Saturday, April 2, 2011

यादें


एक था वट-वृक्ष हम थे खेले जिसकी छांव में
शान से रहते थे अपने बादलों के गाँव में.
आंधी हो, तूफ़ान हो, या धूप हो जितनी कड़ी,
हर समय हर बार ही, उसने की रक्षा मेरी.

काल-चक्र जो घूमता है, मौका देता है कहाँ?
एक दिन, यूँ ही अचानक, खो गया जाने कहाँ.
था जो कल तक मुझको अपनी छांव में रखे हुए,
देख पाया मैं उसे ना, छोड़ कर जाते हुए.

आत्मा हो गयी स्तब्ध, चेतना भी शुन्य सी,
हे विधाता! थी तुम्हारी, ये क्रूर इच्छा कैसी?
अंतस था मेरा विकल पर अश्रु तक फूटे नही,
कहता है ये दिल मेरा, आप हो मेरे पास ही.

आप थे कहते हमेशा, तू तो मेरा लाल है,
सिखलाया थोड़े दिनों में, आपने जो. कमाल है!
हार बैठा हो जो मन में, निश्चय उसकी हार है,
हर कोई अपने किये का, आप जिम्मेवार है.

आपकी हर बात मैं, रखता हूँ सर-माथे पर,
आपने थामा मुझे है, टेढ़ी हो जितनी डगर.
मुझ पर, मेरे वंशजों के, सर पर आपका हाथ हो.
हे पिता! अगले जनम भी, आपका ही साथ हो.

२० वर्षों पूर्व साथ छोड़ गए पिता की पुण्यतिथि पर, मैं अपने शब्द-सुमन उन्हें अर्पित करता हूँ.


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