होली
है मनभावन,
रंगों का सावन,
रंग गुलाल, पुए पकवान,
हर तरह के भेद मिटाकर,
गली गली मे फगुआ गा कर,
आई बसंत बहार, मनाएँ होली का त्योहार।
होली
है मनभावन,
रंगों का सावन,
रंग गुलाल, पुए पकवान,
हर तरह के भेद मिटाकर,
गली गली मे फगुआ गा कर,
आई बसंत बहार, मनाएँ होली का त्योहार।
सर्द झील की सतह पर,
कोहरे के सैनिक चलते हैं।
शबनम के मोती ज्यों सारे,
ठिठुरे पेड़ों से झड़ते हैं।
सूरज की धूप को मानो,
आकाश-जाल ने उलझाया।
सर्द हवा के कंपन ने
अच्छे अच्छों को ठिठुराया।
हर रोज भौंकनेवाला वो
कुत्ता भी छुपकर दुबका है।
राख मे छुपी गर्मी पर
हक, आज तो उसका है।
चाय की टपरी पर अब तो
सानिध्य आग का प्यारा है।
मुँह खोलो तो ज्यूँ शब्द जमे
बस चाय का ही सहारा है।
रुकी उड़ानें कह रही हैं - जाग रे मानव, जाग!
अव्यवस्था की जंजीरों में, आज लगा दे आग।
फाइलों में है सोई नीतियाँ, और शिथिल है शासन,
चीर हरण कर इठलाता है, आज कोई दुःशासन
जनता की पीड़ा पर, इस मौन का क्या समाधान?
धधक उठा है जन का मन, जो ठेस लगी सम्मान।
जब सत्ता ने जन-पीड़ा को तुच्छ समझकर टाल दिया,
तब जनता ने सत्ताओं को, इतिहास मे डाल दिया।
ओ प्रबंधकों! उत्तर दो, किसका धर्म है छूटा?
क्यों यात्रा का थमा प्रवाह, विश्वास किसने है लूटा?
रनवे पर जो अटका है, वह यान नहीं इक राष्ट्र है,
अटकी है वह आशा, जिसके संरक्षक आप है!
जो कर्तव्य से विमुख हुए, वे अधोपतन को जाएँगे
कालचक्र का खेल अजब है, कहकर फिर पछताएँगे।
कविताएँ अब पढ़ी नही जाती
कोई नही पढ़ता उन्हे
कविता पढ़ने को चाहिए
रगों में लहू, लहू मे उबाल।
आँखो मे करूणा, हृदय मे प्यार
मन मे शांति, विवेक मे धार।
और चाहिए, सीधी एक रीढ़।
इसलिए
कविताएँ अब पढ़ी नही जाती
कोई नही पढ़ता उन्हे।
तुझको याद किया, मुस्कुराता रहा
बेवजह, बेसबब, गुनगुनाता रहा।
तेरे गेसू की खुशबू, हवाओ मे थी
अपने ख्वाबों मे मै, गुल खिलाता रहा।
बादलों मे जो देखा, तो तुम ही मिली
मै ख्यालों मे तुमको, सजाता रहा।
जी करता है छू लूँ, मै नजरो से ही
तुमको देखा तो नजरे चुराता रहा।
सूर्य की चाल पर नजर रखने वालों को दक्षिणपंथी से उत्तरायण सूर्य इस कदर भाता है कि उत्सव का सा माहौल हो जाता है। ठंड से ठिठुर रहे लोगों को सूर्य की आहट मिलती है। गर्माहट की उम्मीद भर से ही, राहत मिलती है।
कोई संक्रांति मनाता है, कोई पोंगल। कोई लोहड़ी मनाता है तो कोई टुसू। अलग जगह, अलग नाम, पर मूल बात वही - सूर्य ने मकर राशि मे प्रवेश कर लिया।
सारा भारतवर्ष एक साथ गा उठता है - दुःख भरे दिन बीते रे भैया, अब सुख आयो रे।
कोई खिचड़ी बनाता है तो कोई दही-चूड़ा का भोग लगाता है। कोई पतंग उड़ाता है तो कोई बीहू गाता है। तिल और गुड़ तो हर कोई खाता है।
भारत के इस अखिल भारतीय पर्व पर कुछ पंक्तियाँ याद आती हैं -
गुड़ का धेला, दही के मटके
हर थाली मे, कतरनी महके
सजधज कर ही, भोर बिहाने
चली बहुरिया गंगा नहाने
बच्चों के हाथों मे लाई
देकर गई है जमुना ताई
मांझा लगाते, पतंग उड़ाते
तिलकुट, गुड़, बताशे खाते
सूर्य देवता मकर को जाते
आज से अपनी तपिश बढ़ाते
हम सब मिल उत्सव मनाए
उत्तरायण का जश्न मनाए
साल के आखिरी दिन मैं मुस्कराया
मन ही मन सोचा तो याद आया
जीने के लिए एक साल मिला था
क्या मैं इसे ढ़ंग से जी पाया?
खुशियाँ मिली तो गम भी मिले
ठोकर लगी पर उठ कर चले
रूक कर चले, चल कर रूके
मुस्कराए, कि एक और साल आया।
जब धाराएँ विपरीत हों
उछलती कूदती तेज गति
किनारे तोड़ देने को आतुर
धारा के विपरीत तैरना ही नही
डट कर जगह पर स्थिर रहना
भी, किसी क्रांति से कम नही।
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बसंत बहार, लाई रस की फुहार
उड़े गुलाल, रंगों की चली धार।
स्वाद भरे, पकवानो की भरमार
मिलजुल कर, होली का हो त्योहार।
होली की हार्दिक शुभकामनाएँ।
उम्मीदों की थामे डोर, एक कदम सपनो की ओर
बीते वर्ष को पीछे छोड़, नए वर्ष में स्वागत है।