Sunday, June 21, 2015
मेरे मन की बात
Tuesday, May 26, 2015
वक्र-चक्र गति
Saturday, May 23, 2015
The Palm Psalm
A closer look revealed the truth. It was NOT a palm tree. It is a Reliance 4G tower being set up by Reliance Jio. I think it is one of its kind of camouflage tower installed.
With the leaves and trunk, you will surely mistake it for a palm tree. What else is better fit for a town that is "Clean City, Green City, Steel City".
In fact, many other such towers being set up will double up as high-mast lights. You will notice that the conventional vapour lights are being replaced by LED street lights!
Interesting! Isn't it?
Friday, March 6, 2015
बुरा न मानो होली है
अंग अंग
हो रंग रंग
भंग संग
बाजे मृदंग
कान्हा चले
ग्वालों के संग
हाथों में रंग
मन में उमंग
सखियाँ सहित
राधा खङी
कान्हा को रंगने
को अङी
दिक् दिक् रहा था
रस बरस
उल्लास उत्सव
का सरस
रस रंग राग
आया है फाग
हर मन मे आज
बजने दो साज
हर द्वेष भूल
खिलने दे फूल
बस मिल गले
आगे चलें
जीवन तो
हँसी ठिठोली है
बुरा न मानो
होली है
Thursday, February 12, 2015
अछूत
"रॉनी! चिंकी! बेटा पापा आ गए हैं। तुम दोनों भी आ जाओ। जल्दी करो वरना खाना ठंडा हो जाएगा।"
एक खुली सी शांत और साफ़ जगह देख कर शास्त्रीजी ने चादर बिछा दी। बात की बात में प्लेटें सज गईं और लाजवाब व्यंजनों का दौर शुरू हो गया।
Friday, January 16, 2015
गोवा की सैर: दूधसागर प्रपात व अन्य
| Fishing Nets in shallow water |
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| The foggy morning |
नज़ारों का आनंद लेते हुए जब हम अपने गंतव्य तक पहुंचे तब पौने-ग्यारह बज रहे थे.
| Just a step from Kullem stand |
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| Uncle in blue |
| Dudhsagar Falls |
जंगल के इस साहसिक अभियान ने हमारे अन्दर एक नया जोश भर दिया. हमें करीब एक घंटे तक यहाँ रहने की इजाज़त थी, सो दो बजते ही हमलोग गाड़ी की ओर वापस चल दिए.
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| Devil's Canyon |
लौटते वक़्त ड्राईवर ने सिर्फ एक घंटा ही लगाया और हम जल्दी-जल्दी लाइफ-जैकेट लौटाकर वापसी के सफ़र पर निकल पड़े.
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| Farmagudi Fort |
| ShantaDurga Temple |
रास्ते में भोजन किया और शांतदुर्गा मंदिर पहुंचे. ये मंदिर काव्लेम में स्थित है और यहाँ देवी दुर्गा के शांत-स्वरुप की पूजा होती है. मंदिर की भव्यता और अनूठा स्थापत्य देखने योग्य है. यहाँ हमने बीस मिनट बिताये.
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| Wax meuseum |
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| Bascilica of Bom Jesus |
फिर हम बोम जीजस ( #BomJesus ) का महागिरिजाघर गए. इसका निर्माण १५९४ ईo में किया गया था. यहाँ संत फ्रांसिस ज़ेवियर का शारीरिक अवशेष रखा गया है. यहाँ हमें पच्चीस मिनट लग गए. जब हम निकले तो सामने अवस्थित म्युजिअम के बंद होने का समय होने लगा था. हम अब थक भी गए थे, तो म्युजिअम और चर्च को बाहर से ही देखते हुए हम “वायसराय का कमानी-द्वार” देखने गए.
| Se Cathedral |
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| Viceroy's Arch |
इसे फ्रांसिस्को ड गामा ने अपने प्रपितामह वास्को ड गामा की स्मृति में बनवाया था और यह इस शहर पर पुर्तगालियों के विजय का प्रतीक था.
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| Ruins of the church of St. Augustine |
यहाँ से निकले तो संत अगस्टीन चर्च के अवशेष देखते हुए वापसी को निकल पड़े. सूरज अब छिपने को था. हम भी थक कर चूर हो चुके थे. सो सीधे कमरे में आये, खाना खाया और घोड़े बेच कर सोने चल दिए!
