Saturday, May 23, 2015

The Palm Psalm

   Palms are a common sight in middle eastern countries but what if you happen to spot one right here in Jamshedpur? What would be your reaction? Well, initially I thought that I was daydreaming. A palm? It wasn't here a few days back. How come a tree such big go unnoticed? So, I stopped to have a better look of it.



 A closer look revealed the truth. It was NOT a palm tree. It is a Reliance 4G tower being set up by Reliance Jio. I think it is one of its kind of camouflage tower installed.

  With the leaves and trunk, you will surely mistake it for a palm tree. What else is better fit for a town that is "Clean City, Green City, Steel City".

In fact, many other such towers being set up will double up as high-mast lights. You will notice that the conventional vapour lights are being replaced by LED street lights!

Interesting! Isn't it?

Friday, March 6, 2015

बुरा न मानो होली है

अंग अंग
हो रंग रंग
भंग संग
बाजे मृदंग

कान्हा चले
ग्वालों के संग
हाथों में रंग
मन में उमंग

सखियाँ सहित
राधा खङी
कान्हा को रंगने
को अङी

दिक् दिक् रहा था
रस बरस
उल्लास उत्सव
का सरस

रस रंग राग
आया है फाग
हर मन मे आज
बजने दो साज

हर द्वेष भूल
खिलने दे फूल
बस मिल गले
आगे चलें

जीवन तो
हँसी ठिठोली है
बुरा न मानो
होली है

Thursday, February 12, 2015

अछूत


आज अट्ठाईस दिसंबर है। बच्चों की परीक्षाएँ ख़त्म हुए पूरे चार दिन बीत चुके हैं। इन चार दिनों में वे जितना खेलने की सोच सकते थे, उतना खेल चुके थे। आज छुट्टी का पाँचवा दिन है। शैतान-मंडली सुबह से ही सुस्त है। रौनी और चिंकी अपने दोस्तों के साथ सर्दी की अलसाई धूप में खुद भी अलसाये-अलसाये से लॉन में पड़े हैं –

“यार, बोर हो गए।” रौनी बोला।

चिंकी ने भी भाई की हाँ-में-हाँ मिलाया - “हाँ यार। ये मम्मी-पापा भी ना; कहीं घुमाने कहो तो बहाना बनायेंगे कि छुट्टी नहीं है।”

बहन का साथ पा कर रौनी का गुस्सा फूट पड़ा - “देखना, आज सन्डे है लेकिन बहानों का संडे कभी नहीं आता।”

तभी बाहर से आवाज़ आई – “आदित्य, ओ आदित्या!”

“क्या है मम्मी?”

“जल्दी से घर आ जाओ। पापा आ गए हैं और हम सब जू घूमने जा रहे हैं।”

“अभी आया! बाय रौनी। बाय चिंकी। बाय सैडी।”

सैडी यानि सुन्दरमण भी उठ चुका था, “बाय रौनी। बाय चिंकी। मैं भी अब चलता हूँ।”

“बाय अंकल”

“बाय बेटा।” बाज़ार से लौट रहे शास्त्री जी ने जवाब दिया। अंदर घुसते ही उनका सामना रौनी-चिंकी से हुआ। उनके उतरे चेहरे देख कर उन्हें किसी अनहोनी का अंदेशा तो हुआ पर उन्होंने तूफ़ान को छेड़ना उचित नहीं समझा। अंदर मिसेज शास्त्री ने आँखों-आँखों में बच्चों की नाराज़गी का कारण बता दिया। फिर क्या था! बस घंटे भर की बात थी और पूरा परिवार सिटी-पार्क में था।  

शहर के बीचों-बीच बना ये पार्क शहर की शान है। शहर की तेज़-रफ़्तार ज़िन्दगी यहाँ आ कर थम सी जाती है। करीने से बनी क्यारियों में भाँति-भाँति के पुष्प हों या उनका रस पीने को तत्पर तितलियाँ, पेड़ों पर भागती गिलहरियाँ हों या पत्तों के बीच लुक-छुपी करते पंछी, जीवन के अनेक रंग यहाँ बिखरे पड़े हैं। मुग़ल-गार्डेन के फूलों को निहारते-सराहते, फव्वारों के किनारे चलते-चलते परिवार अब चिल्ड्रेन-पार्क तक आ पहुँचा था।

