Wednesday, February 17, 2016

मैसूर में पहला दिन

भारत का इतिहास राजा, रानी, विशाल साम्राज्य, धोखा, युद्ध, हत्याएँ और न जाने कैसी-कैसी बातों से भरा पड़ा है। इन्हें पढ़ते वक़्त यूँ लगता है मानो हम इतिहास नहीं पढ़ रहे अपितु कल्पनालोक में विचरण कर रहे हैं। जब इन साम्राज्यों के ऐतिहासिक साक्ष्यों से सामना होता है तो यूँ लगता है कि कल्पनाएँ भी छोटी पड़ गईं। आज ऐसी ही एक यात्रा का वृतांत लेकर उपस्थित हूँ।
कुछ दिनों पूर्व जब बेंगलुरु (पहले इसे बैंगलोर कहते थे) जाना हुआ तो मन में इच्छा जगी कि मैसूर घूम लिया जाये। हमने तय किया कि हम एक गाड़ी लेकर सड़क मार्ग से मैसूर घूमने जायेंगे। हमने एक निजी एजेंसी से संपर्क किया और उन्होंने अगली सुबह छह बजे गाड़ी लेकर हरीश को भेज दिया। हमने बिना समय व्यर्थ किये अपना सामान लिया और चल पड़े। आठ बजते-बजते हमें भूख सताने लगी। तब हम कनकपुरा इलाके से गुज़र रहे थे।
Srinivasa Sagar Restaurant Kanakpura

अचानक हमारी नज़र एक रेस्तरां पर पड़ी। हमने गाड़ी रुकवाई और “श्रीनिवास सागर” के अन्दर गए। हालाँकि रेस्तरां मध्यम स्तर का लग रहा था किंतु वहाँ की इडली और उपमा लाजवाब थे। हमने चलते समय मेनेजर मंजुनाथ जी का शुक्रिया अदा किया। उन्होंने जब ये सुना कि उनका रेस्तरां हमें बहुत पसंद आया है तो वे फूले नहीं समाए।
यहाँ से चलने के तकरीबन सवा घंटे के बाद हम “शिवनासमुद्रा जलप्रपात” पहुँचे। जंगल के बीच के अत्यंत मनोहारी रास्तों से गुजरते हुए जब हम वहाँ पहुँचे तो देखा कि भीड़ ज्यादा नहीं थी। प्रपात की आवाज़ हम सुन पा रहे थे। इस आवाज़ ने हमारे अन्दर एक नव उत्साह का संचार कर दिया था। जब हम प्रपात के निकट पहुंचे तो थोड़ी मायूसी हाथ लगी।
Shivanasamudra falls
Shivanasamudra falls landing



हमने देखा कि प्रपात की एक ही धारा बह रही है। हम सिर्फ ये अंदाज़ा ही लगा सकते थे कि यदि इस प्रपात की एकल धारा का गर्जन ऐसा है तो जब पूरा प्रपात अपने उफ़ान पर होता होगा तो कितना निर्मल और कितना निर्मम दीखता होगा! खैर, हमें अब प्यास लग आई थी। 
Coconut seller at Shivanasamudra falls

ऐसे में नारियल-पानी से बेहतर और क्या हो सकता था? नारियल विक्रेता ने हमें बताया कि जनवरी से जुलाई तक प्रपात में ज्यादा पानी नहीं होता है। पेप्सी-कोला की दुकान खाली थी और उसके पास खरीदारों की भीड़ लगी थी, इस बात से वह अत्यंत प्रसन्न नज़र आया। घड़ी की ओर देखा तो साढ़े-दस बजने को थे। हमने तलाकाडू की ओर प्रस्थान किया।

चालीस-पैंतालीस मिनट की यात्रा और कई जगहों पर पूछ-ताछ करने के बाद हमारी गाड़ी मुख्य मंदिर के द्वार के सामने थी। हमने अपनी पादुकायें वहीँ एक लड़के के पास जमा कर दी और अन्दर गए। अन्दर जो देखा, उससे हम अचंभित हुए बिना नहीं रह सके। पत्थर को तराश कर की गयी अद्वितीय कारीगरी ने मानो हमारे कदम रोक लिए हों। शिव-मंदिर के मुख्य द्वार के दोनों ओर जिन गण की मूर्तियाँ थीं, उनके पेट इस प्रकार तराशे गए थे मानो वे नंदी का मुख हों।
Asur dwarpal at Talakadu

Deva dwarpal at Talakadu
मंदिर के कोने में पाँच फण वाले नाग विराजमान थे।
Five hooded snake with rings

Ganesha riding the mouse
एक ही पत्थर से तराशी गईं कड़ियाँ जिनमे मंदिर के घंटे लटकाए जाते थे, कलाकारी का अद्भुत नमूना थे। मंदिर परिसर में अनेक शिव-लिंग और नंदी की अनेक मनभावन प्रतिमाएँ थीं।
तकरीबन आधा घंटा मंदिर परिसर में बिता कर हम नदी किनारे आ गए। नदी का तट देख गंगा नदी की याद आ गयी। पतित-पावनी गंगा के किनारे सफ़ेद रेत का नज़ारा जिसने आत्मसात कर रखा हो, वो इस भावना को भली-भांति समझ जायेगा।
Talakadu beach
नदी के किनारे अनेक भोजशालायें थीं जिनमे  नाना प्रकार के व्यंजन उपलब्ध थे। हमें देख सभी में होड़ सी लग गयी कि कौन ज्यादा प्रभावशाली तरीके का इस्तेमाल कर संभावित ग्राहक को अपना वास्तविक ग्राहक बनाने में कामयाब होता है। नदी किनारे बैठने की अच्छी व्यवस्था थी। कई लोग परिवार सहित वहाँ वनभोज का आनंद उठा रहे थे तो अन्य कई नदी में नौका-विहार का आनंद ले रहे थे।
यहाँ आ कर एक अविश्वसनीय कथा के बारे में पता चला। यह कथा मैसूर के वाडियार राजवंश के पुत्रहीन होने के श्राप और उस श्राप के तलाकाडू से संबंध के बारे में है। वापस आने पर जब मैंने थोड़ी पड़ताल की तो एक लेख सामने आया। आप सब भी इसे पढ़े। अच्छा लगेगा।
अब सूरज सर पर था। हमने इन अद्भुत नजारों को अलविदा कहा और सोमनाथपुर की ओर निकल चले। तकरीबन पौन घंटे की यात्रा के बाद हम सोमनाथपुर के केशव मंदिर प्रांगण के द्वार पर थे।
Keshav temple, Somnathpura
माना जाता है कि तेरहवीं शताब्दी में होयसला राजा नरसिंह तृतीय के सेनापति सोमनाथ दंडनायक ने यहाँ “विद्यानिधि प्रसन्न सोमनाथपुर” की स्थापना की और भगवान विष्णु को समर्पित “केशव मंदिर” बनवाया था। पूर्व दिशा में भव्य मुख्य-द्वार “नवरंग मंडप” है। हमने जब मुख्य मंदिर में प्रवेश किया तो अन्दर काफी अँधेरा था। तेज़ धूप से आने के कारण हमें वहाँ के माहौल में ढ़लने में कुछ मिनट लगे। तीन गर्भ-गृहों वाले इस मंदिर में विष्णु, वेणुगोपाल और जनार्दन स्थापित हैं।
Keshav temple, Somnathpura

