Friday, February 21, 2020

स्त्रियाँ

स्त्रियाँ
जिनके चेहरे नहीं होते 
जिनके घर भी नहीं होते 
जो बनाती हैं दुनिया को
फिर लड़ती रहती हैं ताउम्र
अपनी दुनिया बनाने को
जो हैं सृजनकर्ता 
पर मालिक नहीं हैं 
स्त्रियाँ

Sunday, January 26, 2020

ये कैसा समय?

खामोश सी नदी
आसमान ओढ़े
हैं तेज हवाएँ
मगर लहरें नहीं

लगता है आज
नदी उदास है
रुक सी गई है
झील की मानिंद

हरी जलकुम्भी ने
छिपाया जल-दर्पण
अपना अक्स जहाँ
देखते थे कभी बादल

बीच बीच में
नुकीले चट्टान
भेद हरी चादर
बाहर को निकले

चट्टानों पर कतारें
सफेद बगुलों की
जिनका मछलियों पर नही
कीड़ों पर ध्यान है

तट पर हाहाकार
मचा, वो देखो!
कहाँ? अरे उधर
बहता जाता क्या?

पल में ही भीड़
निठल्लों की
बूढ़ों, बच्चों की
औरतों की

जितने मुंह उतनी
बात बनी
ना जाने किसकी
जान गई

कोई बोला - लगता
है गरीब मजदूर
दाने दाने को तरस
बिचारा चला गया

कोई बोला - आशिक
है, चेहरा तो देखो
हार प्रेम की बाजी
ये जीवन से हारा

पढ़ा - लिखा लगता
है बेरोजगार ये
सपने टूटे तो शायद
ये टूट गया

कोई बोला - बस!
बातें कर लो बड़ी बड़ी
नदी पार करने में
लगता फिसल गया ये

चर्चा चली खूब
अनुमान लगाए सबने
बहता रहा अभागा
आगे, शनैः शनैः

पुलिस आई,
अफसर आए
जनता आई
नेता आए

फिर से हल्ला
फिर है तमाशा
फिर से बातें
तोला माशा

नदी अभी भी
चुप चुप सी है
एक उदासी
ओढ़े सी है

समय की तरह
चुपचाप बहती नदी
देख रही है कोलाहल
और अनिच्छा भी








Thursday, January 16, 2020

राधे बाबू

आज राधे बाबू का जन्मदिन है। यूँ तो उन्हें भी नही पता कि उनका जन्म किस दिन हुआ। माँ को भी सिर्फ इतना याद है कि भीषण गर्मी में वे पैदा हुए थे। शायद वो दिन वटसावित्री व्रत का दिन था। स्कूल में मास्साब ने जन्मतिथि एक अप्रैल की लिख दी। नौकरी भी उसी आधार पर मिल गई। अब कौन याद रखे फिजूल की बातें?

पर आज कुछ खास है। आज राधे बाबू का उनसठवाँ आधिकारिक जन्मदिन है। बस एक साल और। उसके बाद सेवानिवृत्ति! वरिष्ठ नागरिक की श्रेणी में पदार्पण!

Tuesday, January 14, 2020

बागबाँ

बागबाँ भगवान नही,
एक इंसान ही तो है
वो चाहता है कि हों

उत्तर दिशा में दो सहेलियाँ
लाल-नारंगी बोगिनबेलिया
हरे भरे अशोक के बीच
लाल-लाल गुलमोहर पलाश

पूरब है सूरज का कोना
सूरजमुखी वहाँ है होना
तालाब में पानी कम हो
दलदल में खिले कमल हो

पश्चिम में हो मुख्य द्वार
ट्यूलिप के चार कतार
दक्षिण में चमेली के घेर
और लाल-पीले कनेर

कभी काटता है, कभी छाँटता
कभी पूरी क्यारी उखाड़ता
उसे नीले फूल बिलकुल भी
पसंद नहीं, तो लगाया नहीं

उसे फलदार वृक्ष भी
नापसंद, समय लगता है,
सेवा चाहिए, फल के लिए
फूल तो हर दिन आते हैं