“बच्चों, तुम दोनों मम्मी के साथ यहाँ खेलो। तब तक मैं लंच ले आता हूँ।” दोनों बच्चों ने आगे कुछ सुनने की बजाय झूले की ओर दौड़ लगा दिया। शास्त्रीजी ने पत्नी की ओर देखा और दोनों मुस्कुरा दिए।

“तुम इनका ख्याल रखना, मैं अभी आता हूँ।”


कुछ आधे घंटे में ही मिसेज शास्त्री ने शास्त्री जी को आते देखा। उनके हाथों में जो थैला था, उसके वजन के अंदाज़े से लग रहा था कि आज तो जम कर मौज होने वाली है। उन्होंने तुरंत बच्चों को आवाज़ लगाई -
"रॉनी! चिंकी! बेटा पापा आ गए हैं। तुम दोनों भी आ जाओ। जल्दी करो वरना खाना ठंडा हो जाएगा।" 

एक खुली सी शांत और साफ़ जगह देख कर शास्त्रीजी ने चादर बिछा दी। बात की बात में प्लेटें सज गईं और लाजवाब व्यंजनों का दौर शुरू हो गया।

“मम्मी, जरा चिली-चना तो बढ़ाना।” रौनी बोला।

“मेरे लिए पनीर-मसाला...” ये चिंकी थी।

सब अपनी मस्ती में खा रहे थे कि अचानक रौनी ज़ोर से चिल्लाया – “शू... हट... चल भाग यहाँ से।” यह एक आवारा कुत्ता था जो शायद भोजन की सुगंध से खिंचा चला आया था। शास्त्रीजी ने ऐसा दिखाया जैसे कि उनके हाथ में पत्थर हो और उसे कुत्ते की दिशा में फेंकने का नाटक किया। इसका असर हुआ और कुत्ता उलटे पाँव भाग चला। रौनी अब सहज हो चला था। उसने निश्चिंत होकर जैसे ही मुहँ में कौर डाला, उसकी निगाहें पेड़ की ओट में खड़े दो मलिन-मुख बालकों से जा टकराई। उसने सरसरी निगाह से देखा, दोनों ने फटे हुए वस्त्र धारण कर रखे थे जो शायद किसी वयस्क के थे। दोनों ही खाने को ललचाई निगाहों से एकटक घूर रहे थे। रौनी फिर असहज हो गया। उसकी असहजता  सहज ही परिजनों की  निगाहें उस ओर ले गयी जिधर रौनी देख रहा था। चार जोड़ी आँखों को अपने ऊपर टिका देख पहले तो दोनों सकपकाए, फिर पेड़ की ओट से निकल कर थोड़ा निकट आ कर खेलने लगे। उनकी निगाहें अब भी भोज्य-सामग्री पर ही टिकी थीं।

बालकों के निकट आ जाने से पूरा परिवार असहज हो उठा। सबने जल्दी-जल्दी खाना ख़त्म किया और जूठा समेटने लगे। रौनी ने देखा कि उन्होंने जो जूठा फेंका था, दोनों बच्चे उसमें से बचा-खुचा निकाल कर खा रहे हैं। मिसेज शास्त्री ने शायद बेटे की स्थिति भांप ली थी। उन्होंने बैडमिंटन उठाया और रौनी के साथ खेलने लगी। माहौल फिर से खुशनुमा हो चुका था। शाम ढ़लने लगी थी और ठंड भी बढ़ रही थी। अब समय आ गया था कि घर को प्रस्थान किया जाए। शास्त्री परिवार सामान समेट कर चलने को हुआ कि दोनों बच्चे फिर से आ धमके। उनकी उपस्थिति ने मिसेज शास्त्री के अंदर गुस्से की लहर दौड़ा दी थी। शायद दोनों बच्चों ने इसे समझ लिया था, इसलिए वे उनकी तरफ ही हाथ फैलाये बढे –

“माई, कुछ दे दो माई।”

