Sunday, March 7, 2021

रास्ते - मंजिलें

 


Thursday, December 31, 2020

Happy New Year 2021

 


Monday, October 26, 2020

जय हो


साल दो हजार बीस। क्या साल है (विस्मय)! क्या साल है (घृणा)? पूरी दुनिया को उलट-पलट कर रख दिया। कई चेहरों से मुखौटे उतर गए। कई रिश्ते बेनकाब हो गए। सभ्यता और शिक्षा (डिग्री) के आवरण में छुपे भेड़िये खुल कर सामने आ गए। 

अब जब धीरे-धीरे ताले खुल रहे हैं, लोग मिल रहे हैं, मुझे भी किसी की याद आ रही है। कौन? अरे भई, अपने मटकू भईया! याद आया? बिल्कुल आ गया होगा! उन्हें भला कौन भूल सकता है? तो चलिए, आज उनसे मिल आया जाए। वैसे एक बात तो तय है - आज मुझे जबर्दस्त डांट मिलने वाली है, फिर भी... 


लो भई, आ गए हमलोग। तो क्या कहते हैं आपलोग? घंटी बजा दी जाए? 


टिंग-टांग


दरवाजा खुलते ही भईया के दर्शन होते हैं। 

"भईया प्रणाम।"

भईया अवाक खड़े हैं। शायद उन्हें सहसा यह विश्वास करना कठिन हो रहा है कि सामने मैं ही खड़ा हूँ। 

"भईया प्रणाम।" मैंने फिर से हाथ जोड़े।

"अरे तुम! एतना दिन बाद! दिन क्या? साल बोलो, साल! हम त सोचे कि कहीं तुम भी राजनीति में त नहीं चला गया। लेकिन चुनावी मौसम में भी तुमरा दर्शन नहीं हुआ त लगा कि घर-परिवार में व्यस्त होगा। अंदर आओ।" 

मैं वाकई कई सालों बाद आया था। थोड़ा डर रहा था। लेकिन भईया अब भी वैसे के वैसे ही थे - मस्तमौला, बेपरवाह, अक्खड़!

"बैठो, अब अपने घर में भी बैठने के लिए तुम्हें कहना होगा?" भईया पुराने रूप में थे। 

"और भईया, बिहार चुनाव है। कोई वैक्सीन दे रहा है, कोई बेरोजगारी भत्ता और कोई प्रवासी मजदूरों का मुद्दा उछाल रहा है। कोई "उनके" पंद्रह साल बनाम "हमारे" पंद्रह साल का हिसाब दे रहा है। आप क्या दे रहे हैं?" मैंने बैठते हुए कहा।

"अरे हम क्या देंगे? इ बिहार की गौरवशाली भूमि है। रामायण काल से ही इसकी गौरवगाथा शुरू हुई। मगध के महा-शक्तिशाली साम्राज्य हों, बुद्ध - महावीर हों, बिहार ने एक से बढ़कर एक सपूत पैदा किए।"

"भईया बात तो आपकी सही है। लेकिन आज बिहार की ऐसी हालत क्यों है?"

"बात तो तुम सौ टका सही कह रहे हो। ईसा पूर्व जिस राज्य का परचम तक्षशिला से बंगाल तक फहराता था, उसका ई हाल कईसे हुआ?"

"कैसे हुआ भईया?" मैंने भी कुरेदा। 

"जानते हो, इस बार नवरात में सोचे कि सुबह सुबह डाभ पिया जाए। पेट ठंडा रहता है। त बग्गले का एगो फल वाला को बोले कि पहुँचा दो। उ मान गया। दू दिन त ठीक डाभ दिया। तेसर दिन एक ठो छोटका वाला घुसा दिया। हम कुछ न बोले त पंचवा दिन और खराब दिया। छठा दिन से हम लेना बंद कर दिए। " भईया अब आवेशित हो रहे थे। मुझे हँसी आ गई। 

"भईया, वो तो निपट अवसरवादी निकला। उसने तो सोने का अंडा देने वाली मुर्गी को ही काट दिया।"

"सही समझे हो। कभी शांति से बैठना तो इसके विराट स्वरूप पर भी विचार करना।"


मैं अब भी सोच में हूँ....