Keshav temple, Somnathpura

Keshav temple, Somnathpura
अनेक स्तंभों वाले सार्वजनिक कक्ष में की गयी मूर्तिकारी और नक्काशी उस समय के कलाकारों की अद्भुत क्षमता का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
Keshav temple, Somnathpura

Keshav temple, Somnathpura

मुख्य मंदिर के चारों ओर चौंसठ गर्भ-गृह बने हैं। हमें बताया गया कि इन में अन्यान्य देवी-देवताओं का पूजन होता था। गर्भ-गृहों के सामने गलियारे के स्तंभों की कारीगरी ने हमें अचंभित कर दिया। वहाँ कई खंडित मूर्तियाँ भी थीं। तकरीबन एक घंटे का समय बिता कर हम मैसूर की ओर बढ़ चले।
आधे घंटे में हम अपने होटल के सामने थे। सफ़र के थकान और भूख ने अगले तीन घंटे हमें व्यस्त रखा। थोड़े तरो-ताज़ा होने के बाद हम चामुंडेश्वरी देवी के दर्शनों को चल दिए। माना जाता है कि यहीं पर आदि-शक्ति ने महिस-असुर का वध किया था। कालांतर में ऋषि मार्कंडेय ने यहाँ अष्ट-भुज महिस-मर्दिनी के मंदिर की स्थापना की।
Chamundeshwari Temple

Mahisasur at chamundi hill
होयसला, विजयनगर और मैसूर के शासकों की इस पवित्र मंदिर में अटूट आस्था थी और उन्होंने समय-समय पर परिसर का विस्तार और जीर्णोद्धार कराया। मुख्य द्वार पर सात तलोंवाले गोपुर की सुन्दरता और भव्यता मनमोहक है। इस क्षेत्र में प्रवेश मात्र से मन को इतनी शांति मिली कि एक घंटा कब बीता, पता ही नहीं चला। पहाड़ी के शिखर से मैसूर शहर के पीछे सुदूर क्षितिज के पीछे अस्ताचल सूर्य की लालिमा मन्त्र-मुग्ध करने वाली थी। कुछ देर रुक कर हमने इसका आनंद लिया और फिर लौट चले।
Nandi at chamundi hill
लौटते वक़्त हम पंद्रह मिनट के लिए नंदी के मंदिर भी रुके। नंदी की सोलह फ़ीट ऊँची  और चौबीस फ़ीट लम्बी विशाल पाषाण प्रतिमा की भव्यता देखते ही बनती है। हमें बताया गया कि यह प्रतिमा कोई तीन-साढ़े तीन सौ वर्ष पुरानी है! यहाँ हमने देखा कि अनेक श्रद्धालु मूर्ति पर सिक्के चिपका रहे हैं। ये हमें कुछ अजीब तो लगा किंतु आस्था के समक्ष तर्क का क्या काम?
घड़ी ने बताया कि शाम के पौने सात बज चले हैं। यूँ तो सूरज ढ़ल चुका था किंतु उसका प्रकाश अब भी हमारे साथ था। हमें शहर लौटने में बमुश्किल पंद्रह मिनट लगे और इन पंद्रह मिनटों में अँधेरे ने शहर को अपनी आगोश में ले लिया था। जगमगाते प्रकाश-स्तंभ और आती-जाती गाड़ियों की लाल-सफ़ेद रौशनी से सराबोर ये सड़कें, दिन-रात के अनंत चक्र-गति में न जाने कितने यायावरी सपनों को उनकी मंजिलों तक पहुँचाती होंगी। यूँ तो हमारा विचार था कि मैसूर पैलेस में होनेवाली प्रकाश-व्यवस्था का आनंद लिया जाए किंतु वहाँ पहुँच कर ज्ञात हुआ कि कुछ तकनीकी कारणों से ये बंद है और इसे पुनः शुरू होने में तकरीबन महीना भर लगेगा। हमारा मन निराशा से भर गया। तकरीबन घंटे भर मैसूर के बाज़ारों-दूकानों का जायज़ा लेने के बाद हम विश्रामगृह लौट आये।

रात्रि के भोजन के पश्चात बस बिस्तर पर गिरने की देर थी कि.... अच्छा! आप सबको भी शुभ-रात्रि। शेष भाग बाद में। 


इस यात्रा-वृतांत को इ-बुक के रूप में भी पढ़ सकते हैं: http://matrubharti.com/book/5313/

Wednesday, September 2, 2015

मेघ गीत


 

छाए हैं चहुँ ओर, घटा घनघोर

कड़ड़ कड़ बिजुरी चमके

आसमान के श्याम पटल पर

इठलाती सी दामिनी दमके

 

झूम रहे दिक्, जीव-जंतु सब

पवन झकोरे उन्हें झुलाते

उमड़ घुमड़ कर काले बादल

जीवन ही का अक्स बनाते

 

