सोच सोच उलझन मे है मन, मिलता नही है कोई हल
इक इक पल एक वर्ष लगे है, वर्ष गुजरता जैसे पल।
“आंटी, ज़रा दरवाज़ा बंद कर लीजिए| मैं अस्पताल जा रही हूँ|” संभावना ने मकान-मालकिन
से कहा|
“इतनी रात में कहाँ
जा रही हो?”
“अरे आंटी, ये नई बीमारी
न जाने क्या-क्या करवाएगी| आप दरवाज़ा बंद कर लो|” संभावना आगे बढ़ गई|
“क्या हुआ?” ये मकान
मालिक थे| पत्नी की आवाज़ सुन कर कमरे से बाहर आ गए थे|
“अजी होना क्या है?
हमने एक डॉक्टर को किरायेदार बना कर गलती कर दी है| जब मर्जी आती है, जब मर्जी जाती है| पूछो तो अस्पताल का बहाना
बना देती है|”
“तो आप क्या चाहती
हैं? निकाल दें उसे?”
मकान-मालकिन ने कुछ
कहा नहीं, सिर्फ टेढ़ी नज़रों से पति को देखा| संभावना ने दोनों को देखा और पलट कर चली गई|
“देखा आपने! किस तरह
ये लड़की हमें घूर रही थी|”
“हम्म...” पतिदेव ने चुप रह जाना
ही श्रेयस्कर समझा|
“संभावना – ओ
संभावना|” साथी डॉक्टर ने कुर्सी पर सो रही संभावना को जगाया|
“ढाई बज गए हैं| जल्दी चल| कैंटीन में खाना ख़त्म हो
जाएगा|”
“नहीं यार, तू जा| मैं रूम पे जाती हूँ| आखिर पेइंग गेस्ट के लिए
लंच तो बना ही होगा...” दोनों हँस दिए| कोरोना जैसी भयानक बीमारी की काली छाया के बीच
यही मुस्कुराहटें तो जीवन बचाने का काम कर रही थी|
“यार कभी कभी लगता
है कि डॉक्टर बन कर गलती कर दी|”
“तुझे ऐसा क्यूँ
लगता है?”
“देख, हमारी पढाई
ख़त्म नहीं हुई कि ये भयानक बीमारी आ गई| न दवाई, न इलाज़, उस पर तुर्रा ये कि छू लो तो
फैल जाए|”
“सही कहा, अब तो
बीमारी बाहर है और इंसान कैद में|”
“अब तो मुन्ना भाई
की “जादू की झप्पी” भी उल्टा काम करेगी|”
दोनों फिर से हँस
दिए|
शाम के कोई सात बजे
होंगे| ऊँघती अनमनी सी संभावना चाय की प्याली लिए बरामदे में बैठी थी| तभी मकान-मालिक ने पुकारा –
“संभवना, बेटा जरा
इधर तो आना|”
“जी अंकल”
“देखो बेटा ऐसा है
कि...”
“ऐसा-वैसा कुछ नहीं| सीधी बात बोलते जुबान
क्यों लड़खड़ाती है?” ये मकान-मालकिन थीं| “देखो संभावना, हम तुम्हें बतौर पेइंग गेस्ट,
और नहीं रख सकते| तो आज ही हमारा कमरा खाली कर दो|”
“आज ही? ऐसे कैसे आज
ही खाली कर दो कमरा? पूरे महीने का किराया आपने एडवांस ले रखा है| अग्रीमेंट में ये भी लिखा
है कि एक महीने का नोटिस दिए बिना आप कमरा खाली नहीं करवा सकते| वैसे आपको समस्या क्या
है?” उनींदी सी संभावना के अन्दर का तनाव फट पड़ा|
“नहीं चाहिए हमें
जुबान लड़ाने वाली किरायेदार| वो भी डॉक्टर| पता नहीं कब घर में बीमारी ले आए! हम दोनों बूढ़े, क्या पता
बीमारी से हमारा क्या हाल होगा? रही बात नोटिस की...”
