दिन भर कि किच-किच के बाद जो बंद हुआ दफ्तर
पिंजरे से छूटे पंछी सा, पहुँचा फिर मैं घर
पहुँचा फिर मैं घर, हाल क्या बोलूं भाई
पत्नी झट से चाय-नाश्ता लेकर आयी
गर्म चाय की घूँट से, जब गला हो गया तर
मैं टी वी के सामने बैठा, देखूं ज़रा ख़बर
देखूं ज़रा ख़बर, हाल जानूं दुनिया का
पहली ख़बर "कत्ल हो गया किसी लड़की का"
भाई ने "भाई" से भाई को मरवाया
सेंसेक्स का ग्राफ लुढ़क कर नीचे आया
लुढ़क कर नीचे आया लोगों का चरित्र भी
सदन में करते मार-पीट, एम एल ए - एम पी
आम आदमी त्रस्त महंगाई की मार से
चीन ढहा भूकंप से, गंगा बढ़ी बाढ़ से
गंगा बढ़ी बाढ़ से, सबका रोना देखा
रोज़ की बात है, इसमे क्या है नया-अनोखा?
गुर्रा कर टी वी ने जैसे मुझको देखा
ये सच था या था मेरी नज़रों का धोखा?
"नज़रों का धोखा?" मुझको फटकार लगाई
तू कैसा निर्लज्ज, नाकारा मानुष है भाई
लोगों को रोते देखूं तो, आंसू मुझको आते हैं
मानवता के सोते तुझमे, सूख कैसे सब जाते हैं
सूख कैसे सब जाते हैं, क्या मरा हुआ है?
कर्मवीर का ये जीवन है, नही जुआ है
हाथों में रिमोट जो लूँ, मेरा मन सोचता है
मैं टी वी नही, टी वी मुझे देखता है।
Saturday, July 19, 2008
Wednesday, July 16, 2008
जीवन तेरे रूप अनेक
Wednesday, July 9, 2008
जमशेदपुर की बाढ़
जमशेदपुर: स्वर्णरेखा और खरकाई नदियों के बीच बसा एक औद्योगिक शहर। इस मानसून, ये पहाड़ी शहर भी बाढ़ की चपेट में आ गया।
गरीब तो गरीब, कई पॉश कालोनियां भी बाढ़ की चपेट में आने से नही बच सकीं।
राहत और बचाव के दौरान आदित्यपुर में एक दुर्घटना हो गई। तकरीबन दो दिनों तक रहे इस बाढ़ ने बता दिया की मनुष्य प्रकृति के सामने कुछ भी नही।
ये तस्वीर है स्वर्णरेखा नदी की। मुख्य भूमि को मानगो से जोड़ती इस पुल को पानी ने लगभग छु लिया। पुल पर खड़े लोग बाढ़ का नज़ारा लेते हुए...
ये तस्वीर है खरकई नदी पर बने आदित्यपुर पुल की।
गरीब तो गरीब, कई पॉश कालोनियां भी बाढ़ की चपेट में आने से नही बच सकीं।
राहत और बचाव के दौरान आदित्यपुर में एक दुर्घटना हो गई। तकरीबन दो दिनों तक रहे इस बाढ़ ने बता दिया की मनुष्य प्रकृति के सामने कुछ भी नही।
Sunday, June 29, 2008
दोनों हाथ उलीचिये ......
'खट' की आवाज़ से मेरा ध्यान दरवाज़े की ओर गया तो देखा कि मटकू भइया खड़े हैं।
"भइया प्रणाम। आईए ना..." मैंने आग्रह किया।
"क्या बात है... काफी परेशान दिख रहे हो?"
"हाँ भइया.... इन्फ्लेशन ११% के पार चला गया। घर के लिए क़र्ज़ लिया था। वो अब भारी पड़ने लगा है। रिज़र्व बैंक की हाल की घोषणा के बाद तो लगता है कि ये और भी भारी हो जाएगा।"
"फिर क्या सोचा? कुछ पैसवा बचा है तो क़र्ज़ चुका दो।"
"हाँ भइया। सोचा तो है। फिर सोचता हूँ कि बैंक ज़मा पैसा पर भी तो ज्यादा ब्याज देगा! इसी उधेर-बुन में हूँ कि लोन चुका दूँ या पैसा फिक्स कर दूँ! आप क्या सलाह देते हैं?" मैंने उनके विचार जानने चाहे। हमेशा मुफ्त की सलाह देने वाले मटकू भइया पहले तो सोच में पड़े... फिर दार्शनिक अंदाज़ में बोले...