“हटो! पीछे हटो” कहते हुए मिसेज शास्त्री खुद ही पीछे जाने लगीं पर बच्चे भी कहाँ मानने वाले थे। एक ने बाएँ हाथ से उनका दुपट्टा पकड़ लिया और दाहिने हाथ से बार-बार उनके पैर छू कर प्रणाम करने लगा। मिसेज शास्त्री इस अप्रत्याशित हमले के लिए तैयार नहीं थीं। उन्होंने झटका दे कर अपना दुपट्टा छुड़ाया और पति के पीछे जा छुपी। इतनी देर में शास्त्रीजी ने समझ लिया था कि इन बच्चों से पीछा छुड़ाना आसान नहीं होगा। उन्होंने झट से दस का एक नोट निकाला और मामले को निपटाया किन्तु मिसेज शास्त्री का मूड ख़राब हो चुका था।

“आवारा! भिखमंगे! सारा मूड ख़राब कर दिया।” मिसेज शास्त्री का गुस्सा तो जैसे सातवें आसमान पर था।

“देखा आपने! उसने मुझे छू लिया! मेरे कपड़े गंदे कर दिए। वाहियात गंदे बच्चे।” मिसेज शास्त्री अब अपने पति से मुखातिब थीं।

“मम्मी-मम्मी, क्या वे अछूत बच्चे हैं जो उनके छू लेने से आप इतनी नाराज़ हो?” ये चिंकी थी।

“..........................”

नन्हीं बच्ची के मासूम सवाल का निहितार्थ इतना गहरा था कि मिसेज शास्त्री अवाक् रह गई। पत्नी के गुस्से और बच्ची की जिज्ञासा में टकराव न हो, इसलिए शास्त्रीजी बोले, “रौनी-चिंकी, देखूं तो कि दोनों में कौन गाड़ी के पास पहले पहुँचता है!” सब कुछ भूल कर पल में ही दोनों हवा से बातें करने लगे।

इधर एक पेड़ के नीचे खड़े दोनों लड़के मिस्टर और मिसेज शास्त्री को जाते देख रहे थे। एक ने दूसरे से कहा –

“भाई ये अच्छे कपड़े वाले हमें अछूत क्यों समझते हैं?”

“अबे अच्छा ही है कि अछूत समझते हैं। इसी बहाने हमें पैसे तो मिल जाते हैं”

दोनों ही मस्ती में खिलखिला दिए।

Friday, January 16, 2015

गोवा की सैर: दूधसागर प्रपात व अन्य


सुबह-सुबह मोबाइल के बजने से जब हमारी नींद खुली तो देखा कि अनिलजी फोन पर थे. उन्होंने कहा कि सवा-सात बज रहे हैं और मैं गाड़ी के साथ आपका इंतज़ार कर रहा हूँ. कल के व्यस्त कार्यक्रम ने हमें पस्त कर दिया था किन्तु अनिलजी के एक काल ने जैसे हमारे पैरों में पहिये लगा दिए. हमने उन्हें थोड़ा इंतज़ार करने को कहा किन्तु ये इंतज़ार भी घंटे भर का हो गया. सवा-आठ बजे हम गाड़ी में थे और गाड़ी हवा से बातें कर रही थी. अनिलजी को जब यह मालूम हुआ कि हम लोगों ने नाश्ता भी नहीं किया है तो उन्होंने नवतारा रेस्त्राँ के सामने अपने गाड़ी लगा दी. संगोल्डा क्षेत्र में स्थित ये रेस्त्राँ अभी पूरी तरह से खुला नहीं था किन्तु हमें गरमा-गर्म नाश्ता और कॉफ़ी, दोनों ही मिल गए. गोवा विधानसभा के सामने से होते हुए जब हम मांडवी नदी ( #RiverMandvi )पर बने पुल को पार कर रहे थे, तब सवा-नौ बज रहे थे. यहाँ से गाड़ी काफी दूर तक नदी के किनारे-किनारे गयी. वहां दलदली ज़मीन पर मछली पकड़ने का जाल लगा देख हमें उत्सुकता हुई. पता चला कि ज्वार-भाटे के साथ यहाँ मछलियाँ पकड़ी जाती हैं.
Fishing Nets in shallow water
इस रास्ते पर कुछ दूर तक तो ये एहसास ही नहीं होता कि आप भारत में हैं. ऐसा लगता है मानो हम पुर्तगाल के किसी गाँव से गुजर रहे हैं. एक बार गाड़ी शहर की सीमाओं से बाहर हुई तो पहाड़ो पर धुंध देखकर ये बता पाना मुश्किल था कि अभी सुबह के तकरीबन दस बज रहे हैं.
The foggy morning