गिरती बूँदें, मदमाती सी

गिरे उधर, हों जिधर हवायें

दामन में उनको भर लेने

धरा खड़ी बाहें फैलाये

 

धरती से उड़-उड़ कर पानी

पहले हैं बादल बन जाते

उमड़-घुमड़ कर, गरज-बरस कर

धरती की हैं प्यास बुझाते

Saturday, August 29, 2015

शुक्रिया


 

1

सुबह के आठ बजे हैं। यूँ तो इस वक़्त जीवन के हाथों में चाय का प्याला होता है किन्तु आज ऐसा नहीं है। बॉस ने कल ही ताकीद की थी कि कल दस बजे तक चाईबासा पहुँच जाना। कंपनी के नए विपणन कार्यालय का उद्घाटन होना है। सारे इंतजामात की जिम्मेदारी जीवन के सर डाल बॉस तो निश्चिन्त थे किन्तु जीवन? बेचारा! मरता क्या न करता। सुबह से बॉस दसियों बार फ़ोन कर चुके थे। अपनी बाइक पर बैठ उसने पलट कर देखा। वर्षा दरवाज़े पर खड़ी थी।उसकी मुस्कराहट ने जीवन के अंदर मानो नवजीवन का संचार कर दिया। जाती हुई बाइक की आवाज़ जब तक आती रही, वर्षा दरवाज़े पर ही खड़ी रही।

जीवन को घर से निकले आधा घंटा बीत चुका है और वह कुल-जमा नौ किलोमीटर की दूरी तय कर पाया है। उसने मन-ही-मन हिसाब लगाया। अभी लगभग सैंतालीस किलोमीटर का फासला बचा था। अगर हालात ऐसे ही रहे तो उसे अभी दो से ढ़ाई घंटे और लगेंगे। अचानक उसे लगा जैसे उसके मोबाइल की घंटी बज रही हो। मन-ही-मन वह झल्ला उठा - "ज़रूर बॉस होगा। बेवक़ूफ़! उसे लगता है कि बार-बार फ़ोन करने से काम जल्दी हो जाता है।" उसने बायाँ ब्लिंकर जलाया और गाड़ी सड़क किनारे खड़ी कर दी। उसने फ़ोन जेब से निकाला। वह अभी तक बज रहा था। स्क्रीन पर निगाह डाली तो नाम लिखा था - अरशद।

“हेलो”

“जीवन, यार मैं बड़ी मुसीबत में आ गया हूँ। नादिरा की प्रेगनेंसी में कंप्लीकेसी आ गयी है। उसे जीवन-ज्योति नर्सिंग होम में भर्ती करवाया है। डॉक्टर ने फ़ौरन सिजेरियन को कहा है। ऑपरेशन के लिए खून चाहिए। तू अभी-के-अभी आ जा मेरे भाई।”

अरशद की कातर ध्वनि ने उसके दिमाग में खतरे की घंटी बजा दी। मुझे अभी लौट चलना है, यह फैसला लेने में उसे क्षण भर भी सोचना नहीं पड़ा। उसने अरशद को सांत्वना दी –

“तू फ़िक्र मत कर मेरे भाई। मैं अभी पहुँचता हूँ। तू बस धीरज रख... और हाँ.... अस्पताल का क्या नाम बताया?”

“जीवन-ज्योति नर्सिंग होम”

“हाँ... हाँ... मैं समझ गया। तू पेपर्स रेडी कर। मैं बस पहुँचता हूँ।”

 

 

2

जीवन और अरशद जब ब्लड बैंक पहुँचे तो वहाँ ज्यादा चहल-पहल नहीं थी। अरशद ने स्वागत-कक्ष में बैठी महिला की ओर अपने कदम बढ़ा दिए। उसे अस्पताल के कागज़ सौंप वह माहौल का जायज़ा लेने लगा। खानापूर्ति में लगभग पाँच मिनट लगे होंगे। अब वे दोनों रक्त-दान कक्ष में श्री राव के सामने थे। ब्लड-ग्रुप की जाँच के बाद उन्होंने आगे की कार्रवाई अपने सहकर्मी डॉ एंजेला मुर्मू को सौंप दी। डॉ एंजेला डॉक्टर नहीं, जादूगर थीं। उनकी बातों-बातों में रक्त-थैली कब भर गई, इसका पता न तो जीवन को चला, ना ही अरशद को।

जीवन जब रक्त-दान कक्ष से बाहर निकला तो देखा कि अरशद बड़ी बेसब्री से उसका इंतज़ार कर रहा है। उसने अपने हाथ में पकड़ा कागज़ अरशद की ओर बढ़ा दिया –

“ये पेपर्स जल्दी से जमा कर दे। तुझे रिप्लेसमेंट में ब्लड मिल जायेगा।”

अरशद ने एक नज़र उस कागज़ को देखा। उसकी आँखों में मानो छलक उठने को बेताब समंदर उमड़ रहा था। कृतज्ञता ने मानो उसकी ज़ुबान लड़खड़ा दी। हाथों को जोड़ वह धीमे स्वर में सिर्फ इतना ही कह पाया –

“शुक्रिया”

शब्द निकले तो लहरों ने भी सीमाएँ लाँघ दी। आँखों से गंगा-जमुना बह निकली। भावनाओं का समंदर इस कदर उफना कि शरीर और आवाज़, दोनों कांपने लगे।

“शुक्रिया मेरे भाई”

दोस्त के आँसू देख जीवन भी अपने को रोक नहीं पाया। बस एक कदम की ही तो बात थी। दोनों को गले मिला देख ब्लड बैंक के कर्मचारी भी आश्चर्यचकित थे। “खून का रिश्ता” भला इससे अच्छा क्या होता होगा?