"देख बबुआ, हम ता ठहरे पुरान (पुरानी) बुद्धी वाले। फिर भी हम ऐ गो पुरान बात दोहरा देते हैं ...
ज्यों जल बाढै नाव में, घर में बाढै दाम।
दोनों हाथ उलीचिये, यही सयानो काम।।
कम कहे पर ज्यादा समझना! अब चलता हूँ।" मटकू भइया तो चल दिए पर उनकी बातें अभी तक मेरे दिलो-दिमाग में गूँज रही हैं।
"भइया प्रणाम। आईए ना..." मैंने आग्रह किया।
"क्या बात है... काफी परेशान दिख रहे हो?"
"हाँ भइया.... इन्फ्लेशन ११% के पार चला गया। घर के लिए क़र्ज़ लिया था। वो अब भारी पड़ने लगा है। रिज़र्व बैंक की हाल की घोषणा के बाद तो लगता है कि ये और भी भारी हो जाएगा।"
"फिर क्या सोचा? कुछ पैसवा बचा है तो क़र्ज़ चुका दो।"
"हाँ भइया। सोचा तो है। फिर सोचता हूँ कि बैंक ज़मा पैसा पर भी तो ज्यादा ब्याज देगा! इसी उधेर-बुन में हूँ कि लोन चुका दूँ या पैसा फिक्स कर दूँ! आप क्या सलाह देते हैं?" मैंने उनके विचार जानने चाहे। हमेशा मुफ्त की सलाह देने वाले मटकू भइया पहले तो सोच में पड़े... फिर दार्शनिक अंदाज़ में बोले...
"देख बबुआ, हम ता ठहरे पुरान (पुरानी) बुद्धी वाले। फिर भी हम ऐ गो पुरान बात दोहरा देते हैं ...
ज्यों जल बाढै नाव में, घर में बाढै दाम।
दोनों हाथ उलीचिये, यही सयानो काम।।
कम कहे पर ज्यादा समझना! अब चलता हूँ।" मटकू भइया तो चल दिए पर उनकी बातें अभी तक मेरे दिलो-दिमाग में गूँज रही हैं।
Saturday, June 7, 2008
शौर्य
जब भी शौर्य की बात करें तो ज़ेहन में पहली तस्वीर क्या उभरती है? शायद वर्दी में किसी जवान की। किंतु जो सीमा पर नही हैं, क्या वे शौर्य-विहीन हैं? देश-दुनिया को चलाये रखने के लिए जो लोग अपनी खुशियाँ, इच्छायें और रिश्ते दावं पर लगाते हैं, क्या उन्हें सलाम करना भी हमारे लिए ज़रूरी नही? उन्ही लोगों को समर्पित मेरा ये प्रयास...
