"२९ अगस्त यानि दद्दा का जन्मदिन।"
"ऐ सर्किट, दद्दा बोले तो?"
"क्या भाई, दद्दा को नही जानता?"
"अबे सर्किट, PSPO का ad मत कर। मेरा भेजा फ्राई मत कर, वरना गांधीगिरी भूल के टपका डालूँगा।"
"सॉरी भाई, मिस्टेक बिकेम रोंग! भाई, हॉकी के एक महान खिलाड़ी थे - मेजर ध्यानचंद। उन्ही को भाई लोग दद्दा बुलाते थे।"
"ऐ सर्किट, ये भाई लोग हॉकी भी खेलते थे क्या?"
"क्या भाई... आप भी! भाई लोग बोले तो उनके चाहने वाले। एक बात मालूम भाई, उस टाइम पे दुनिया का एक भाई था... भाई बोले तो अपुन के जैसा दुनिया पे राज करने का सपना देखता था - हिटलर। बर्लिन ओलंपिक में जब बाल दद्दा के हॉकी स्टिक से हटती नही थी तो उसने स्टिक बदलवा दिया। "हॉकी के जादूगर" का जादू हिटलर पर भी चला भाई! वो तो अपने दद्दा को अपनी आर्मी का जनरल बनाना चाहता था लेकिन दद्दा ही नही गए।"
"लेकिन आज तेरे को ध्यानचंद कि याद क्यों आई?"
"क्योंकि आज उनका जन्मदिन है।"
"ऐ सर्किट, अपुन हॉकी तो नही खेल सकते लेकिन हॉकी के इस जादूगर की याद में दो मिनट कि श्रधांजलि तो दे ही सकते हैं।"
Friday, August 29, 2008
Sunday, August 10, 2008
उद्यम-सार
आज बड़े दिनों बाद मटकू भइया फिर से दीखे।
"भइया प्रणाम"
"आनंदित रहो! कहाँ था? दिख नही रहा था?"
"था तो यहीं, लेकिन इधर काम का कुछ बोझ बढ़ गया था। इसलिए देर तक काम करना पड़ रहा था। आप सुनाइए... आजकल नीतीश के सुशासन के बड़े चर्चे चल रहे हैं। अखबारों में देखा कि नरेगा की सफलता ने पंजाब में बिहारी मजदूरों की किल्लत कर दी है । "
"अब जब तुम बात निकालिए दिए हो तो तुमको एक छोटा सा कहानी सुनाते है। एक पंजाबी और एक बिहारी को एक ढाबे में रोटी बनाने की नौकरी मिली। दोनों नया था... कभी रोटी तऽ बनाया नही था। खैर... जैसे तैसे दोनों सीखने लगा। जिस दिन बिहारी का रोटी गोल बना वो कोशिश करने लगा कि रोटी कैसे बढ़िया फूले। जब रोटी फूलने लगा तऽ दिन रात यही कोशिश में लगा रहता था की रोटी और ज्यादा गोल कैसे हो... और ज्यादा कैसे फूले।"
"और पंजाबी का क्या हुआ भइया?" मैंने पुछा।
"जिस दिन पंजाबी का रोटी गोल होकर फूल गया, वो बगल में दूसरा ढाबा खोल लिया! कुछ समझा?"
मैं समझने की कोशिश करता रहा.....
"भइया प्रणाम"
"आनंदित रहो! कहाँ था? दिख नही रहा था?"
"था तो यहीं, लेकिन इधर काम का कुछ बोझ बढ़ गया था। इसलिए देर तक काम करना पड़ रहा था। आप सुनाइए... आजकल नीतीश के सुशासन के बड़े चर्चे चल रहे हैं। अखबारों में देखा कि नरेगा की सफलता ने पंजाब में बिहारी मजदूरों की किल्लत कर दी है । "
"अब जब तुम बात निकालिए दिए हो तो तुमको एक छोटा सा कहानी सुनाते है। एक पंजाबी और एक बिहारी को एक ढाबे में रोटी बनाने की नौकरी मिली। दोनों नया था... कभी रोटी तऽ बनाया नही था। खैर... जैसे तैसे दोनों सीखने लगा। जिस दिन बिहारी का रोटी गोल बना वो कोशिश करने लगा कि रोटी कैसे बढ़िया फूले। जब रोटी फूलने लगा तऽ दिन रात यही कोशिश में लगा रहता था की रोटी और ज्यादा गोल कैसे हो... और ज्यादा कैसे फूले।"
"और पंजाबी का क्या हुआ भइया?" मैंने पुछा।
"जिस दिन पंजाबी का रोटी गोल होकर फूल गया, वो बगल में दूसरा ढाबा खोल लिया! कुछ समझा?"