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| People enjoying on Calangute Beach |
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| Riding on the waves |
समुद्र-तट पर हमें अनेक दलाल मिले किन्तु हमने काउंटर से टिकट कटाया और विभिन्न जल-क्रीड़ाओं का आनंद लिया. प्रत्येक गतिविधि के लिए अलग शुल्क निर्धारित है जोकि 200 से 500 रूपए प्रति-व्यक्ति प्रति-फेरा तक है. दोपहर के दो बजते-बजते हम थक भी गए थे और बुरी तरह से भीग भी गए थे. सो हमने लौटने का फैसला किया. हमें पता चला कि यहाँ के सुलभ शौचालय में कपड़े बदलने की सुविधा उपलब्ध है. हमारे पास कपड़े तो थे ही, तो हमने सोचा कि गीला रहने से अच्छा है कपड़े बदल लिए जायें. जब हम अंदर गए तो चारों ओर गंदगी का अंबार था. ऐसा लगता था कि सदियों से यहाँ सफाई नहीं हुई हो. जैसे-तैसे हमने नाक बंद कर कपड़े बदले. ऐसी घटिया व्यवस्था के भी हमें 20 रूपए प्रति-व्यक्ति के हिसाब से देने पड़े.
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| Ferry as seen from the bridge |
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| Children enjoying on Santa Monica river cruise |
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| A view from the cruise |
हमें जल्द ही बैठने की अच्छी जगह मिल गयी. जलयान भी नियत समय पर अपनी यात्रा पर निकल गया. सामने एक स्टेज बना था और पीछे खाने-पीने का स्टाल लगा था. इन दोनों के बीच था अंतहीन मस्ती-मजा का कार्यक्रम. स्थानीय कलाकारों ने गोवा की संस्कृति और दर्शन के दर्शन तो कराये ही, दर्शकों को भी साथ में नचाया. लहरों से खेलता जलयान धीरे-धीरे समुद्र की ओर बढ़ने लगा. डूबते सूरज की लालिमा जब बलखाती लहरों से टकरा कर चमकती तो ऐसा लगता मानो पानी पर स्वर्ण-कण बिखरे पड़े हों. बाहर अद्भुत नज़ारे और अंदर जोशीला कार्यक्रम, समझ नहीं आ रहा था कि बाहर देखें या अंदर. डेढ़ घंटे का ये सफ़र कब शुरू हुआ और कब ख़त्म, इसका पता ही नहीं चला. जब हम वापस आये तो अपने साथ मुस्कुराहटें लेकर लौटे. सुबह की थकान गायब हो चुकी थी. रही-सही कसर राजू के शानदार खाने ने पूरी कर दी. अंत भला तो सब भला.
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| Chauranginath Gram Devsthan |
शुरुआत हुई श्री चौरंगीनाथ ग्राम देवस्थान से. यहाँ पूजा-अर्चना कर हम पैदल ही अगल-बगल की खोजबीन करने निकल पड़े. यहाँ आस-पास ही एक वाटर-पार्क और एक गो-कार्टिंग ट्रैक भी है. हरी-भरी पहाड़ियों से घिरा ये इलाका अत्यंत शांत और मनोरम है. आस-पास के क्षेत्रों का परिभ्रमण कर हम खाने के लिए लौट आये. हमें शाम की गाड़ी पकड़नी थी, तो हमने अपना सामान समेटा, राजू और अनिलजी को सधन्यवाद उनके प्रयासों को सम्मानित करने का प्रयास किया और अनेक यादें समेटे गोवा से रुखसत हो लिए.
Tuesday, January 13, 2015
गोवा की सैर: उत्तरी गोवा
Thursday, June 19, 2014
SUGGESTION
Every little seed, inside has a tree,
The power of it, we can't simply see.
The thoughts and ideas, dwelling in our mind,
Will blossom generously, only if we find –
An idea to nurture, and give it some time,
Do it, test it, tell it, you'll surely get a dime.
Call them intelligent; creative, nasty, foolish,
They're road to dreams, you always cherish,
A bowl fills with water, drop by drop,
Come one, come all, push hard, we move to the top,
Improvement is humane, and as they say,
Just keep on tryin', there's always a better way!