अब तक था अप्राप्य, अछूता
उस मंजिल की ओर बढें
आओ हम सब मिलकर
शौर्य की नई परिभाषा गढ़ें
धरती के सीने को चीरता
जैसे हो बलराम का हल
जीवन-स्त्रोत से ओत-प्रोत
है किसान का आत्मबल
रह जाए न कोई भूखा
कृषक की ये साध सधे
आओ हम सब मिलकर
शौर्य की नई परिभाषा गढ़ें
चीर कर अम्बर का सीना
ऊपर बढ़ता भवन विशाल
हाड़-तोड़ मेहनत हैं करते
मजदूरों का शौर्य कमाल
धरती के साए से उठकर
स्वर्ग की सीढ़ी चढें
आओ हम सब मिलकर
शौर्य की नई परिभाषा गढ़ें
आते-जाते हमने देखा
रेल-सड़क का फैला जाल
धमनी में ज्यूँ रक्त है बहता
ड्राईवर सदा ही चलता रहता
पलक न झपके मंजिल तक,
उसके हैं हर कदम सधे
आओ हम सब मिलकर
शौर्य की नई परिभाषा गढ़ें
अब तक था अप्राप्य, अछूता
उस मंजिल की ओर बढें
आओ हम सब मिलकर
शौर्य की नई परिभाषा गढ़ें
धरती के सीने को चीरता
जैसे हो बलराम का हल
जीवन-स्त्रोत से ओत-प्रोत
है किसान का आत्मबल
रह जाए न कोई भूखा
कृषक की ये साध सधे
आओ हम सब मिलकर
शौर्य की नई परिभाषा गढ़ें
चीर कर अम्बर का सीना
ऊपर बढ़ता भवन विशाल
हाड़-तोड़ मेहनत हैं करते
मजदूरों का शौर्य कमाल
धरती के साए से उठकर
स्वर्ग की सीढ़ी चढें
आओ हम सब मिलकर
शौर्य की नई परिभाषा गढ़ें
आते-जाते हमने देखा
रेल-सड़क का फैला जाल
धमनी में ज्यूँ रक्त है बहता
ड्राईवर सदा ही चलता रहता
पलक न झपके मंजिल तक,
उसके हैं हर कदम सधे
आओ हम सब मिलकर
शौर्य की नई परिभाषा गढ़ें
Monday, June 2, 2008
जय जवान, जय किसान
शाम को बाज़ार निकला तो रास्ते में मटकू भइया मिल गए। नाम से इनको कोई भइया टाइप चीज़ समझने की गफलत मत पालियेगा। जब पैदा हुए तो नामकरण किया गया - पद्मलोचन। नाम के अनुरूप बड़े-बड़े नयन। प्यार से किसी ने कहा, "बचवा की आंखें बड़ी मटकती हैं"। बस, फिर क्या था, पद्मलोचन हो गए मटकू बबुआ। जब बड़े हुए तो हो गए मटकू भइया।
"भइया प्रणाम, कैसे हैं?"
"क्या रहेंगे बबुआ, ई कमर तोड़ महंगाई में नौकरी वाला भी ससुरा बी पी एल हो गया है। सोचो कि गरीबों का क्या होगा?"
"बी पी एल क्या?" मैं ज़रा अनजान बन गया। भइया को मेरी नादानी पर गुस्सा करने का मौका मिला, "ऐतनो नही बुझाता है क्या रे तुमको? बी पी एल माने गरीबी रेखा के नीचे वाला लोग, हिन्दी में कहेंगे लाल कार्डधारी। अब त समझिए गया होगा।"
" जी - जी"
"कहाँ जा रहा है?"
" जी, ज़रा सोचा कि कुछ सब्जियां ले लूँ। "
" थैला भर के पैसा लाया है न? पहले पॉकेट में पैसा लाते थे और थैला में सब्जी ले जाते थे। अब त ज़माना ही उल्टा हो गया है!"
"आप कहते हैं की चावल-दाल-सब्जी का भाव बढ़ गया है। फिर किसान क्यों खुदकुशी कर रहे हैं ?" मैंने मटकू भइया को छेड़ा।
"तुम लोग को बुझायेगा... अरे तुमको का लगता है... सेंसेक्स ऊपर चढ़ गया त किसानों के जिंदगी का ग्राफ ऊपर चला गया? फसल ज्यादा हो या कम, किसान दोनों तरफ़ से मरता है। कम हुआ तो क़र्ज़ चुकाने लायक भी पैसा नही आता है... ज्यादा हुआ तो फसल का दाम कम मिलता है। अब त किसानों सब चालाक हो गया है। अनाज-सब्जी छोड़ के सूरजमुखी, एलो-वेरा और गेंदा लगाने लगा है। आख़िर पैसा किसको अच्छा नही लगता है?"
"अच्छा भइया, जय जवान-जय किसान... ... ..."