नज़ारों का आनंद लेते हुए जब हम अपने गंतव्य तक पहुंचे तब पौने-ग्यारह बज रहे थे.
Just a step from Kullem stand
कुलेम रेलवे स्टेशन के पास दूधसागर ( #DudhSagar ) जीप स्टैंड है. यहाँ एक काउंटर है जहाँ हमने अपना पंजीकरण कराया. पंजीकरण शुल्क 350 रूपए प्रति व्यक्ति था जो दरअसल गाड़ी का टिकट था. फिर 30 रूपए प्रति व्यक्ति देने पर हमें लाइफ-जैकेट मिला, इस हिदायत के साथ कि अगर इसे उतारा तो तुम्हारा जाना रद्द! वहां एक सज्जन थे जो सारी गतिविधियों की निगरानी कर रहे थे. गाड़ी मिलने में देर होने लगी तो मैंने शिष्टाचारवश उनसे पूछा – सर, आपका नाम क्या है? वे भड़क गए – सभी लोग यहाँ मुझे अंकल बुलाता है. यहाँ तक कि मेरा बच्चालोग भी मेरे को अंकल बुलाता है. तुम भी अंकल ही बोलो और अपना काम बताओ. मैं स्तब्ध था. फिर मैंने पूछा कि काफी देर हो गयी और हमें गाड़ी नहीं मिली. तब उन्होंने बताया कि दूधसागर जाने के लिए तकरीबन 50 गाड़ियाँ चलती हैं किन्तु अभी सिर्फ 30 गाड़ियों को फिटनेस प्रमाण-पत्र मिला है. वे बोले – तुम लोग लक्की है मैन कि ट्रिप चालू हो गया. अभी मंडे को ही ट्रिप शुरू हुआ है नहीं तो बारिश में ये बंद हो जाता है. हमने राहत की सांस ली कि आना सफल रहा वरना.
Uncle in blue
खैर, घंटे भर बाद हम गाड़ी के अन्दर थे. यहाँ से प्रपात तक का सफ़र रोमांचक भी था, डरावना भी. कभी जंगल अपनी विशालता से मुग्ध करता, कभी अपनी जटिलताओं से साँसे रोक देता.

Roaring through the mighty flow
सवा घंटे में 10 किलोमीटर का सफ़र तय कर हम जल-प्रपात के पास पहुंचे. फिसलन भरे उबड़-खाबड़ रास्तों को पार करके जब हम प्रपात तक पहुंचे, लगा कि इतनी मेहनत से यहाँ तक आना सफल रहा.
Dudhsagar Falls

जंगल के इस साहसिक अभियान ने हमारे अन्दर एक नया जोश भर दिया. हमें करीब एक घंटे तक यहाँ रहने की इजाज़त थी, सो दो बजते ही हमलोग गाड़ी की ओर वापस चल दिए.
Devil's Canyon

लौटते वक़्त ड्राईवर ने सिर्फ एक घंटा ही लगाया और हम जल्दी-जल्दी लाइफ-जैकेट लौटाकर वापसी के सफ़र पर निकल पड़े.

आधे-घंटे के सफ़र के बाद हम सहकारी स्पाइस फार्म के सामने थे. घड़ी देखा तो पौने-चार बज रहे थे. वैसे तो हमने यहीं अपने दोपहर के भोजन का सोच रखा था किन्तु यहाँ घूमने में कम-से-कम तीन घंटे लगते. सो, हम आगे बढ़ गए.
Farmagudi Fort


ShantaDurga Temple

रास्ते में भोजन किया और शांतदुर्गा मंदिर पहुंचे. ये मंदिर काव्लेम में स्थित है और यहाँ देवी दुर्गा के शांत-स्वरुप की पूजा होती है. मंदिर की भव्यता और अनूठा स्थापत्य देखने योग्य है. यहाँ हमने बीस मिनट बिताये.
Wax meuseum