मैं समझने की कोशिश करता रहा.....
Saturday, July 19, 2008
टी वी मुझे देखता है
दिन भर कि किच-किच के बाद जो बंद हुआ दफ्तर
पिंजरे से छूटे पंछी सा, पहुँचा फिर मैं घर
पहुँचा फिर मैं घर, हाल क्या बोलूं भाई
पत्नी झट से चाय-नाश्ता लेकर आयी
गर्म चाय की घूँट से, जब गला हो गया तर
मैं टी वी के सामने बैठा, देखूं ज़रा ख़बर
देखूं ज़रा ख़बर, हाल जानूं दुनिया का
पहली ख़बर "कत्ल हो गया किसी लड़की का"
भाई ने "भाई" से भाई को मरवाया
सेंसेक्स का ग्राफ लुढ़क कर नीचे आया
लुढ़क कर नीचे आया लोगों का चरित्र भी
सदन में करते मार-पीट, एम एल ए - एम पी
आम आदमी त्रस्त महंगाई की मार से
चीन ढहा भूकंप से, गंगा बढ़ी बाढ़ से
गंगा बढ़ी बाढ़ से, सबका रोना देखा
रोज़ की बात है, इसमे क्या है नया-अनोखा?
गुर्रा कर टी वी ने जैसे मुझको देखा
ये सच था या था मेरी नज़रों का धोखा?
"नज़रों का धोखा?" मुझको फटकार लगाई
तू कैसा निर्लज्ज, नाकारा मानुष है भाई
लोगों को रोते देखूं तो, आंसू मुझको आते हैं
मानवता के सोते तुझमे, सूख कैसे सब जाते हैं
सूख कैसे सब जाते हैं, क्या मरा हुआ है?
कर्मवीर का ये जीवन है, नही जुआ है
हाथों में रिमोट जो लूँ, मेरा मन सोचता है
मैं टी वी नही, टी वी मुझे देखता है।
पिंजरे से छूटे पंछी सा, पहुँचा फिर मैं घर
पहुँचा फिर मैं घर, हाल क्या बोलूं भाई
पत्नी झट से चाय-नाश्ता लेकर आयी
गर्म चाय की घूँट से, जब गला हो गया तर
मैं टी वी के सामने बैठा, देखूं ज़रा ख़बर
देखूं ज़रा ख़बर, हाल जानूं दुनिया का
पहली ख़बर "कत्ल हो गया किसी लड़की का"
भाई ने "भाई" से भाई को मरवाया
सेंसेक्स का ग्राफ लुढ़क कर नीचे आया
लुढ़क कर नीचे आया लोगों का चरित्र भी
सदन में करते मार-पीट, एम एल ए - एम पी
आम आदमी त्रस्त महंगाई की मार से
चीन ढहा भूकंप से, गंगा बढ़ी बाढ़ से
गंगा बढ़ी बाढ़ से, सबका रोना देखा
रोज़ की बात है, इसमे क्या है नया-अनोखा?
गुर्रा कर टी वी ने जैसे मुझको देखा
ये सच था या था मेरी नज़रों का धोखा?
"नज़रों का धोखा?" मुझको फटकार लगाई
तू कैसा निर्लज्ज, नाकारा मानुष है भाई
लोगों को रोते देखूं तो, आंसू मुझको आते हैं
मानवता के सोते तुझमे, सूख कैसे सब जाते हैं
सूख कैसे सब जाते हैं, क्या मरा हुआ है?
कर्मवीर का ये जीवन है, नही जुआ है
हाथों में रिमोट जो लूँ, मेरा मन सोचता है
मैं टी वी नही, टी वी मुझे देखता है।
Wednesday, July 16, 2008
जीवन तेरे रूप अनेक
Wednesday, July 9, 2008
जमशेदपुर की बाढ़
जमशेदपुर: स्वर्णरेखा और खरकाई नदियों के बीच बसा एक औद्योगिक शहर। इस मानसून, ये पहाड़ी शहर भी बाढ़ की चपेट में आ गया।
गरीब तो गरीब, कई पॉश कालोनियां भी बाढ़ की चपेट में आने से नही बच सकीं।
राहत और बचाव के दौरान आदित्यपुर में एक दुर्घटना हो गई। तकरीबन दो दिनों तक रहे इस बाढ़ ने बता दिया की मनुष्य प्रकृति के सामने कुछ भी नही।
ये तस्वीर है स्वर्णरेखा नदी की। मुख्य भूमि को मानगो से जोड़ती इस पुल को पानी ने लगभग छु लिया। पुल पर खड़े लोग बाढ़ का नज़ारा लेते हुए...