 

 

 

3

अस्पताल के प्रसूति-कक्ष के सामने माहौल बड़ा ही अजीब था। जिन्हें खुशखबरी मिल चुकी थी, वे अपने रिश्तेदारों तक उसे अग्रसारित करने में लगे थे। जिन्हें अभी खुशखबरी का इंतज़ार था, वे बरामदे में चहलकदमी कर रहे थे। प्रसूति-कक्ष का दरवाज़ा जरा भी आवाज़ करता तो सारे उस ओर लपकते। अरशद गुमसुम सा एक कोने में खड़ा था। जीवन बरामदे में लगे पोस्टर पढ़ने में व्यस्त था। समय काटने का इससे अच्छा तरीका भला और क्या हो सकता था। जीवन ने देखा कि तमाम सादे पोस्टरों के बीच एक चमकीले लाल रंग का पोस्टर है। उसने नजदीक जा कर देखा। वह रक्तदान से संबंधित एक पोस्टर था जिसमें लिखा था – एक रक्तदान तीन लोगों की ज़िंदगियाँ बचा सकता है।

अचानक प्रसूति-कक्ष का दरवाज़ा खुला और एक नर्स ने बाहर निकल कर आवाज़ दी –

“नादिरा के साथ कौन है?”

अरशद तुरंत हरकत में आया –

“जी... मैं हूँ।”

“मुबारक हो, नादिरा को लड़की हुई है। माँ और बच्चे को दो घंटे बाद पोस्ट-ऑपरेटिव वार्ड में शिफ्ट कर देंगे। फिर आप उनसे मिल सकते हैं। चलिए... यहाँ साइन कीजिए।”

साइन करके अरशद पलटा तो जीवन पीछे ही खड़ा था। उसने अरशद को मुबारकबाद दी। दोनों बाहर निकलते वक़्त उसी पोस्टर के सामने से गुज़रे। उसे देख जीवन थोड़ा ठिठका। अरशद ने पूछा –

“क्या हुआ?”

“कुछ नहीं” जीवन ने कहा।

“बस ये सोच रहा हूँ कि अगर एक रक्तदान तीन ज़िंदगियाँ बचा सकता है तो दो ज़िंदगियाँ तो आज मैंने बचा लीं। अब पता नहीं कि तीसरी ज़िन्दगी किसकी बचेगी।”

दोनों ने एक दुसरे को देखा और मुस्करा दिए। अरशद बोला –

“तू भी न यार...”

 

 

4

सुबह के दस बज चुके हैं और जीवन बड़ी तेज़ी से अपने नाश्ते को निपटाने में व्यस्त है। हो भी क्यों नहीं? उसे कल ही चाईबासा पहुँच कर सारा इंतज़ाम मुकम्मल करना था किंतु इंसानियत का तकाज़ा कुछ और ही था। जीवन इस बात से प्रसन्न था कि उसने इंसानियत को शर्मसार नहीं होने दिया। वह इस बात से भी खुश था कि बॉस ने भी उसकी बात समझी थी, लेकिन नादिरा और बच्ची से मिल कर लौटने में रात ज्यादा हो गयी। खैर, जैसे-तैसे नाश्ते को ख़त्म कर उसने पत्नी को आवाज़ दी –

“वर्षा... ओ वर्षा!”

किचन में व्यस्त वर्षा के कानों में जैसे ही उसकी आवाज़ पहुंची, उसने प्रत्युत्तर दिया –

“जी... आई”

जीवन ने जब तक अपने हाथ धोये, वर्षा तौलिया लिए पीछे खड़ी रही। हर रोज़ की तरह बैग उठाए वह अपनी मोटरसाइकिल की ओर बढ़ गया। वर्षा भी दरवाज़े पर खड़ी उसे जाते हुए देखते रही। मोटरसाइकिल पर बैठ जब वह पलटा तो पाया कि पत्नी मुस्कुरा रही है। उसे आत्मिक शान्ति की अनुभूति हुई। कोई तो है जो उसके घर से जाने के बाद उसके वापस लौटने की राह तकता है। एक स्वतःस्फूर्त मुस्कान उसके अधरों पर खेलने लगी।

पति को विदा कर वर्षा जब अन्दर आई तो देखा कि घड़ी में साढ़े-दस बज रहे हैं। उसे याद आया कि उसके पसंदीदा धारावाहिक का समय हो चला है। सोफे पर बैठ, धारावाहिक देखते-देखते कब वह लेट गई और लेटे-लेटे कब नींद ने उसे अपनी आगोश में ले लिया, उसे पता भी न चला। अचानक फ़ोन की ध्वनि से उसकी नींद उचट गई। उसने घड़ी की ओर नज़र घुमाई। ये क्या? ये तो ढ़ाई बज गए! फ़ोन अभी भी बज रहा था। उसने फ़ोन उठा लिया –

“हेलो”

“क्या ये मिस्टर जीवन का नंबर है?”

“जी हाँ, मैं उनकी पत्नी। जी कहिए।”

“जी मैं सदर अस्पताल से इंस्पेक्टर संजय चौबे बोल रहा हूँ। उनका एक्सीडेंट हो गया है।”

“क्या?”

“जी हाँ, अच्छा होगा अगर आप तुरंत ही यहाँ चले आयें। उनका काफी खून बह गया है। वार्ड नंबर ३ के बेड नंबर ७ पर उन्हें खून चढ़ाया जा रहा है।”

वर्षा का दिमाग इस खबर से मानो सुन्न हो गया। वह धम्म से सोफे पर बैठ गयी। एक पल को उसे अपने आस-पास की दुनिया आभासी लगने लगी। अनिष्ट की आशंका ने सोचने-समझने की शक्ति को ही मानो क्षीण कर दिया था। आँखों के आगे धुंधली काली चादर यूँ लहरा रही थी मानो साक्षात् काल हो। हिम्मत बटोर कर उसने सामने पड़े ग्लास को उठाया। उसमें अब भी दो-तीन घूँट पानी था। सूखता गला जब तर हो गया तो जैसे दिमाग को भी नया जीवन मिला। उसने तुरंत फ़ोन कर अरशद को बुलाया।