“हाँ जी|” संभावना ने बात को बीच
में ही काटते हुए कहा, “बिना एक महीने के नोटिस के, मैं कहीं भी नहीं जा रही| मज़ाक समझ रखा है| पैसे चाहिए, पेइंग गेस्ट
रख लो| जब मन करे उसे निकाल बाहर करो| उस पर अपनी ऊम्र का धौंस दिखाओ|”
मकान-मालकिन ने दराज़
से छह हज़ार रूपए निकाले और संभावना के हाथ में रख दिए|
“ये लो अपने पैसे! तुम 22 फ़रवरी को आई थी| आज एक महीना हो गया| तुम्हारा एडवांस वापस कर
दिया है, नोटिस पूरा हुआ| कल सुबह तक घर खाली कर दो|”
“कल... आप पागल हो
गई हैं? आज कर्फ्यू है| इतनी शाम मैं कमरा खोजने कहाँ जाऊं?” संभावना समझ गई थी कि
अब इन्हें समझा पाना मुश्किल है|
“कहीं भी जाओ, हमें
क्या? बस, हमारा कमरा खाली कर दो डॉक्टरनी जी|” मकान-मालकिन ने व्यंग से कहा|
संभावना का सर चकरा
गया| उसे कुछ नहीं सूझा तो अपने कमरे में आकर निढ़ाल पर गई| उसे वह दिन याद आया जब उसे
इस अस्पताल में नौकरी मिली थी| कितनी खुश हुई थी| पिता का सपना पूरा हुआ था| उसने भी पढाई में कोई
कोर-कसर नहीं छोड़ी थी, तभी प्रवेश परीक्षा उतीर्ण कर कॉलेज का मुहँ देखना नसीब हुआ
था| सालों की पढाई, फिर नौकरी| पर यहाँ तो सर मुंडाते ही ओले पर गए| कोरोना क्या आया, मानो
साक्षात् काल ही आ गया| उसका सर दर्द होने लगा| उसने दोनों हाथों से अपना सर थाम लिया|
तभी जोरों से किसी के
बर्तन पीटने की आवाज़ सुनाई दी| संभावना को लगा जैसे किसी ने उसके सर पर जोरों से वार किया
हो| अचानक चारों ओर से ऐसी आवाजें आने लगी| वह खिड़की पर आई| पूरा शहर डॉक्टरों के सम्मान में ताली-थाली बजा
रहा था|
वह पथ क्या, जिस पथ पर, दौड़ा हर कोई सरपट
उबड़ खाबड़ ना, पथरीला ना, चिकना जैसे पनघट
संभल पथिक, ये उर्ध्वाधर सी राह पतन को जाती है
कदम जमा, और हाथ बढ़ा, ईश्वर ही तेरा साथी है।
गली का कुत्ता
भागकर दबोचता
कभी चिड़िया को
कभी चूहों को
भूखे कुत्ते को
गली का सेठ
रोटी देता है
कुत्ता दुम हिलाता है।
रोटी देख कर
कुत्ता, जो भूखा है
दुम हिलाता है
सेठ इसे वफादारी समझता है।
चोर आता है
कुत्ते को रोटी देता है
कुत्ता दुम हिलाता है
वफादारी? या भूख?