Friday, February 28, 2014
हैलो अंकल
चिल्ड्रेन पार्क के बगल से दाहिना मोड़ लेते ही उन्हें एक ठेले पर "आम-पन्ना" दिखाई दिया। एक तो पेड़ों की छाँव, उस पर सूखते कंठ को तर कर लेने का साधन! जानलेवा गर्मी में रुक कर दो मिनट सुस्ता लेने का इससे अच्छा बहाना और क्या हो सकता था भला?
"ओ भाई, ज़रा एक गिलास मेरे लिए भी बनाना। "
"अभी बनाता हूँ। "
मधुकर बाबू अब अपना हेलमेट उतार कर आस-पास का जायजा लेने में लग गए थे। तेज़ धूप मानो सड़क के अलकतरे को पिघला देना चाह रही थी। कुछ कुत्ते सड़क के किनारे खड़े ट्रक के नीचे सोये थे। ठेले के पास एक गाय खड़ी थी जिसके सामने "अशोक" की पत्तियां पड़ी थी। शायद ठेलेवाले ने ही उसे तोड़ कर दी होंगी। तभी उनके सामने से मोटर-साइकिल लेकर एक युवक निकला।
मधुकर बाबू सोचने लगे - ज़रूर इसे कोई अति-आवश्यक काम आ पड़ा होगा वर्ना इस गर्मी में कौन घर से निकलता है?
तभी युवक वापस लौटा और जिधर से आया था, उधर चला गया।
"अवश्य ही इसने कुछ छोड़ दिया है और अब उसे लेने जा रहा है", मधुकर बाबू ने अपने आप से कहा।
"कुछ बोले का सर?"
"नहीं-नहीं। मैंने तुमसे कुछ नहीं कहा।
मैं तो ये सोच रहा था कि आखिर ऐसा क्या काम आ पड़ा कि
इस लड़के को इतनी गर्मी में घर से निकलना पड़ा ?"
"अरे सर, आप भी तो घर से बाहर हैं।" ठेलेवाले ने मधुकर बाबू के हाथ में ग्लास थमाते हुए कहा।
उसकी रहस्यमय मुस्कान ने एक पल के लिए विचलित किया पर हाथों में ठंढक के एहसास ने उन्हें दूसरी ही दुनिया में पहुंचा दिया।
ग्लास खाली होने तक युवक तीन-चार चक्कर लगा चुका था पर अब मधुकर बाबू की दुनिया में उसका कोई वज़ूद नहीं था।
आम-पन्ना ने जैसे उनके भीतर फिर से जीवन का संचार कर दिया था।
मधुकर बाबू ने फिर से रुमाल बांधा और चल दिए। गर्मी की धाह से आकृतियाँ हिलती-डुलती सी प्रतीत हो रही थी। उन्होंने देखा कि कोई लड़की अपनी कॉपी को सर पर रख कर गर्मी से लड़ने की असफल चेष्टा करते चली जा रही है। तभी बड़ी तेज़ी से वही युवक उनके बगल से निकला और लड़की के पास पहुँच कर गाड़ी रोक दी। मधुकर बाबू ने देखा कि लड़की छिटक कर एक किनारे हो गयी है। उसकी रफ़्तार भी बढ़ गयी है। जिस तरह खरगोश बाज़ के हमले से बचने के लिए भागता है, लड़की भी अब कुछ वैसा ही कर रही थी। मधुकर बाबू को ये अच्छा नहीं लगा। उन्होंने स्कूटर की रफ़्तार बढ़ाई और तुरंत वहाँ तक पहुँच गए।
"ऐ लड़के", उन्होंने कड़क आवाज़ में कहा। लड़की अब रुक गयी और थोडा खिसक कर मधुकर बाबू के स्कूटर की तरफ हो ली। डूबते को तिनके का सहारा जो मिल रहा था! वे फिर से गरजे -
"क्या हो रहा है? लड़की को क्यों तंग कर रहे हो?"
उनकी हरकत ने एक बेकार बैठे ऑटो वाले का ध्यान आकर्षित किया और वो भी अपनी गाड़ी लेकर चला आया।
"क्या हुआ भैया? कोई दिक्कत है क्या?"