दोनों जब अस्पताल पहुँचे तो देखा कि जीवन को खून चढ़ाया जा चुका है। वह पूरी तरह से होश में था। उसे सही-सलामत देख वर्षा के दिल का सारा डर आँसू बन बह निकला। पति के बगल बैठ उसने जीवन का हाथ अपने दोनों हाथों से कस कर थाम लिया। उसके प्रेम के आवेग को जीवन भी पूरी तरह से महसूस कर पा रहा था। जब उसका एक्सीडेंट हुआ था तो उसे ऐसा लगा था कि अब वह कभी भी अपनी पत्नी को नहीं देख पाएगा। अब जब वर्षा का हाथ उसके हाथ में था, उसे यकीन होने लगा था कि दोनों कभी जुदा नहीं होंगे।

अचानक जीवन की नज़र पीछे खड़े अरशद पर पड़ी। उसने अपना दूसरा हाथ आगे बढ़ाया तो अरशद ने भी आगे बढ़ कर उसका हाथ थाम लिया। दोनों मुस्कुरा उठे। जीवन ने कहा –

“यार अरशद! आज तीसरी ज़िन्दगी भी बच गयी यार।”

 

Tuesday, July 7, 2015

कैसी हो हमारी लाइफ?

जीवन क्या है?
 
चंद टुकड़े समय के?
जिन पर हो सवार
देह-आत्मा की जुगलबंदी
चलती है लगातार
 
या कि मन है?
करता सदा स्वयं से घर्षण
निरंतर, एक से बढ़ कर एक
कामनाओं का दर्पण
 
प्रश्न अति-सरल है किंतु उत्तर अति-कठिन. बिलकुल उसी तरह जिस तरह नचिकेता ने प्रश्न किया था – मैं कौन हूँ? मैं यानि? क्या मेरा नाम? मेरा खानदान? मेरे शहर का नाम? मेरा पेशा? इसके अनेक जवाब संभव हैं. सभी सही हैं और नहीं भी. सभी जीव-जंतुओं में मानव जीवन को श्रेष्ठ माना गया है. क्यों? आखिर हमारे भी सर-धर, हाथ-पाँव और ज्ञानेन्द्रियाँ जानवरों की तरह ही तो हैं. जो बात हमें जानवरों से अलग करती है, वह है विवेक. विवेक यानि सही और गलत में फर्क कर पाने की क्षमता. ये ठीक उसी प्रकार है जिस प्रकार मानसरोवर का हँस पानी में मिले दूध से दूध पी जाता है और पानी को यथावत छोड़ देता है. इंसानों और जानवरों में एक और फर्क होता है – इंसानियत का.
जब भी मैं अपनी ज़िन्दगी के बारे में सोचता हूँ, इंसान की मूल भावना मुझ पर भी हावी हो जाती है. मैं भी चाहता हूँ कि मैं एक सुखमय जीवन जियूं. हमारी सुखमय जीवन की परिकल्पना ढेर सारे पैसे, बड़ा बंगला, बड़ी गाड़ी, सुंदर पत्नी, सफल बच्चे, सेवा में तत्पर नौकरों की फ़ौज और सालाना विदेश की सैर जैसी अवधारणाओं से शुरू और इन्ही पे ख़त्म होती है. भौतिकतावादी दुनिया में ऐसा सोचना या इच्छा रखना न तो असामान्य है, न ही अनैतिक. बल्कि मैं तो कहूँगा कि बाजारवाद हमें एक उपभोक्ता की तरह देखता है और हमें इसी ओर प्रेरित भी करता है. लेकिन एक सच्चाई और भी है कि -
हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमां मगर फिर भी वो कम निकले
भौतिक सुख-सुविधाओं की चाहत इतनी हो जाती है कि लोग सही-गलत का फर्क भूलने लगते हैं. एक छोटी सी कहानी सुनाता हूँ. मुंबई में एक सेठ रहते थे. उनका ड्राईवर पैंतीस सालों से उनके साथ था. वह जब बूढ़ा होने लगा तो उसने अनुरोध करके अपने जवान पुत्र को सेठ जी के ड्राईवर की नौकरी दिलवा दी. पिता की ही तरह पुत्र भी मनोयोग से सेठजी की सेवा में रत रहने लगा. फिर एक दिन नौजवान की शादी हुई. शादी के बाद जब वह पहली बार सेठजी के घर पहुँचा तो उन्होंने अपनी गाड़ी की चाबी देते हुए कहा कि बेटा, मैं तुम्हे आज की छुट्टी देता हूँ. मेरी गाड़ी ले जाओ. ये हज़ार रूपए भी रखो. पेट्रोल भरवा लेना. दिन भर पत्नी को मुंबई घुमा दो. मेरी तरफ से शादी का तोहफा समझना. अँधा क्या चाहे – दो आँखे! दिन भर घुमाने के बाद उसने गाड़ी जुहू चौपाटी पर लगा दी और खुद भेल लेने चला गया. इस बीच गाड़ी के बगल से औरतों का एक झुण्ड गुजरा. सजी-संवरी नई-नवेली दुल्हन को चमचमाती गाड़ी में देख एक ने कहा – वाह, क्या तकदीर है सेठानी की. खुद भी चमक रही है और गाड़ी भी. बात दुल्हन के दिल में लग गयी. पति जब लौटा तो जिद पकड़ ली कि उसे भी ऐसी ही गाड़ी चाहिए. परिजनों ने लाख समझाया कि विदेशी गाड़ी नौकरों के बस की बात नहीं थी पर बात दिल में अन्दर तक उतर चुकी थी. न उसे मानना था, न वो मानी. उसकी तो भूख मिट गयी थी, रातों की नींद उड़ गयी थी. पति जो भी कमाता, उसका दो-तिहाई हिस्सा जमा कर देती. मुख मलिन होने लगा, काया क्षीण होने लगी किंतु जिद थी कि समय के साथ बलवती होती जाती थी. इतने पर बात बनती न दिखी तो वह सेठजी के घर नौकरानी बन गयी. आखिर कुछ अतिरिक्त पैसे आयेंगे तभी तो सपना पूरा होगा.
इस बीच पाँच साल गुजर गए. एक दिन पता चला कि सेठ जी उस गाड़ी को बेचने वाले हैं. धूमिल होते सपने पुनः आँखों में चमकने लगे. बड़े मन-मनौव्वल के बाद सेठजी ने कम कीमत में ही गाड़ी उसे बेच दी. दुल्हन की ख़ुशी का ठिकाना न रहा. उसने पति से फरमाइश की कि आज फिर वहीं भेल खाने चलते हैं जहाँ शादी के बाद गए थे. दोनों गाड़ी में वहाँ पहुंचे. पति ने गाड़ी लगाई और भेल लेने चला गया. पुनः कुछ महिलाएँ उधर से गुजरीं तो दुल्हन सजग हो गयी. उनमे से एक ने कहा – इतनी चमचमाती गाड़ी में ये कैसी मनहूस और दरिद्र औरत बैठी है. लगता है कि सेठ की गाड़ी में उसकी नौकरानी घूमने चली आई है.
हमारी हालत भी कमोबेश उसी दुल्हन की तरह है. स्वर्ण-मृग की तृष्णा में हम ऐसे भटक जाते हैं कि पता ही नहीं चलता कि जीवन की छोटी-छोटी खुशियाँ कब हमसे किनारा करके निकल गईं. जब लक्ष्य पाते हैं, तब जा कर एहसास होता है कि लक्ष्य का पीछा करते-करते ज़िन्दगी से ही दूर निकल आये हैं. सच ही तो कहा है कि –
उम्र-ए-दराज़ मांग कर लाये थे चार दिन
दो आरज़ू में कट गए दो इंतज़ार में
जबकि सच्चाई यही है कि हमारा जीवन बहुत थोड़े में मजे से कट सकता था. हम जीवन को भरपूर जी सकते थे, समाज को कुछ दे सकते थे. हम ये क्यों भूल जाते हैं कि स्वर्ण-मृग की चाहत ने जब स्वयं ईश्वर के अवतार श्रीराम तक को वन-वन भटका दिया था तो हम तो तुच्छ मनुष्य हैं. कहा भी गया है -
साईं इतना दीजिए, जा में कुटुम समाए
मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु न भूखा जाए
आज एक और बात कहना चाहता हूँ. जीवन अत्यंत जटिल है. हम एक बार में तीन जिंदगियाँ जीते हैं. पहली है शारीरिक ज़िन्दगी जो कि आत्मा के शरीर छोड़ देने के साथ ख़त्म हो जाती है. हम जितने भी सुख-साधन जुटाते हैं, वो शरीर के काम आते हैं. दूसरी है मानसिक ज़िन्दगी. ये जीवन का भावनाओं वाला स्तर है. हम जो भी सोचते-समझते और महसूस करते हैं, वही हमारे विचार और व्यवहार में बदलता है. यही असल में हमारे सुख-दुःख का कारण बनता है. तीसरी ज़िन्दगी होती है – आत्मिक ज़िन्दगी. ये आत्मा के स्तर पर होती है. यही वो स्तर है जो विपरीत परिस्थितियों में हमें कमज़ोर नहीं पड़ने देता और अनुकूल परिस्थितियों में उन्मत्त नहीं होने देता. यह इंसान को विनयशील और दयालु बनाता है. इंसान इस बात को समझने लगता है कि “मुझमें जो कुछ अच्छा है, सब उसका है; मेरा जितना चर्चा है, सब उसका है”.
मैं तो फ़कत यही चाहता हूँ कि मेरी ज़िन्दगी ऐसी जगह कटे जहाँ सब पर ईश्वर की कृपा हो. सभी स्वस्थ रहें, मिल कर रहें, मुस्कुराते रहें. जानता हूँ कि ज़िन्दगी कभी मुक्कमिल नहीं होगी, हमेशा किसी-न-किसी बात की कमी होगी. तुम चंद कदम साथ चलो तो, मेरी लिए जन्नत यहीं होगी.