चोर जानता है
कुत्ता भी जानता है
भूख अलग है।
वफादारी अलग है।
सेठ सोचता है
अब भी, कि ये कुत्ता
मेरा वफादार है, पर
कुत्ता भूख का यार है।
उसे तो बस, भूख
मिटाने से प्यार है
सेठ समझता नही, शायद
उसे दुर्घटना का इंतजार है।
सुना है, दीवारों के भी कान होते हैं
तो खुद से भी बातें, न किया करो
कहीं सुन न ले, तुम्हारी सब बातें
पर मेरी ये बात, नही मानना तुम
दीवारें शायद सुन लें तुम्हारी बातें
पर वो कभी कहेंगी नही किसी से
तुम्हारा दर्द महसूस करेंगी, रोएँगी
खुशी में तुम्हारी, साथ मुस्कराएँगी
छुपा लेंगी तुम्हारी तरह राज तुम्हारे
जीने की कोशिश करता आदमी,
चला जा रहा, बिना रुके, बिना थके
नही, उसकी कोई कहानी नही है,
परछाई है वो, बिना किसी शरीर के
परछाईयों की कोई कहानी
न थी, न कभी होगी। याद रखना।
कहानी तो स्थूल शरीर की होती है
रौशनी के मोहताज परछाई की नही
पर परछाईयाँ समेटे रहती हैं कहानियाँ
कई किस्से, हँसते-रोते, जागते-सोते
जीने की कोशिश करता आदमी,
बुनता जाता है, परछाईयों के जाल
उन जालों में फँसा समय, बन जाता
कहानी, कोशिश चलती रहती, जीने की।
बहती नदियाँ
बहा ले जाती हैं
समय के निशान
किनारे रह जाते
बस मूकदर्शक से
रिसते घाव लिए
बहती नदी संग
बहता देखते समय
देखते अपने जख्म
लगाया जो समय ने
किनारों को काटते,
डुबाते, आते-जाते
बदनाम होती नदी,
चुप देखते किनारे
समय के निशान!
.
दरवाजे की घंटी बजी तो रजनी
बड़े ही बेमन से उठी. घंटी दुबारा बजी तो रजनी बड़बड़ाई – ऐसी भी क्या जल्दी है
इसे, हुंह. लोग कुछ सेकंड इंतज़ार भी नहीं कर सकते.
दरवाजा खोला तो सामने
डाकिया खड़ा था – आपकी रजिस्ट्री है मैडम. उसने लिफ़ाफा और कलम आगे बढ़ा दिया. सरकारी
लिफाफे की रंगत और खुशबु ही अलग होती है. रजनी समझ गई कि इसमें उसकी तकदीर का
फैसला बंद है.
अभी पिछले शुक्रवार ही तो
उसका और अनिर्बन का तलाक हुआ है. शनिवार और रविवार की छुट्टियाँ अनिर्बन की
गलतियों को याद करके कोसने में गुज़र गईं. सोमवार को ऑफिस में इस तलाक के ही चर्चे
थे. होते भी क्यूँ नहीं, आखिर अनिर्बन भी तो उसी ऑफिस का एक हिस्सा है. कुछ लोगों
ने रजनी को आज की आज़ाद नारी बताया तो कुछ ने उसके अकेले हो जाने का दुःख जताया.
पीठ पीछे लगभग सभी ने कहा कि मारवाड़ी लड़की और बंगाली लड़के की शादी वैसे भी नहीं
टिकने वाली थी. किसी ने कहा कि अच्छा हुआ इनके कोई बच्चा नहीं है, वरना उसका क्या
होता? किसी ने व्यंग मारा – चार सालों के प्यार के बाद की शादी साल भर भी नहीं टिक
पायी!
जितने मुहँ, उतनी बातें!
घूमते-घूमते कुछ बातें रजनी के कानों तक भी आ पहुँची. जिन लोगों पर भरोसा करके
उसने अपने जीवन के राज़ साझा किए थे, वे भरोसे के कच्चे और ज़ुबान के चटोर निकले. अब
पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत? इस ज़हरीले वातावरण में अब रजनी का दम घुटने
लगा था. उसने बॉस को मैसेज भेजा – “बॉस, मेरी तबियत ठीक नहीं है. मैं घर जा रही
हूँ. शायद कल भी न आ पाऊँ.”
“ओके”, बॉस का जवाब तुरंत
ही आ गया.
आज बुधवार है. अदालत से
तलाकनामा मंज़ूर हो कर आ गया है. रजनी को तो वैसे खुश होना चाहिए था पर जाने क्यों,
बार-बार उसकी आँखें गंगा-जमुना हुआ चाहती हैं.