सर्द झील की सतह पर,
कोहरे के सैनिक चलते हैं।
शबनम के मोती ज्यों सारे,
ठिठुरे पेड़ों से झड़ते हैं।
सूरज की धूप को मानो,
आकाश-जाल ने उलझाया।
सर्द हवा के कंपन ने
अच्छे अच्छों को ठिठुराया।
हर रोज भौंकनेवाला वो
कुत्ता भी छुपकर दुबका है।
राख मे छुपी गर्मी पर
हक, आज तो उसका है।
चाय की टपरी पर अब तो
सानिध्य आग का प्यारा है।
मुँह खोलो तो ज्यूँ शब्द जमे
बस चाय का ही सहारा है।