Wednesday, July 1, 2015

मेरे मन की बात – पापी पेट का सवाल है

बारिश जैसे ही थमी, मैं तेज़ी से बाज़ार की ओर चल दिया. रास्ते में मैंने देखा कि भीड़ लगी है. मन में उत्सुकता हुई कि देखूँ तो, आखिर बात क्या है. पास पहुँचते ही डमरू की डुगडुग के साथ ही जोर की आवाज़ आई –

“जम्हूरे, साहब लोगों को खेल दिखायेगा?”

“हाँ उस्ताद दिखायेगा”

“क्या खेल दिखायेगा?”

“रस्सी पर करतब दिखायेगा उस्ताद”

“जम्हूरे, साहब लोग खुश हुए तो पैसे देंगे”

“हाँ उस्ताद, पैसे मिलेंगे तभी तो पेट चलेगा”

“तो साहब लोगों को खुश करेगा जम्हूरे?”

“हाँ उस्ताद”

“और ये तेरा बन्दर क्या बैठे-बैठे रोटियां तोड़ेगा?”

“ना उस्ताद, ये भी खेल दिखायेगा. आखिर पापी पेट का सवाल है. क्यों रे मोहन (बन्दर)?”

जवाब में बन्दर गुलाटियां मारता है, उस्ताद डमरू बजाता है और भीड़ तालियाँ बजाती है. मैं आगे बढ़ जाता हूँ. भूख के सामने जब शेर हंटर के आदेशों का पालन करने को मजबूर हो जाता है तो ये तो बन्दर ही है. और जम्हूरे की क्या बात करूँ? सरकारें लाख कहती रहें कि “सब पढ़ें, सब बढ़ें”, सारे जम्हूरे ये ही कहते हैं कि “माई-बाप, पापी पेट का सवाल है”. ऐसे में “बाल-श्रम” और “पशु-क्रूरता” निषेध जैसी बातें मजाक लगने लगती हैं.