Thursday, October 8, 2020

डूबता सूरज

 डूबता सूरज 


नीले आसमान को

नारंगी करता हुआ 

लाल-बैंगनी-काला

अंधेरा भरता हुआ 


डूबेगा सूरज तो

निकलेंगे सूरज कई

जुगनुओं में, दीपों में 

तारों में, ले रौशनी नई


Monday, October 5, 2020

गिद्ध

 गिद्ध

तुम नोचते

मरणोपरांत 

नोच कर मारना

मार कर नोचना 

बस इंसानो की 

खासियत है 



#truth

Sunday, September 20, 2020

दोबारा मत पूछना

 टी वी ने कहा

पूछ डाला तो 

लाइफ झिंगालाला 


तो हमने पूछा 

महँगाई घटेगी?

वे बोले - तुम हो

जिम्मेदार इसके 


आबादी बढ़ाते,

बढ़ाते ही जाते

हर एक जगह 

लाइन हो लगाते


हमने फिर पूछा 

शिक्षा हमारी 

क्यों है लचर?

क्या है बीमारी?


वे बोले - अभी 

बताया तो था

कि तुम ही हो

जिम्मेदार इसके 


हमने फिर से 

नया सवाल दागा 

स्वास्थ्य व्यवस्था 

किधर है भागा?


वे गुस्सा हो गए

कितनी बार बताऊँ

कि तुम ही हो

जिम्मेदार इसके


गंदगी फैलाते तुम

तंबाकू चबाते तुम

खुद दवाईयाँ खरीद 

डाक्टर बनते तुम 


हमने किया अपने

ब्रह्मास्त्र का वार

क्यों नहीं है काबू

देश में भ्रष्टाचार?


इस बार तो वे बस

मुस्कराए, फिर हँसे

अबकी बार तुम

बिलकुल सही फँसे!


हाथी के दाँत हैं 

इस पर तुम सोचना 

और हाँ। खबरदार!

दोबारा मत पूछना 

Tuesday, September 8, 2020

अंतर्द्वंद

 


अनमयस्क सा आकाश 

अनासिक्त सा अंतर्मन 

ख्वाहिशों की डोर कभी

हाथ आती, छूट जाती


Saturday, August 15, 2020

आजादी

आजादी 

सोचने की 

समझने की 

सुनने की

बोलने की 


सम्मान 

व्यक्ति का

राष्ट्र का

देने की आजादी 

पाने का भी हक


समानता 

विचार में 

व्यवहार में 

भागीदारी में 

सम्मान में 


उम्मीद - कि

नेक बनेंगे 

एक बनेंगे 

एक रहेंगे 

संग चलेंगे 



चौहत्तरवें स्वतंत्रता दिवस की बधाई।

Wednesday, July 15, 2020

प्रवासी

रोटी की आस लिए
सपने कुछ पास लिए
घर गाँव जवार छोड़

आधा इधर छूट गया
आधा उधर छूट गया
माटी से मुँह को मोड़

रात दिन मजूरी की
रोटी की चिरौरी की
अपना हाड़ हाड़ तोड़

सपने तो सपने हैं
सपने कहाँ अपने हैं
सच से है कहाँ जोड़?


Monday, April 13, 2020

अखबार कह रहा है

जिस पन्ने पर छपा है
कोई भूख से मर गया
उसी पन्ने में लपेट
रोटी लाया है दुखिया

इश्तेहार है जिस पन्ने पर
सुपर-स्पेश्यलिटी का
सरकारी रूग्णालय में
उसी पन्ने पर सोए काका

जिस पन्ने पर छपा है
कन्या पूजन की बात
उसी पन्ने में लिपटी मिली
कूड़े के ढेर में नवजात

खबर छपी: नेताजी अब
नहीं सहेंगे भ्रष्टाचार
उनके काले धन की गड्डी
बंधी रखी थी उस अखबार

खबरों और पन्ने में
अजीब जंग जारी है
अखबार कह रहा है
वक्त सब पर भारी है