Thursday, July 15, 2021

परछाई

 जीने की कोशिश करता आदमी,

चला जा रहा, बिना रुके, बिना थके


नही, उसकी कोई कहानी नही है,

परछाई है वो, बिना किसी शरीर के


परछाईयों की कोई कहानी

न थी, न कभी होगी। याद रखना।


कहानी तो स्थूल शरीर की होती है

रौशनी के मोहताज परछाई की नही


पर परछाईयाँ समेटे रहती हैं कहानियाँ

कई किस्से, हँसते-रोते, जागते-सोते


जीने की कोशिश करता आदमी,

बुनता जाता है, परछाईयों के जाल


उन जालों में फँसा समय, बन जाता

कहानी, कोशिश चलती रहती, जीने की।

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