खैर, मैं आगे बढ़ा तो एक पुराने परिचित मिल गए. कहने लगे कि आज-कल बड़े भागे-भागे फिरते हो. बात क्या है? मैंने कहा कि ऐसी कोई बात नहीं, बस काम थोड़ा बढ़ गया है और पारिवारिक जिम्मेदारियाँ भी, सो ज़रा मसरूफ़ हो गया हूँ. वे बोले कि आज कोई बहाना नहीं चलेगा. बड़े दिनों पर मिले हो. एक कप चाय तो साथ में पी ही सकते हो. मैंने कहा कि क्यों नहीं किंतु आज की चाय मेरी तरफ से. वे तुरंत राजी हो गए. मैंने चाय के साथ समोसे भी मँगवा लिए. मेरे मित्र ने पहला कौर उठाया, आँखें बंद कर ईश्वर को धन्यवाद दिया और मेरी तरफ देख कर बोले – अन्नदाता सुखी भवः! मैं मुस्कुरा उठा. शायद मेरा मुस्कुराना उन्हें अच्छा नहीं लगा था. उनकी प्रश्नवाचक दृष्टि मेरी ओर मुखातिब थी. मैं बोला –

“पता नहीं इस देश का असली अन्नदाता कब सुखी होगा.”

“सही कहते हो. अभी कल ही की बात है, शाम को मैं सब्जी लेने निकला. पत्नी की सख्त हिदायत थी कि टमाटर ज़रूर ले आना. भाव पूछा तो टमाटर पचास रूपए किलो. मैं दाम सुन कर मायूस हो गया. घर लौटते वक़्त मुझे एक व्यक्ति मिला. उसने बताया कि उसके पास करीब बीस किलो टमाटर बचे हैं, यदि मैं पूरे लेना चाहूँ तो दो सौ रुपयों में वह उसे बेचने को तैयार है. मैंने पुछा कि भाई इतना सस्ता? उसने कहा कि मैं किसान हूँ. इस उम्मीद में करीब सौ किलो टमाटर ले आया था कि शहर में शायद ज्यादा कमाई हो जाए लेकिन मुझे मंडी में घुसने ही नहीं दिया. दलालों ने कहा कि सारा टमाटर पाँच रूपए के भाव हमें बेच जाओ. मैं क्या करता? गली-गली घूम कर दिन भर में अस्सी किलो तो बेच लिए पर अब अँधेरा हो रहा है. इतने टमाटर वापस ले जाऊं तो पचास रूपए इसी का भाड़ा लग जायेगा. कल इसे वापस लाने के और पचास रूपए लगेंगे, तो अब जो भी मिल जायेगा, वो दाम ले लूँगा.”

“फिर आपने क्या किया?”

“मैंने उससे कहा कि मेरे लिए दो किलो टमाटर तौल दे.”

“बाकी के टमाटरों का क्या हुआ?”

“मैंने उससे कहा कि बाकी के टमाटर मेरे घर पर रख दो. सुबह और सब्जियों के साथ आना और इन्हें ले जाना. तुम्हारा भाड़ा बच जायेगा.”

मैं सोचने लगा. भारत किसानों का देश है. हमारी बहुसंख्य आबादी खेतिहर है, ग्रामीण है. बचपन की एक बात बताता हूँ. गर्मी की छुट्टियों में एक रिश्तेदार के घर गया था. खेतों के बीच उनके बड़े से घर के सामने कृषि-उपकरण रखे थे. एक ओर गायें बंधी थी. दृश्य बिलकुल किसी भारतीय ग्रामीण घर की अवधारणा की प्रतिमूर्ति की तरह जान पड़ता था. घर के पिछवाड़े आमों का छोटा सा बाग़ था. आम के कोई सात-आठ पेड़ होंगे. लीची और कटहल के भी पेड़ थे. सुबह से शाम तक बस आम और आराम! उसी दरम्यान उनके पिताजी से मिलने कुछ लोग आये. बातें चल रही थी. उसी बीच उन्होंने कहा –

उत्तम खेती, मध्यम बाण

अधम चाकरी, भीख निदान.

तब इसका मतलब समझ नहीं आया था. बस शब्द अच्छे लगे और याद रह गए. बड़े दिनों बाद एक दिन मेरे दादाजी के मुहँ से जब ये ही शब्द सुने तो उनसे मतलब पूछ बैठा. उसका सारांश यही था कि मिटटी ने हमें पैदा किया, उसी ने हमें पाला और एक दिन उसी मिटटी में मिल जाना है. उसकी व्याख्या उस दौर के भारतीय जनमानस की मनःस्थिति और मिटटी से उनके जुड़ाव को भली-भांति रेखांकित करता है. अपनी मिटटी से जुड़ना क्या होता है, उसी दिन समझ आया.

आज का दौर “मास्टर-शेफ़” का दौर है. पनीर-65 के सामने घी में छौंकी अरहर की दाल फीकी हो गयी है. घर आये मेहमान को ग्रामीण गृहस्थ भोजन किये बिना जाने नहीं देता था; पर अब क्या गाँव, क्या शहर, बस एक कप चाय – रिश्ते निभाए! अरे भाई, ये लोगों का दोष नहीं है. महँगाई तो ज़ालिम होती ही है. बेचारे खिलाने वाले क्या करें? और खानेवाले? वे कहाँ कम हैं. चावल-दाल-चोखा-भुजिया-अचार आज कल कौन खाता है? भई स्टेटस भी तो कोई चीज़ है! वो दिन गए जब लोग-बाग एक मुट्ठी सतुआ और एक गाँठ प्याज भर से खुश हो लिया करते थे. नमक-मिर्च अलग से मिल जाये तो सोने पे सुहागा. तब अगर कोई ना-नुकर करे तो मुहँ पे ही कह देते थे – ये मुहँ और मसूर की दाल. अब तो दाल इतनी महँगी हो गयी है कि खरीदने में ही लोगों की दाल न गले!

इसी बात पर मुझे महाभारत का एक प्रसंग याद आता है. पांडव वनवास में थे. उनकी भार्या द्रौपदी को सूर्य-देव से एक अक्षय-पात्र मिला था. इसकी विशेषता थी कि पात्र से तब तक भोजन निकलता रहता था जब तक द्रौपदी इससे भोजन न कर ले. एक बार द्रौपदी ने खा लिया तो फिर अगले दिन ही खाना मिलता था. तो हुआ यूँ कि एक बार दुर्वासा ऋषि अपने साठ हज़ार शिष्यों के साथ पांडवों के आश्रम पहुंचे और भोजन की मांग कर दी. ऋषि दुर्वासा अपने क्रोधी स्वभाव के लिए प्रसिद्ध थे. किंतु परेशानी यह थी कि द्रौपदी भोजन कर चुकी थी. पांडवो के लिए आगे कुआँ पीछे खाई. ऐसे में उन्हें श्रीकृष्ण की याद आई. वे आये. पात्र को देखा. पात्र में एक दाना चावल और साग का छोटा सा पत्ता चिपका था. फिर क्या था! सभी ने मजे से भोजन किया.