ये तस्वीर है खरकई नदी पर बने आदित्यपुर पुल की।
गरीब तो गरीब, कई पॉश कालोनियां भी बाढ़ की चपेट में आने से नही बच सकीं।
राहत और बचाव के दौरान आदित्यपुर में एक दुर्घटना हो गई। तकरीबन दो दिनों तक रहे इस बाढ़ ने बता दिया की मनुष्य प्रकृति के सामने कुछ भी नही।
Sunday, June 29, 2008
दोनों हाथ उलीचिये ......
'खट' की आवाज़ से मेरा ध्यान दरवाज़े की ओर गया तो देखा कि मटकू भइया खड़े हैं।
"भइया प्रणाम। आईए ना..." मैंने आग्रह किया।
"क्या बात है... काफी परेशान दिख रहे हो?"
"हाँ भइया.... इन्फ्लेशन ११% के पार चला गया। घर के लिए क़र्ज़ लिया था। वो अब भारी पड़ने लगा है। रिज़र्व बैंक की हाल की घोषणा के बाद तो लगता है कि ये और भी भारी हो जाएगा।"
"फिर क्या सोचा? कुछ पैसवा बचा है तो क़र्ज़ चुका दो।"
"हाँ भइया। सोचा तो है। फिर सोचता हूँ कि बैंक ज़मा पैसा पर भी तो ज्यादा ब्याज देगा! इसी उधेर-बुन में हूँ कि लोन चुका दूँ या पैसा फिक्स कर दूँ! आप क्या सलाह देते हैं?" मैंने उनके विचार जानने चाहे। हमेशा मुफ्त की सलाह देने वाले मटकू भइया पहले तो सोच में पड़े... फिर दार्शनिक अंदाज़ में बोले...
"देख बबुआ, हम ता ठहरे पुरान (पुरानी) बुद्धी वाले। फिर भी हम ऐ गो पुरान बात दोहरा देते हैं ...
ज्यों जल बाढै नाव में, घर में बाढै दाम।
दोनों हाथ उलीचिये, यही सयानो काम।।
कम कहे पर ज्यादा समझना! अब चलता हूँ।" मटकू भइया तो चल दिए पर उनकी बातें अभी तक मेरे दिलो-दिमाग में गूँज रही हैं।
"भइया प्रणाम। आईए ना..." मैंने आग्रह किया।
"क्या बात है... काफी परेशान दिख रहे हो?"
"हाँ भइया.... इन्फ्लेशन ११% के पार चला गया। घर के लिए क़र्ज़ लिया था। वो अब भारी पड़ने लगा है। रिज़र्व बैंक की हाल की घोषणा के बाद तो लगता है कि ये और भी भारी हो जाएगा।"
"फिर क्या सोचा? कुछ पैसवा बचा है तो क़र्ज़ चुका दो।"
"हाँ भइया। सोचा तो है। फिर सोचता हूँ कि बैंक ज़मा पैसा पर भी तो ज्यादा ब्याज देगा! इसी उधेर-बुन में हूँ कि लोन चुका दूँ या पैसा फिक्स कर दूँ! आप क्या सलाह देते हैं?" मैंने उनके विचार जानने चाहे। हमेशा मुफ्त की सलाह देने वाले मटकू भइया पहले तो सोच में पड़े... फिर दार्शनिक अंदाज़ में बोले...
"देख बबुआ, हम ता ठहरे पुरान (पुरानी) बुद्धी वाले। फिर भी हम ऐ गो पुरान बात दोहरा देते हैं ...
ज्यों जल बाढै नाव में, घर में बाढै दाम।
दोनों हाथ उलीचिये, यही सयानो काम।।
कम कहे पर ज्यादा समझना! अब चलता हूँ।" मटकू भइया तो चल दिए पर उनकी बातें अभी तक मेरे दिलो-दिमाग में गूँज रही हैं।
Saturday, June 7, 2008
शौर्य
जब भी शौर्य की बात करें तो ज़ेहन में पहली तस्वीर क्या उभरती है? शायद वर्दी में किसी जवान की। किंतु जो सीमा पर नही हैं, क्या वे शौर्य-विहीन हैं? देश-दुनिया को चलाये रखने के लिए जो लोग अपनी खुशियाँ, इच्छायें और रिश्ते दावं पर लगाते हैं, क्या उन्हें सलाम करना भी हमारे लिए ज़रूरी नही? उन्ही लोगों को समर्पित मेरा ये प्रयास...