यहाँ से निकले तो लगभग चालीस-पैंतालीस मिनट में गोवा के मोम-संग्रहालय ( #GoaWaxMuseum ) पहुँच गए. यहाँ प्रवेश के लिए कुछ साठ या पैंसठ रूपए प्रति-व्यक्ति का शुल्क निर्धारित है. ये जगह छोटी है. सिर्फ दस मिनट में आप इसे पूरा घूम लेंगे और अगर बच्चे साथ नहीं हैं तो इसे छोड़ा भी जा सकता है.

Bascilica of Bom Jesus

फिर हम बोम जीजस ( #BomJesus ) का महागिरिजाघर गए. इसका निर्माण १५९४ ईo में किया गया था. यहाँ संत फ्रांसिस ज़ेवियर का शारीरिक अवशेष रखा गया है. यहाँ हमें पच्चीस मिनट लग गए. जब हम निकले तो सामने अवस्थित म्युजिअम  के बंद होने का समय होने लगा था. हम अब थक भी गए थे, तो म्युजिअम और चर्च को बाहर से ही देखते हुए हम “वायसराय का कमानी-द्वार” देखने गए. 

Se Cathedral

Viceroy's Arch


इसे फ्रांसिस्को ड गामा ने अपने प्रपितामह वास्को ड गामा की स्मृति में बनवाया था और यह इस शहर पर पुर्तगालियों के विजय का प्रतीक था.

Ruins of the church of St. Augustine

यहाँ से निकले तो संत अगस्टीन चर्च के अवशेष देखते हुए वापसी को निकल पड़े. सूरज अब छिपने को था. हम भी थक कर चूर हो चुके थे. सो सीधे कमरे में आये, खाना खाया और घोड़े बेच कर सोने चल दिए!

दो दिनों तक लगातार घूमने के बाद हमने तय किया कि अब बारी समुद्र का मज़ा लेने की है. अनिलजी ने बताया कि इसके लिए कालान्गुट बीच ( #Calangute ) ठीक रहेगा. हमने उनकी बात पर अमल करते हुए नाश्ते के बाद का प्रोग्राम बनाया.
People enjoying on Calangute Beach


Riding on the waves

समुद्र-तट पर हमें अनेक दलाल मिले किन्तु हमने काउंटर से टिकट कटाया और विभिन्न जल-क्रीड़ाओं का आनंद लिया. प्रत्येक गतिविधि के लिए अलग शुल्क निर्धारित है जोकि 200 से 500 रूपए प्रति-व्यक्ति प्रति-फेरा तक है. दोपहर के दो बजते-बजते हम थक भी गए थे और बुरी तरह से भीग भी गए थे. सो हमने लौटने का फैसला किया. हमें पता चला कि यहाँ के सुलभ शौचालय में कपड़े बदलने की सुविधा उपलब्ध है. हमारे पास कपड़े तो थे ही, तो हमने सोचा कि गीला रहने से अच्छा है कपड़े बदल लिए जायें. जब हम अंदर गए तो चारों ओर गंदगी का अंबार था. ऐसा लगता था कि सदियों से यहाँ सफाई नहीं हुई हो. जैसे-तैसे हमने नाक बंद कर कपड़े बदले. ऐसी घटिया व्यवस्था के भी हमें 20 रूपए प्रति-व्यक्ति के हिसाब से देने पड़े.

वापस आकर हमने नहाया, खाया और आराम करने का सोच ही रहे थे कि अनिलजी ने फोन करके याद दिलाया कि हमने छः बजे के रिवर-क्रूज का टिकट बुक करा रखा है. अगर हम समय से नहीं निकले तो हमें बाद वाले जहाज में जगह मिलेगी. फिर क्या था, हम सब पुनः तैयार होने में लग गए. नियत समय पर हम पणजी स्थित सैंटा मोनिका रिवर क्रूज ( #GoaRiverCruise ) प्रस्थान स्थल पर पंक्तिबद्ध होकर अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे.