किंतु क्या बात इतनी सी थी? नहीं. ज़रा सोचें. हम रोजाना अपनी थाली में कितना अन्न छोड़ देते हैं. भले ही कोई कम छोड़े, कोई ज्यादा, बर्बादी तो बर्बादी ही है. वैसे एक बात कहूँगा – यथा राजा, तथा प्रजा. अभी कुछ दिनों पहले पढ़ा कि FCI के गोदाम में रखे हज़ारों मन अनाज देखरेख के अभाव में सड़ गए. जाँच में पता चला कि ये अनाज वहाँ सालों पहले रखा गया था. जो लोग कंप्यूटर प्रोग्रामिंग जानते हैं, वे दो शब्दों से भली-भांति परिचित होंगे – Queue और Stack. Queue वो जहाँ पहले आने वाला पहले बाहर निकल जाये (FIFO) और Stack वो जहाँ सबसे अंत में आने वाला पहले बाहर निकल जाये (LIFO). गोदामों में जिस तरीके से सामान रखा जाता है वह का नमूना Stack है. ऐसे में प्रबंधन की जिम्मेदारी बनती है कि नियत समय से पहले पुराना अनाज वितरण हेतु बाहर निकल जाये.

एक और छोटी सी खबर पढ़ी – झारखण्ड में भूख से सबर की मौत. बताता चलूँ कि सबर एक लुप्तप्रायः आदिम जनजाति है. अगले दिन खबर का असर देखने को मिला – प्रखंड पदाधिकारी ने सबर परिवार को 10 किलो चावल दिया, उपायुक्त ने कहा कि किसी को भी भूख से मरने नहीं दिया जायेगा, चिकित्सा पदाधिकारी का दावा कि मौत की वजह भूख नहीं, बीमारी थी. एक और खबर आई – झारखण्ड में 67% किशोरियाँ अनीमिया की शिकार. इनमे शहरों में रहने वाली और गरीबीरेखा से ऊपर की लडकियाँ भी शामिल हैं. एक और खबर – मध्याह्न भोजन की ख़राब गुणवत्ता के कारण बच्चों ने खाना खाने से इनकार किया. ऐसी अनेक ख़बरें हैं जो मैं पढ़ता रहता हूँ. आप हिंदुस्तान में जहाँ भी रहते हों, ऐसी ख़बरें कमोबेश आपके निगाहों से होकर भी गुजरती होंगी.

सरकार की अनेक योजनायें हैं कि गरीब को एक रूपए किलो अनाज और न जाने क्या-क्या. क्या सिर्फ योजनायें काफी हैं? उचित गुणवत्ता और मात्रा की बात कोई नहीं करता. यहाँ एक और सवाल प्रासंगिक है – सरकारी योजनायें मुफ्त क्यों? सिर्फ वोट के लिए? क्यों न लाभुकों से साफ-सफाई जैसे आसान और जनोपयोगी कार्य कराये जायें? उन्हें भी संतोष होगा कि वे मेहनत की कमाई खा रहे हैं, मुफ्तखोरी नहीं कर रहे और समाज (जिसका अभिन्न अंग वे स्वयं हैं और कार्य का सीधा फायदा उन्हें ही होगा) को भी फायदा हो! साथ ही हर योजना को घुन की तरह खोखला कर रहे दलालों पर भी लगाम लगेगा.

“मैं चलता हूँ. कभी घर पर आओ. इत्मिनान से बैठ कर बातें करेंगे.”

मैं जैसे नींद से जागा, “हाँ-हाँ, क्यों नहीं. अब मैं भी चलता हूँ.” उनसे विदा लेकर मैं तेज़ क़दमों से सब्जीमंडी आ गया. काले-काले बादल उमड़-घुमड़ रहे थे. कब बरस जायें, कोई ठिकाना नहीं. सोचा कि जल्दी से दो-चार सब्जियाँ लेकर घर चलूँ, कि देखा कि सड़क पर हरा पानी बहा चला आ रहा है. सब्ज़ीवाले ने आवाज़ लगाई – ओ भैया, जरा हटिये. ये वो रंगवाला पानी था जिसे पटल (परवल) रंगने के लिए इस्तेमाल किया गया था. आगे देखा कि नेनुआ और भिंडी भी हरे पानी में डुबकियाँ लगा रही है. बिचारा टमाटर तो तेल-पानी में तैर रहा है. मंडी से निकला तो बदबूदार नाले के किनारे लगे ठेले पर क्या बच्चे, क्या जवान, सभी पूरी-सब्ज़ी-जलेबी खाने में मगन हैं. मैगी पर तो आपने प्रतिबन्ध लगा दिया साहब, इनका क्या करेंगे? क्या ऐसे लाखों खोमचेवाले हर दिन हमारे स्वास्थ्य से खिलवाड़ नहीं करते? इनपर कार्रवाई की बात आये तो गरीब-विरोधी का ठप्पा लगने का डर हो जाता है.

पुरानी कहावत है – जैसा खाओगे अन्न, वैसा होगा मन. क्या हम सही भोजन कर रहे हैं? क्या भोजन की गुणवत्ता और मात्रा उचित है? क्या हमारा भोजन हमें उचित पोषण देने में सक्षम है? क्या भोज्य-पदार्थों की खरीद-बिक्री पूरी तरह से आर्थिक गतिविधि है या देश का भविष्य इस पर निर्भर है? अनेक प्रश्न हैं जो अभी तक अनुत्तरित हैं. मैंने अपने मन की बात कही. अब फैसला आपके हाथ छोड़ता हूँ.