अब तक था अप्राप्य, अछूता
उस मंजिल की ओर बढें
आओ हम सब मिलकर
शौर्य की नई परिभाषा गढ़ें
धरती के सीने को चीरता
जैसे हो बलराम का हल
जीवन-स्त्रोत से ओत-प्रोत
है किसान का आत्मबल
रह जाए न कोई भूखा
कृषक की ये साध सधे
आओ हम सब मिलकर
शौर्य की नई परिभाषा गढ़ें
चीर कर अम्बर का सीना
ऊपर बढ़ता भवन विशाल
हाड़-तोड़ मेहनत हैं करते
मजदूरों का शौर्य कमाल
धरती के साए से उठकर
स्वर्ग की सीढ़ी चढें
आओ हम सब मिलकर
शौर्य की नई परिभाषा गढ़ें
आते-जाते हमने देखा
रेल-सड़क का फैला जाल
धमनी में ज्यूँ रक्त है बहता
ड्राईवर सदा ही चलता रहता
पलक न झपके मंजिल तक,
उसके हैं हर कदम सधे
आओ हम सब मिलकर
शौर्य की नई परिभाषा गढ़ें
अब तक था अप्राप्य, अछूता
उस मंजिल की ओर बढें
आओ हम सब मिलकर
शौर्य की नई परिभाषा गढ़ें
धरती के सीने को चीरता
जैसे हो बलराम का हल
जीवन-स्त्रोत से ओत-प्रोत
है किसान का आत्मबल
रह जाए न कोई भूखा
कृषक की ये साध सधे
आओ हम सब मिलकर
शौर्य की नई परिभाषा गढ़ें
चीर कर अम्बर का सीना
ऊपर बढ़ता भवन विशाल
हाड़-तोड़ मेहनत हैं करते
मजदूरों का शौर्य कमाल
धरती के साए से उठकर
स्वर्ग की सीढ़ी चढें
आओ हम सब मिलकर
शौर्य की नई परिभाषा गढ़ें
आते-जाते हमने देखा
रेल-सड़क का फैला जाल
धमनी में ज्यूँ रक्त है बहता
ड्राईवर सदा ही चलता रहता
पलक न झपके मंजिल तक,
उसके हैं हर कदम सधे
आओ हम सब मिलकर
शौर्य की नई परिभाषा गढ़ें
Monday, June 2, 2008
जय जवान, जय किसान
शाम को बाज़ार निकला तो रास्ते में मटकू भइया मिल गए। नाम से इनको कोई भइया टाइप चीज़ समझने की गफलत मत पालियेगा। जब पैदा हुए तो नामकरण किया गया - पद्मलोचन। नाम के अनुरूप बड़े-बड़े नयन। प्यार से किसी ने कहा, "बचवा की आंखें बड़ी मटकती हैं"। बस, फिर क्या था, पद्मलोचन हो गए मटकू बबुआ। जब बड़े हुए तो हो गए मटकू भइया।
"भइया प्रणाम, कैसे हैं?"
"क्या रहेंगे बबुआ, ई कमर तोड़ महंगाई में नौकरी वाला भी ससुरा बी पी एल हो गया है। सोचो कि गरीबों का क्या होगा?"
"बी पी एल क्या?" मैं ज़रा अनजान बन गया। भइया को मेरी नादानी पर गुस्सा करने का मौका मिला, "ऐतनो नही बुझाता है क्या रे तुमको? बी पी एल माने गरीबी रेखा के नीचे वाला लोग, हिन्दी में कहेंगे लाल कार्डधारी। अब त समझिए गया होगा।"
" जी - जी"
"कहाँ जा रहा है?"
" जी, ज़रा सोचा कि कुछ सब्जियां ले लूँ। "
" थैला भर के पैसा लाया है न? पहले पॉकेट में पैसा लाते थे और थैला में सब्जी ले जाते थे। अब त ज़माना ही उल्टा हो गया है!"