"अरे तुम क्या बोलेगा," मेरी मुहं की बात मुहं में ही रह गयी। "जवान भी अब नौकरी से तौबा कर रहा है। पैसा तो पहले भी ज्यादा नही था लेकिन इज्ज़त खूब था। अब त उसी का इज्ज़त है जिसके पास पैसा है। तभी तो तेज़ विद्यार्थी फौज के बदले ऑफिस का काम पसंद करता है। आराम का आराम... और पैसा भी दुनिया भर का।"
"आपकी बात में तो दम है" मैंने कहा।
".... तुम्हारे चक्कर में मेरा भी काम गड़बड़ हो जाएगा। तुम जाओ सब्जी-मंडी... मैं चला अपने रस्ते..."
"भइया प्रणाम, कैसे हैं?"
"क्या रहेंगे बबुआ, ई कमर तोड़ महंगाई में नौकरी वाला भी ससुरा बी पी एल हो गया है। सोचो कि गरीबों का क्या होगा?"
"बी पी एल क्या?" मैं ज़रा अनजान बन गया। भइया को मेरी नादानी पर गुस्सा करने का मौका मिला, "ऐतनो नही बुझाता है क्या रे तुमको? बी पी एल माने गरीबी रेखा के नीचे वाला लोग, हिन्दी में कहेंगे लाल कार्डधारी। अब त समझिए गया होगा।"
" जी - जी"
"कहाँ जा रहा है?"
" जी, ज़रा सोचा कि कुछ सब्जियां ले लूँ। "
" थैला भर के पैसा लाया है न? पहले पॉकेट में पैसा लाते थे और थैला में सब्जी ले जाते थे। अब त ज़माना ही उल्टा हो गया है!"
"आप कहते हैं की चावल-दाल-सब्जी का भाव बढ़ गया है। फिर किसान क्यों खुदकुशी कर रहे हैं ?" मैंने मटकू भइया को छेड़ा।
"तुम लोग को बुझायेगा... अरे तुमको का लगता है... सेंसेक्स ऊपर चढ़ गया त किसानों के जिंदगी का ग्राफ ऊपर चला गया? फसल ज्यादा हो या कम, किसान दोनों तरफ़ से मरता है। कम हुआ तो क़र्ज़ चुकाने लायक भी पैसा नही आता है... ज्यादा हुआ तो फसल का दाम कम मिलता है। अब त किसानों सब चालाक हो गया है। अनाज-सब्जी छोड़ के सूरजमुखी, एलो-वेरा और गेंदा लगाने लगा है। आख़िर पैसा किसको अच्छा नही लगता है?"
"अच्छा भइया, जय जवान-जय किसान... ... ..."
"अरे तुम क्या बोलेगा," मेरी मुहं की बात मुहं में ही रह गयी। "जवान भी अब नौकरी से तौबा कर रहा है। पैसा तो पहले भी ज्यादा नही था लेकिन इज्ज़त खूब था। अब त उसी का इज्ज़त है जिसके पास पैसा है। तभी तो तेज़ विद्यार्थी फौज के बदले ऑफिस का काम पसंद करता है। आराम का आराम... और पैसा भी दुनिया भर का।"
"आपकी बात में तो दम है" मैंने कहा।
".... तुम्हारे चक्कर में मेरा भी काम गड़बड़ हो जाएगा। तुम जाओ सब्जी-मंडी... मैं चला अपने रस्ते..."