उसे नील-माधव और
नीलकंठ भी नही जँचते
शेष-शैय्या शायी, श्रीपति
ही एक उसके आराथ्य हैं

उसे बच्चों से प्यार है
करता उनसे बातें खूब
बाग के बीचों बीच बने
फव्वारे की सीढियों पर

नित नए ढब, नए करतब
नए फसाने, नई कहानियाँ
बच्चे खुश, वो भी खुश
यही तो वो चाहता है

क्या करे बेचारा आखिर
बागबाँ भगवान नही
एक इंसान ही तो है

Monday, December 30, 2019

अलविदा 2019

अलविदा
गुजरे साल
बहुत दिया तुमने
अच्छा लगा, तुम्हारा यूँ
आँसू, खुशी, निराशा, आशा लाना
सहने, लड़ने, डरने, भिड़ने, तत्पर रहने
स्व को स्वनिर्मित करने का जज्बा उभारने
मुझे खुद से बेहतर बनाने के लिए, शुक्रिया।





Monday, December 23, 2019

सर्दियाँ

सर्दियाँ
मौसम नही
एक एहसास है
खुशी का, उत्सव का
अमीरों के गुलाबी शाम हैं
खनकती हँसी, हाथों में जाम है
गरीबों के लिए ठिठुरन, बुझती अलाव है
सुबह जिंदा हैं, यही उत्सव, यही घाव है।

Wednesday, December 4, 2019

सावन की धूप

सावन की धूप

आँगन में पसारे गीले कपड़े
हवा से डोलते, इधर-उधर
काले सफेद बादलों से
आँख मिचौली, खेल खेलती
छन रही सावन की धूप

मुँडेर पर बैठे कबूतर दो
रसोई में चींटियों की कतार
जुटा रहे अपना खाना
क्या पता, कब बदरा बरसे
खो जाए सावन की धूप

बरसाती हवा संग झूलते
मधुमालती के लाल-सफेद फूल
गौरैया के बच्चे, भूखे, गीले
इंतजार- माँ का, भोजन का
उनका संबल - सावन की धूप

धोकर विपुल वट वृक्ष पर्ण
छुपती गायों को गीला करती
अंबर के स्नेह रसबूँदों में
खुद को खोकर, इंद्रधनुष
बन जाती सावन की धूप

Saturday, January 26, 2019

गणतंत्र दिवस की शुभकामनायें

गण का तंत्र है
तंत्र के गण हैं
इनमें कुछ मान्य हैं
तभी गणमान्य हैं

गण की गणना में
कुछ तो मूर्धन्य हैं
मानो, न मानो
कुछ स्वनाम धन्य हैं

जन गण के मन की
कौन कहे, कौन सुने?
मन की ही बात है
मन की ही मानी है

जन के अधिनायक
हे गण के गणपति
हहाकार चहुँ ओर
सत्ता पर मौन है

कौन है वह जन
हर मंत्र से परे है जो?
कौन है वो गण
हर तंत्र से परे है जो?

गण का यह तंत्र है
गण के लिए, गण द्वारा
हाथ हाथ साथ चले
लें सहारा, दें सहारा

Tuesday, January 1, 2019

नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं

अग्रगामी समय रथ के
सद्कर्म हों जब अश्व
सद्गुण बने जब सारथी
जीवन होगा सफल
पूरे होंगे सब मनोरथ

नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं

Friday, July 20, 2018

अमलतास के पीले फूल

अमलतास के पीले फूल
होड़ लेते नव अरूण से
कौन कितना हो सुनहरा 

खुशी की आभा बिखेरे
रास्ते करते हैं रौशन 
हो विटप या हो धरा

भार तज निज किसलयों का 
पुष्प का श्रृंगार करके 
ग्रीष्म भूपति बन खड़ा 

छाँव में इक साँस ले लूँ 
स्वर्ण लड़ियों को निहारूं
देखूँ जी भर के जरा

अमलतास के पीले फूल