाना जाता है, पर चूंकि जमशेदपुर बंगाल के काफ़ी करीब है, यहाँ भी दुर्गा-पूजा काफ़ी भव्यता और उत्साह से मनाया जाता है (मैं भक्ति की बात नही कर रहा, क्यों कि किसी की भक्ति पर शक नही है मुझे, चाहे वो कहीं भी रहता हो)।
मेरे साथ एक नज़र यहाँ के पूजा-पंडालों पर-











Wednesday, September 17, 2008

जगत-शिल्पी को शत-शत नमन!

१७ सितम्बर यानि जगत-शिल्पी प्रजापति विश्वकर्मा की पूजा का दिन। देवताओं के इस अद्भुत शिल्पी के ऐतिहासिक या धार्मिक पहलु से मैं बहुत ज्यादा परिचित नही हूँ; फिर भी, विज्ञान और अभियंत्रण को जन-साधारण के फायदे के लिए प्रस्तुत करने वाले हर technocrat को विश्वकर्मा की उपाधि मिलनी ही चाहिए।
औद्योगिक क्षेत्रों में विश्वकर्मा पूजा बड़े ही धूम-धाम से मनाया जाता है। जाती-धर्मं के बंधन तोड़ कर सभी लोग इनकी पूजा में समान रूप से शामिल होते हैं। प्रसाद और भोग के लिए उत्साह देखते ही बनता है।
विश्वकर्मा की बात चले और नए युग के विश्वकर्माओं की बात न हो तो ठीक नही। टाटा स्टील के नौ कामगारों को प्रधानमंत्री श्रम पुरस्कारों के लिए चयनित किया गया है। श्रम-भूषण के लिए टी ऍम श्रीवास्तव, आर पी सिंह और सुनील कुमार (दोनों संयुक्त रूप से); श्रम-वीर के लिए संजीव ओझा, तेजू साहू और बिनय कुमार पाण्डेय; तथा श्रम-श्री के लिए सुबोध वर्मा, चिदानंद सिंह और सचिदानंद श्रीवास्तव का चयन हुआ है। सबों को बधाई!


Friday, August 29, 2008

दद्दू तुम!

"२९ अगस्त यानि दद्दा का जन्मदिन।"
"ऐ सर्किट, दद्दा बोले तो?"
"क्या भाई, दद्दा को नही जानता?"
"अबे सर्किट, PSPO का ad मत कर। मेरा भेजा फ्राई मत कर, वरना गांधीगिरी भूल के टपका डालूँगा।"
"सॉरी भाई, मिस्टेक बिकेम रोंग! भाई, हॉकी के एक महान खिलाड़ी थे - मेजर ध्यानचंद। उन्ही को भाई लोग दद्दा बुलाते थे।"
"ऐ सर्किट, ये भाई लोग हॉकी भी खेलते थे क्या?"
"क्या भाई... आप भी! भाई लोग बोले तो उनके चाहने वाले। एक बात मालूम भाई, उस टाइम पे दुनिया का एक भाई था... भाई बोले तो अपुन के जैसा दुनिया पे राज करने का सपना देखता था - हिटलर। बर्लिन ओलंपिक में जब बाल दद्दा के हॉकी स्टिक से हटती नही थी तो उसने स्टिक बदलवा दिया। "हॉकी के जादूगर" का जादू हिटलर पर भी चला भाई! वो तो अपने दद्दा को अपनी आर्मी का जनरल बनाना चाहता था लेकिन दद्दा ही नही गए।"
"लेकिन आज तेरे को ध्यानचंद कि याद क्यों आई?"
"क्योंकि आज उनका जन्मदिन है।"
"ऐ सर्किट, अपुन हॉकी तो नही खेल सकते लेकिन हॉकी के इस जादूगर की याद में दो मिनट कि श्रधांजलि तो दे ही सकते हैं।"

Sunday, August 10, 2008

उद्यम-सार

आज बड़े दिनों बाद मटकू भइया फिर से दीखे।
"भइया प्रणाम"
"आनंदित रहो! कहाँ था? दिख नही रहा था?"
"था तो यहीं, लेकिन इधर काम का कुछ बोझ बढ़ गया था। इसलिए देर तक काम करना पड़ रहा था। आप सुनाइए... आजकल नीतीश के सुशासन के बड़े चर्चे चल रहे हैं। अखबारों में देखा कि नरेगा की सफलता ने पंजाब में बिहारी मजदूरों की किल्लत कर दी है । "
"अब जब तुम बात निकालिए दिए हो तो तुमको एक छोटा सा कहानी सुनाते है। एक पंजाबी और एक बिहारी को एक ढाबे में रोटी बनाने की नौकरी मिली। दोनों नया था... कभी रोटी तऽ बनाया नही था। खैर... जैसे तैसे दोनों सीखने लगा। जिस दिन बिहारी का रोटी गोल बना वो कोशिश करने लगा कि रोटी कैसे बढ़िया फूले। जब रोटी फूलने लगा तऽ दिन रात यही कोशिश में लगा रहता था की रोटी और ज्यादा गोल कैसे हो... और ज्यादा कैसे फूले।"
"और पंजाबी का क्या हुआ भइया?" मैंने पुछा।
"जिस दिन पंजाबी का रोटी गोल होकर फूल गया, वो बगल में दूसरा ढाबा खोल लिया! कुछ समझा?"
मैं समझने की कोशिश करता रहा.....