Ferry as seen from the bridge

Children enjoying on Santa Monica river cruise

A view from the cruise


हमें जल्द ही बैठने की अच्छी जगह मिल गयी. जलयान भी नियत समय पर अपनी यात्रा पर निकल गया. सामने एक स्टेज बना था और पीछे खाने-पीने का स्टाल लगा था. इन दोनों के बीच था अंतहीन मस्ती-मजा का कार्यक्रम. स्थानीय कलाकारों ने गोवा की संस्कृति और दर्शन के दर्शन तो कराये ही, दर्शकों को भी साथ में नचाया. लहरों से खेलता जलयान धीरे-धीरे समुद्र की ओर बढ़ने लगा. डूबते सूरज की लालिमा जब बलखाती लहरों से टकरा कर चमकती तो ऐसा लगता मानो पानी पर स्वर्ण-कण बिखरे पड़े हों. बाहर अद्भुत नज़ारे और अंदर जोशीला कार्यक्रम, समझ नहीं आ रहा था कि बाहर देखें या अंदर. डेढ़ घंटे का ये सफ़र कब शुरू हुआ और कब ख़त्म, इसका पता ही नहीं चला. जब हम वापस आये तो अपने साथ मुस्कुराहटें लेकर लौटे. सुबह की थकान गायब हो चुकी थी. रही-सही कसर राजू के शानदार खाने ने पूरी कर दी. अंत भला तो सब भला.

आज गोवा में हमारा चौथा और अंतिम दिन है. तीन दिनों के अतिव्यस्त और थका देने वाले कार्यक्रम के बाद आज हमने थोड़ा सुस्ताने का मन बनाया. आखिर हमें वापसी की लम्बी यात्रा भी तो करनी थी. तो हमने सुबह में स्थानीय जगहों को पैदल ही देखने का मन बनाया.

Chauranginath Gram Devsthan

शुरुआत हुई श्री चौरंगीनाथ ग्राम देवस्थान से. यहाँ पूजा-अर्चना कर हम पैदल ही अगल-बगल की खोजबीन करने निकल पड़े. यहाँ आस-पास ही एक वाटर-पार्क और एक गो-कार्टिंग ट्रैक भी है. हरी-भरी पहाड़ियों से घिरा ये इलाका अत्यंत शांत और मनोरम है. आस-पास के क्षेत्रों का परिभ्रमण कर हम खाने के लिए लौट आये. हमें शाम की गाड़ी पकड़नी थी, तो हमने अपना सामान समेटा, राजू और अनिलजी को सधन्यवाद उनके प्रयासों को सम्मानित करने का प्रयास किया और अनेक यादें समेटे गोवा से रुखसत हो लिए.

Tuesday, January 13, 2015

गोवा की सैर: उत्तरी गोवा


सुनहरी रेत पर फ़िसलती चाँदनी, रंग-बिरंगे झाड़-फानूसों की अठखेलियाँ, नाना प्रकार के व्यंजन और मौज-मस्ती में लीन ज़िन्दगी से बेपरवाह युवा, ज़ेहन में सिर्फ एक ही छवि बनाते हैं – गोवा! क्षेत्रफल के हिसाब से देश का ये सबसे छोटा राज्य देसी-विदेशी सैलानियों की सूची में ऊपर रहता है।

कुछ दिनों पूर्व यूँ ही बनते-बनते बात बन गई और मैं सपरिवार निकल पड़ा गोवा की सैर को। मेरे जो मित्र वहाँ से हो आए थे, उनकी सलाह पर अमल करते हुए मैं मुंबई के रास्ते गोवा की ओर निकल पड़ा। मुंबई से सुबह-सुबह गोवा के लिए एक रेल चलती है – मांडवी एक्सप्रेस। दोस्तों ने बताया था कि इस गाड़ी की ख़ासियत इसकी पैंट्री है। एक बार रेलगाड़ी मुंबई की सरहदों से बाहर हुई तो नजारों ने यूँ बाँध लिया कि बस। हरे-भरे पहाड़, बलखाती नदियाँ, नारियल के कतारबद्ध पेड़, सुंदर गाँव और साथ चलते सड़क पर सरपट दौड़ते वाहन, बाहर नज़ारे तो मानो थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे और अन्दर पैंट्रीवाले खाने के विविध व्यंजनों की रफ़्तार थमने नहीं दे रहे थे। इडली, मेदुवडा, वड़ापाव, उपमा-शीरा और भी न जाने क्या-क्या खा-खा कर हमारी हालत ऐसी थी कि दोपहर के भोजन के लिए पेट में जगह नहीं बची। अनेक स्टेशनों, पुलों और सुरंगों से होती हुई हमारी रेल तकरीबन तीन घंटे विलंब से थिविम स्टेशन पर पहुंची।