"आप कहते हैं की चावल-दाल-सब्जी का भाव बढ़ गया है। फिर किसान क्यों खुदकुशी कर रहे हैं ?" मैंने मटकू भइया को छेड़ा।
"तुम लोग को बुझायेगा... अरे तुमको का लगता है... सेंसेक्स ऊपर चढ़ गया त किसानों के जिंदगी का ग्राफ ऊपर चला गया? फसल ज्यादा हो या कम, किसान दोनों तरफ़ से मरता है। कम हुआ तो क़र्ज़ चुकाने लायक भी पैसा नही आता है... ज्यादा हुआ तो फसल का दाम कम मिलता है। अब त किसानों सब चालाक हो गया है। अनाज-सब्जी छोड़ के सूरजमुखी, एलो-वेरा और गेंदा लगाने लगा है। आख़िर पैसा किसको अच्छा नही लगता है?"
"अच्छा भइया, जय जवान-जय किसान... ... ..."
"अरे तुम क्या बोलेगा," मेरी मुहं की बात मुहं में ही रह गयी। "जवान भी अब नौकरी से तौबा कर रहा है। पैसा तो पहले भी ज्यादा नही था लेकिन इज्ज़त खूब था। अब त उसी का इज्ज़त है जिसके पास पैसा है। तभी तो तेज़ विद्यार्थी फौज के बदले ऑफिस का काम पसंद करता है। आराम का आराम... और पैसा भी दुनिया भर का।"
"आपकी बात में तो दम है" मैंने कहा।
".... तुम्हारे चक्कर में मेरा भी काम गड़बड़ हो जाएगा। तुम जाओ सब्जी-मंडी... मैं चला अपने रस्ते..."
"भइया प्रणाम, कैसे हैं?"
"क्या रहेंगे बबुआ, ई कमर तोड़ महंगाई में नौकरी वाला भी ससुरा बी पी एल हो गया है। सोचो कि गरीबों का क्या होगा?"
"बी पी एल क्या?" मैं ज़रा अनजान बन गया। भइया को मेरी नादानी पर गुस्सा करने का मौका मिला, "ऐतनो नही बुझाता है क्या रे तुमको? बी पी एल माने गरीबी रेखा के नीचे वाला लोग, हिन्दी में कहेंगे लाल कार्डधारी। अब त समझिए गया होगा।"
" जी - जी"
"कहाँ जा रहा है?"
" जी, ज़रा सोचा कि कुछ सब्जियां ले लूँ। "
" थैला भर के पैसा लाया है न? पहले पॉकेट में पैसा लाते थे और थैला में सब्जी ले जाते थे। अब त ज़माना ही उल्टा हो गया है!"
"आप कहते हैं की चावल-दाल-सब्जी का भाव बढ़ गया है। फिर किसान क्यों खुदकुशी कर रहे हैं ?" मैंने मटकू भइया को छेड़ा।
"तुम लोग को बुझायेगा... अरे तुमको का लगता है... सेंसेक्स ऊपर चढ़ गया त किसानों के जिंदगी का ग्राफ ऊपर चला गया? फसल ज्यादा हो या कम, किसान दोनों तरफ़ से मरता है। कम हुआ तो क़र्ज़ चुकाने लायक भी पैसा नही आता है... ज्यादा हुआ तो फसल का दाम कम मिलता है। अब त किसानों सब चालाक हो गया है। अनाज-सब्जी छोड़ के सूरजमुखी, एलो-वेरा और गेंदा लगाने लगा है। आख़िर पैसा किसको अच्छा नही लगता है?"
"अच्छा भइया, जय जवान-जय किसान... ... ..."
"अरे तुम क्या बोलेगा," मेरी मुहं की बात मुहं में ही रह गयी। "जवान भी अब नौकरी से तौबा कर रहा है। पैसा तो पहले भी ज्यादा नही था लेकिन इज्ज़त खूब था। अब त उसी का इज्ज़त है जिसके पास पैसा है। तभी तो तेज़ विद्यार्थी फौज के बदले ऑफिस का काम पसंद करता है। आराम का आराम... और पैसा भी दुनिया भर का।"
"आपकी बात में तो दम है" मैंने कहा।
".... तुम्हारे चक्कर में मेरा भी काम गड़बड़ हो जाएगा। तुम जाओ सब्जी-मंडी... मैं चला अपने रस्ते..."