Wednesday, May 21, 2008
पीने योग्य जल: क्या कहता है भारतीय मानक ब्यूरो
मैंने अपने तीन पोस्ट में जल के बारे में काफ़ी चर्चा की। काफी कुछ लिखा पर उससे भी ज्यादा छूट गया। आज जानते हैं कि हमारा कानून इस बारे में क्या कहता है। भारतीय मानक ब्यूरो ने पीने लायक पानी किसे माना है। BIS 10500 : 1991 के अनुसार, पीने योग्य पानी उसे कहेंगे जिसमे निम्नलिखित बातें हो।
| Essential characteristics | ||
| Substance/Characteristic Requirement | Permissible Limit | (Desirable Limit)in absence of Alternate source |
| Colour, ( Hazen units, Max ) | 5 | 25 |
| Odour | Unobjectonable | Unobjectionable |
| Taste | Agreeable | Agreeable |
| Turbidity ( NTU, Max) | 5 | 10 |
| pH Value | 6.5 to 8.5 | No Relaxsation |
| Total Hardness (as CaCo3) mg/lit.,Max | 300 | 600 |
| Iron (as Fe) mg/lit,Max | 0.3 | 1 |
| Chlorides (as Cl) mg/lit,Max. | 250 | 1000 |
| Residual,free chlorine,mg/lit,Min | 0.2 | -- |
| Desirable Characteristics | ||
| Dissolved solids mg/lit,Max | 500 | 2000 |
| Calcium (as Ca) mg/lit,Max | 75 | 200 |
| Copper (as Cu) mg/lit,Max | 0.05 | 1.5 |
| Manganese (as Mn)mg/lit,Max | 0.1 | 0.3 |
| Sulfate (as SO4) mg/lit,Max | 200 | 400 |
| Nitrate (as NO3) mg/lit,Max | 45 | 100 |
| Fluoride (as F) mg/lit,Max | 1.9 | 1.5 |
| Phenolic Compounds (as C 6 H5OH)mg/lit, Max. | 0.001 | 0.002 |
| Mercury (as Hg)mg/lit,Max | 0.001 | No relaxation |
| Cadmiun (as Cd)mg/lit,Max | 0.01 | No relaxation |
| Selenium (as Se)mg/lit,Max | 0.01 | No relaxation |
| Arsenic (as As) mg/lit,Max | 0.05 | No relaxation |
| Cyanide (as CN) mg/lit,Max | 0.05 | No relaxation |
| Lead (as Pb) mg/lit,Max | 0.05 | No relaxation |
| Zinc (as Zn) mg/lit,Max | 5 | 15 |
| Anionic detergents (as MBAS) mg/lit,Max | 0.2 | 1 |
| Chromium (as Cr6+) mg/lit,Max | 0.05 | No relaxation |
| Polynuclear aromatic hydro carbons(as PAH) g/lit,Max | -- | -- |
| Mineral Oil mg/lit,Max | 0.01 | 0.03 |
| Pesticides mg/l, Max | Absent | 0.001 |
| Radioactive Materials | ||
| i. Alpha emitters Bq/l,Max | -- | 0.1 |
| ii. Beta emitters pci/l,Max | -- | 1 |
| Alkalinity mg/lit.Max | 200 | 600 |
| Aluminium (as Al) mg/l,Max | 0.03 | 0.2 |
| Boron mg/lit,Max | 1 | 5 |
Sunday, May 18, 2008
आशा
रौशनी की तलाश में
भटकता मन अंतस
गिरते-उठते ज्वार सा
आवेग करते अतिक्रमण
अपनी ही परछाई से
डर सा लगने लगे
डरो मत, उठो
आशा के दीप
छोटे ही सही
लौ थरथराती ही सही
अकेले लडेंगे अंधेरों से
डरेगा, अंधेरा भी
दीप की नन्ही लौ से
भाग्य को कोसने की बजाये
कुछ कर दिखाएँ
एक छोटा सा दीप जलायें।
इस कविता ने स्वतः-स्फूर्त आज जन्म लिया।
भटकता मन अंतस
गिरते-उठते ज्वार सा
आवेग करते अतिक्रमण
अपनी ही परछाई से
डर सा लगने लगे
डरो मत, उठो
आशा के दीप
छोटे ही सही
लौ थरथराती ही सही
अकेले लडेंगे अंधेरों से
डरेगा, अंधेरा भी
दीप की नन्ही लौ से