"नहीं भाई। मुझे क्या दिक्कत होगी? दिक्कत तो इसे है।" मधुकर बाबू ने लड़के की तरफ इशारा करते हुए कहा।
"क्यों रे! मार खाने का मन है क्या? पता है न, पब्लिक जब मारती है त पुलिसो से भयंकर मारती है।" ऑटो-वाला बोला।
तू-तू मैं-मैं होता देख लोग अब रुकने लगे थे। शायद लड़के को लगा कि स्थिति जल्द ही बेकाबू हो जायेगी। उसने गाडी को गियर में डाला और चलता बना।
मधुकर बाबू ने लड़की को देखा। गर्मी से लाल चेहरा और आँखों में पानी। उन्हें बड़ी दया आयी। ऑटो-वाले से बोले,
"भैया। जरा इसे इसके घर छोड़ दोगे?"
"मेरे पास पैसा नहीं है अंकल।" लड़की बोली।
"तुम राशन-दूकान वाले विनय जी की लड़की हो न?" ऑटो-वाले ने पूछा।
"हाँ"
"आओ बैठो। मैं तुम्हारे पापा की दूकान के पास ही रहता हूँ। तुम्हे वहीँ छोड़ दूंगा। और हाँ! चिंता मत करो। पैसे मैं उनसे ले लूँगा।"
जब लड़की ऑटो में बैठ कर चली गयी तो मधुकर बाबू ने गहरी सांस ली -
"ये आज कल के लड़के! तौबा-तौबा।"
मधुकर बाबू घर पहुंचे तो पत्नी ने शीतल जल हाथों में थमाते हुए पूछा, "बैंक में भीड़ अधिक थी क्या? आपको देर लगी?"
"अरे नहीं-नहीं!" मधुकर बाबू धर्मपत्नी को रास्ते में घटी घटना के बारे में बताने लगे।
"आप भी क्यों दूसरों के फटे में में टाँग अड़ाने चल देते हैं ? कोई गुंडा-बदमाश होता तो ? आप के साथ मार-पीट करता तो ?" धर्मपत्नी जी की चिंता अब मुखर हो गयी थी।
"ऐसे कैसे मार-पीट कर लेता? और एक बात बताओ - अगर उस लड़की की जगह अपनी पाखी होती तो ? क्या तब भी तुम ऐसा ही कहती?"
"फिर भी," वे बोलीं। "आज-कल के लड़के-लड़कियों में पहले वाली बात नहीं है। ये लोग किसी को कुछ नहीं समझते। वादा करो आगे से ऐसे चक्करों में नहीं पड़ोगे।"
"अच्छा बाबा।" मधुकर बाबू ने हथियार डाल देने में ही अपनी भलाई समझी।
वक़्त की परतों ने इस घटना को मधुकर बाबू के स्मृति कुंड की किस गहराई में छुपा दिया, इसका पता उन्हें भी नहीं चला। आज वसंत-पंचमी है, देवी सरस्वती का पूजनोत्सव ! माँ-बेटी ने मिलकर पूजा की तैयारी कर रखी है। ऐसे में मधुकर बाबू ने सोचा कि क्यों न बाज़ार जा कर आधा किलो बुँदिया ले आया जाये। दरअसल उन्हें आज अपने स्कूल के उन दिनों की याद आ रही थी जब वहाँ सरस्वती पूजा होती और बच्चों को मिश्री-कंद, गाजर, बेर, अंकुरित मूंग और बुँदिया का प्रसाद मिलता था।
"पाखी। पाखी बेटा। जरा दरवाज़ा लगा लेना। मैं थोड़ी देर में बाज़ार से आता हूँ। "
"जी पापा"
अपनी स्कूटर लिए मधुकर बाबू अभी चिल्ड्रेन पार्क तक पहुंचे ही थे कि एक मोटरसाइकिल पर एक लड़का तेजी से आगे निकला। उसके पीछे बैठी लड़की ने से उसे कस कर पकड़ रखा था। अभी वे कुछ समझ पाते कि लड़के ने अपनी गाडी घुमाई और मधुकर बाबू के बगल में आकर धीमा हो गया। मधुकर बाबू ने उन्हें देखा तो गर्मी की दोपहर घटना ताज़ा हो आयी। वही लड़का और लड़की पर शायद… । दोनों उनके बगल से गुजरे और लड़के ने व्यंग कहा-
"हेल्लो अंकल!" और दोनों हसने लगे।



