हमारे मेज़बान (मैं उन्हें मेज़बान ही कहना पसंद करूंगा) ने हमें पहले ही बता दिया था कि स्टेशन से बाहर निकलते ही प्री-पेड काउंटर से हमें टैक्सी लेना है। आधे घंटे में हम उनके निवास पर थे। हमारा कमरा और गरमा-गर्म खाना, दोनों ही तैयार थे। वहीँ हमारी मुलाकात राजू से हुई। अगले तीन दिनों तक वही हमारा व्यवस्थापक, बावर्ची और टूर-प्लानर था। उसने हमसे पुछा – आप गोवा क्यूँ आये हैं? सवाल अटपटा था। हम चकराए। फिर उसने बताया कि गोवा आने वाले लोग अलग-अलग भावनाएँ और योजनाएँ लेकर यहाँ आते हैं। हर किसी को उसके पसंद के गोवा से मिलवाना ही उसका काम है। “आप खुश तो मैं भी खुश!” उसने हँसते हुए कहा था।

अगले दिन सुबह-सुबह उसने चाय के साथ हमें अनिलजी से मिलवाया। वे अपनी गाड़ी लेकर पर्यटकों की सेवा में उपस्थित रहते हैं। हमने उन्ही से पुछा कि हमें क्या देखना चाहिए और किस प्रकार उसको व्यवस्थित करना है। उन्होंने कहा कि आज सुबह से शाम तक मैं आप सबको उत्तरी गोवा घुमा लाता हूँ। जब हमने उनसे पैसों की बात की तो बोले, पहले आप घूम लो, अच्छा लगे तो पेट्रोल के दाम दे देना।

फिर क्या था। हमने नाश्ता किया और चल पड़े उनके साथ। हालाँकि हमें थोड़ी देर हो गयी थी पर हम लोग साढ़े-ग्यारह बजे अगुआडा फोर्ट ( #FortAuguada ) में थे। मांडवी नदी के उत्तरी मुहाने पर बना यह किला शानदार है। दो तलों वाला यह किला १६१२ में पुर्तगाली पोतों के विश्राम-स्थल और पेयजल आपूर्ति केंद्र के रूप में बनवाया गया था। उपरी तल में करीब 24 लाख गैलन पानी जमा रखने की सुविधा है। यहाँ का लाइट-हाउस देखने लायक है। इस स्थल पर खड़े होकर नदी पार पंजिम की खूबसूरती देखते ही बनती है। किले के निचले तल का उपयोग जहाजों की गोदी के रूप में होता था।