भाग्य को कोसने की बजाये
कुछ कर दिखाएँ
एक छोटा सा दीप जलायें।
इस कविता ने स्वतः-स्फूर्त आज जन्म लिया।
Tuesday, April 29, 2008
जल शुद्धिकरण
पिछले दो पोस्ट में मैंने जल के बारे में कुछ जानकारियाँ दी थी। आज बताऊंगा की जल शुद्धिकरण कैसे किया जाए।
जल की सफ़ाई करने का सबसे सरल उपाय है - उसको छान लेना। गाँव-देहातों में लोग पुरानी साफ धोती का इस्तेमाल जल को छानने में करते हैं। यह सबसे आसान और सस्ता तरीका है। इस तरीके से जल के बड़े कण और जीव-वनस्पति निकल जाते हैं। किंतु यह उपाय जल में मौजूद सूक्ष्म जीवों और गंध का सफाया नही करता।
दूसरा रास्ता है पानी को उबाल लेना। यह काफी हद तक कारगर तो है किंतु इसमे उर्जा व्यय होती है। उबालने के समय को लेकर काफ़ी भ्रम है किंतु काफी सारे सूक्ष्म जीव सिर्फ़ १०० डिग्री का तापमान आते-आते ख़त्म हो जाते हैं। ज्यादा उबालना उर्जा की बर्बादी के साथ-साथ भारी कणों की सघनता बढ़ा देता है।
तीसरा रास्ता है रसायनों का प्रयोग। आम तौर पर क्लोरीन और आयोडीन का इस्तेमाल होता है। इनकी कार्य-कुशलता इनकी सांद्रता और प्रतिक्रिया के लिए उपलब्ध समय पर निर्भर करता है।
व्यवसायिक तौर पर शुद्ध जल के लिए activated carbon bed जैसी तकनीकों का इस्तेमाल होता है। ये शोध का विषय हो सकता है, किंतु इस पोस्ट को मैं और लंबा नही करना चाहता। कभी समय मिला तो rain water harvesting जैसी तकनीक पर चर्चा ज़रूर करूंगा।
जल की सफ़ाई करने का सबसे सरल उपाय है - उसको छान लेना। गाँव-देहातों में लोग पुरानी साफ धोती का इस्तेमाल जल को छानने में करते हैं। यह सबसे आसान और सस्ता तरीका है। इस तरीके से जल के बड़े कण और जीव-वनस्पति निकल जाते हैं। किंतु यह उपाय जल में मौजूद सूक्ष्म जीवों और गंध का सफाया नही करता।
दूसरा रास्ता है पानी को उबाल लेना। यह काफी हद तक कारगर तो है किंतु इसमे उर्जा व्यय होती है। उबालने के समय को लेकर काफ़ी भ्रम है किंतु काफी सारे सूक्ष्म जीव सिर्फ़ १०० डिग्री का तापमान आते-आते ख़त्म हो जाते हैं। ज्यादा उबालना उर्जा की बर्बादी के साथ-साथ भारी कणों की सघनता बढ़ा देता है।
तीसरा रास्ता है रसायनों का प्रयोग। आम तौर पर क्लोरीन और आयोडीन का इस्तेमाल होता है। इनकी कार्य-कुशलता इनकी सांद्रता और प्रतिक्रिया के लिए उपलब्ध समय पर निर्भर करता है।
व्यवसायिक तौर पर शुद्ध जल के लिए activated carbon bed जैसी तकनीकों का इस्तेमाल होता है। ये शोध का विषय हो सकता है, किंतु इस पोस्ट को मैं और लंबा नही करना चाहता। कभी समय मिला तो rain water harvesting जैसी तकनीक पर चर्चा ज़रूर करूंगा।
Thursday, April 10, 2008
जल - प्रदूषण
आज के पोस्ट में मैं चर्चा करना चाहूँगा जल-प्रदूषण की। पिछले पोस्ट में मैंने जल के बारे में मोटे तौर पर बताया था। पोस्ट के अंत में जल के कुछ गुणों की बात कही थी मैंने।
1. जल में आंखों से दीखने वाले कण और जीव-वनस्पति नही हों।
2. हानि पहुँचानेवाले सुक्ष्म जीव या कण न हों।
3. जल का pH संतुलित हो।
4. जल में पर्याप्त मात्र में oxygen घुला हो।