Wednesday, May 21, 2008
पीने योग्य जल: क्या कहता है भारतीय मानक ब्यूरो
मैंने अपने तीन पोस्ट में जल के बारे में काफ़ी चर्चा की। काफी कुछ लिखा पर उससे भी ज्यादा छूट गया। आज जानते हैं कि हमारा कानून इस बारे में क्या कहता है। भारतीय मानक ब्यूरो ने पीने लायक पानी किसे माना है। BIS 10500 : 1991 के अनुसार, पीने योग्य पानी उसे कहेंगे जिसमे निम्नलिखित बातें हो।
| Essential characteristics | ||
| Substance/Characteristic Requirement | Permissible Limit | (Desirable Limit)in absence of Alternate source |
| Colour, ( Hazen units, Max ) | 5 | 25 |
| Odour | Unobjectonable | Unobjectionable |
| Taste | Agreeable | Agreeable |
| Turbidity ( NTU, Max) | 5 | 10 |
| pH Value | 6.5 to 8.5 | No Relaxsation |
| Total Hardness (as CaCo3) mg/lit.,Max | 300 | 600 |
| Iron (as Fe) mg/lit,Max | 0.3 | 1 |
| Chlorides (as Cl) mg/lit,Max. | 250 | 1000 |
| Residual,free chlorine,mg/lit,Min | 0.2 | -- |
| Desirable Characteristics | ||
| Dissolved solids mg/lit,Max | 500 | 2000 |
| Calcium (as Ca) mg/lit,Max | 75 | 200 |
| Copper (as Cu) mg/lit,Max | 0.05 | 1.5 |
| Manganese (as Mn)mg/lit,Max | 0.1 | 0.3 |
| Sulfate (as SO4) mg/lit,Max | 200 | 400 |
| Nitrate (as NO3) mg/lit,Max | 45 | 100 |
| Fluoride (as F) mg/lit,Max | 1.9 | 1.5 |
| Phenolic Compounds (as C 6 H5OH)mg/lit, Max. | 0.001 | 0.002 |
| Mercury (as Hg)mg/lit,Max | 0.001 | No relaxation |
| Cadmiun (as Cd)mg/lit,Max | 0.01 | No relaxation |
| Selenium (as Se)mg/lit,Max | 0.01 | No relaxation |
| Arsenic (as As) mg/lit,Max | 0.05 | No relaxation |
| Cyanide (as CN) mg/lit,Max | 0.05 | No relaxation |
| Lead (as Pb) mg/lit,Max | 0.05 | No relaxation |
| Zinc (as Zn) mg/lit,Max | 5 | 15 |
| Anionic detergents (as MBAS) mg/lit,Max | 0.2 | 1 |
| Chromium (as Cr6+) mg/lit,Max | 0.05 | No relaxation |
| Polynuclear aromatic hydro carbons(as PAH) g/lit,Max | -- | -- |
| Mineral Oil mg/lit,Max | 0.01 | 0.03 |
| Pesticides mg/l, Max | Absent | 0.001 |
| Radioactive Materials | ||
| i. Alpha emitters Bq/l,Max | -- | 0.1 |
| ii. Beta emitters pci/l,Max | -- | 1 |
| Alkalinity mg/lit.Max | 200 | 600 |
| Aluminium (as Al) mg/l,Max | 0.03 | 0.2 |
| Boron mg/lit,Max | 1 | 5 |
Sunday, May 18, 2008
आशा
रौशनी की तलाश में
भटकता मन अंतस
गिरते-उठते ज्वार सा
आवेग करते अतिक्रमण
अपनी ही परछाई से
डर सा लगने लगे
डरो मत, उठो
आशा के दीप
छोटे ही सही
लौ थरथराती ही सही
अकेले लडेंगे अंधेरों से
डरेगा, अंधेरा भी
दीप की नन्ही लौ से
भाग्य को कोसने की बजाये
कुछ कर दिखाएँ
एक छोटा सा दीप जलायें।
इस कविता ने स्वतः-स्फूर्त आज जन्म लिया।
भटकता मन अंतस
गिरते-उठते ज्वार सा
आवेग करते अतिक्रमण
अपनी ही परछाई से
डर सा लगने लगे
डरो मत, उठो
आशा के दीप
छोटे ही सही
लौ थरथराती ही सही
अकेले लडेंगे अंधेरों से
डरेगा, अंधेरा भी
दीप की नन्ही लौ से
भाग्य को कोसने की बजाये
कुछ कर दिखाएँ
एक छोटा सा दीप जलायें।
इस कविता ने स्वतः-स्फूर्त आज जन्म लिया।
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