जब प्रदूषण की बात करें तो उपरोक्त चारों गुण यदि ना हों तो कहेंगे कि जल उपयोग के लायक नही है। प्रथम बिन्दु की बात करें तो पाएंगे कि आंखों से दीखने वाले कण और वनस्पति कुछ तो सीधे तौर पर हमारे द्वारा फेंके गए ठोस कचरे का परिणाम है और कुछ प्राकृतिक कारणों से हैं। प्राकृतिक कारणों में भूमि-क्षरण, प्राकृतिक परिवेश के पौधे इत्यादी हैं। जहाँ पर भोजन होगा, खाने वाले तो वहाँ पहुंचेंगे ही। फिर चाहे वो सूक्ष्म जीव ही क्यों न हों। रही बात जल के pH और oxygen की तो यह सब इंसानी कारनामे हैं। हमारे कल-कारखानों से निकलता औद्योगिक कचरा नदियों और भूमिगत जल-स्त्रोतों को खतरनाक रसायनों के मिलावट से प्रदूषित कर रहा है।
भूमिगत जल-स्त्रोतों का अत्यधिक दोहन होने से उसमे अनेक तत्वों की मात्रा खतरनाक स्तर तक पहुँच गयी है। इसको हम ppm में मापते हैं जिसका अर्थ होता है पार्ट प्रति मिलियन। ओक्सेजन को BOD and COD में मापते हैं।
BOD यानि Biological oxygen demand और COD यानि chemical oxygen demand. pH जल की acidity या alkaline nature को बताता है। साधारण जल का pH 7 होता है। इससे ज्यादा हुआ तो alkaline और कम हुआ तो acidic होता है।
जल में विभिन्न प्रकार के कण की उपस्थिति जल को Hard बनाती है। नाम के मुताबिक ही ऐसे जल से कोई काम कर पाना हार्ड होता है। जल से तमाम चीजों को बाहर कर उसे उपयोग के लायक बनाया जाता है। इसे Water treatment कहते हैं।
अगले पोस्ट में Water treatment की चर्चा करूंगा।
1. जल में आंखों से दीखने वाले कण और जीव-वनस्पति नही हों।
2. हानि पहुँचानेवाले सुक्ष्म जीव या कण न हों।
3. जल का pH संतुलित हो।
4. जल में पर्याप्त मात्र में oxygen घुला हो।
जब प्रदूषण की बात करें तो उपरोक्त चारों गुण यदि ना हों तो कहेंगे कि जल उपयोग के लायक नही है। प्रथम बिन्दु की बात करें तो पाएंगे कि आंखों से दीखने वाले कण और वनस्पति कुछ तो सीधे तौर पर हमारे द्वारा फेंके गए ठोस कचरे का परिणाम है और कुछ प्राकृतिक कारणों से हैं। प्राकृतिक कारणों में भूमि-क्षरण, प्राकृतिक परिवेश के पौधे इत्यादी हैं। जहाँ पर भोजन होगा, खाने वाले तो वहाँ पहुंचेंगे ही। फिर चाहे वो सूक्ष्म जीव ही क्यों न हों। रही बात जल के pH और oxygen की तो यह सब इंसानी कारनामे हैं। हमारे कल-कारखानों से निकलता औद्योगिक कचरा नदियों और भूमिगत जल-स्त्रोतों को खतरनाक रसायनों के मिलावट से प्रदूषित कर रहा है।
भूमिगत जल-स्त्रोतों का अत्यधिक दोहन होने से उसमे अनेक तत्वों की मात्रा खतरनाक स्तर तक पहुँच गयी है। इसको हम ppm में मापते हैं जिसका अर्थ होता है पार्ट प्रति मिलियन। ओक्सेजन को BOD and COD में मापते हैं।
BOD यानि Biological oxygen demand और COD यानि chemical oxygen demand. pH जल की acidity या alkaline nature को बताता है। साधारण जल का pH 7 होता है। इससे ज्यादा हुआ तो alkaline और कम हुआ तो acidic होता है।
जल में विभिन्न प्रकार के कण की उपस्थिति जल को Hard बनाती है। नाम के मुताबिक ही ऐसे जल से कोई काम कर पाना हार्ड होता है। जल से तमाम चीजों को बाहर कर उसे उपयोग के लायक बनाया जाता है। इसे Water treatment कहते हैं।
अगले पोस्ट में Water treatment की चर्चा करूंगा।
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