यहाँ करीब एक घंटे बिताने के बाद हम निचले तल की ओर निकल पड़े। रास्ते में हमने नेरुल नदी और उसमें चल रही अनेक नौकाएँ देखीं। यहाँ मैं एक बात बता दूँ कि यहीं से डॉलफिन-दर्शन के लिए नौकाएँ उपलब्ध होती हैं। नेरुल नदी के किनारे से होते हुए ताज-विवांता के बगल से गुजर कर हम इस स्थल पर सिर्फ पंद्रह मिनट की ड्राइव में ही पहुँच गए। यहाँ खड़े होकर सिंक्वारिम बीच पर जल-क्रीड़ा का आनंद लेते सैलानियों को देखने का अपना ही एक अनुभव था। अनेक दलालों ने हमें भी सस्ते दर पर वाटर-स्कूटर और पारा-ग्लाइडिंग करने के लिए आमंत्रित किया किन्तु हमें इनमे दिलचस्पी तो थी नहीं, सो उन्हें मना कर दिया। यहाँ तकरीबन बीस-पच्चीस मिनट बिताने के बाद हम कांडोलिम बीच की ओर बढ़ चले।
अब दिन के कोई सवा-एक बज रहे थे। कांडोलिम-बीच पर भीड़ भी ज्यादा नहीं थी। यहाँ सफाई अच्छी थी किन्तु लहरें काफी ऊँची उठ रही थी। यहाँ हमें एक shack नज़र आया जिसका नाम था – सन्नी-साइड-अप। लाइव संगीत पर झूमते लोग और उन्हें खिलाने में व्यस्त वेटर, अन्दर का माहौल बिलकुल अलग ही था। अनिलजी ने हमें बताया कि नए साल में यहाँ ज़बरदस्त पार्टियाँ होती हैं। हाँ, एक बात तो मैं बताना भूल ही गया। shack का हिंदी रूपांतरण शायद मड़ैया या झोपड़ी हो, किन्तु गोवा में ये सबसे ज्यादा पाए जाने वाले और सर्वाधिक दर्शनीय स्थलों में से एक होते हैं। गोवा का पर्यटन व्यवसाय इनके बिना अधूरा है। ये पर्यटकों को खाने-पीने के साथ आराम और मनोरंजन भी मुहैया कराते हैं। यहाँ भी बीस-पच्चीस मिनट बिताने के बाद हम लोग कलांगुट बीच की ओर बढ़ चले।

रास्ते में मैंने ध्यान दिया कि ऐसी कई दुकानें हैं जिनके सूचना-पट्ट पर रूसी भाषा में लिखा हुआ था। अनिलजी ने हमें बताया कि रूसियों ने गोवा में काफ़ी अचल संपत्ति खरीद रखी है। एकीकृत रूस और यूरोपीय देशों के नौजवान पर्यटक अक्सर इनके यहाँ देखे जाते हैं। कलांगुट एक भीड़-भाड़ वाला इलाका है। यहाँ पर्यटकों के मनोरंजन के लिए काफी कुछ मौज़ूद है। बीच की ओर जाने वाले रास्ते में गोवा-दमन और दिउ के प्रथम मुख्य-मंत्री स्वर्गीय दयानंद बांदोडकर की प्रतिमा है। इस बीच पर आनेवाले ज्यादातर सैलानी भारतीय थे। लोगों का तो मानो रेला लगा हुआ था किन्तु फिर भी सभी अपने-आप में जैसे अकेले थे। एक दूसरे से बेपरवाह, अपनी ही मस्ती में डूबे हुए। यहाँ जल-क्रीड़ा हेतु अनेक साधन तो हैं ही, भोजन की भी कोई कमी नहीं। अगर आप पैसे खर्च करने को तैयार हों तो टैटू बनवा लीजिए, या कोई वस्त्र ले लीजिए और कुछ भी नहीं सूझ रहा हो तो शराब तो टैक्स-फ्री है ही। वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि यहाँ की पुलिस को शराब सूँघने में महारत है और पी कर आप तट पर नहीं जा सकते। यदि आप इसकी ज़बरदस्ती करें तो हो सकता है कि आप गिरफ्तार कर लिए जाएं। आखिर ये आपके खुद की सुरक्षा के लिए ज़रूरी जो है।

बहरहाल, अब पेट में चूहे कूदने लगे थे तो हमने तय किया कि घर वापस चलते हैं और राजू के हाथ का गर्मा-गर्म खाना खाते हैं। तीन बजते-बजते हम सब खाने की मेज पर व्यस्त हो चुके थे। सिर्फ एक घंटे में हम तरोताज़ा होकर वापस निकल चुके थे। सिर्फ बीस मिनट की ड्राइव के बाद हम सब चापोरा फोर्ट के पास थे। पूरी तरह से खंडहर में तब्दील हो चुका यह किला एक ऊँची पहाड़ी पर स्थित है। रोड से किले तक का रास्ता बहुत ही उबड़-खाबड़ है और मुरुम सी मिट्टी होने के कारण पाँव जमाना मुश्किल होता है। सावधानी से चढ़ते हुए जब हम ऊपर पहुंचे तो हमारी सांसें थमी-की-थमी रह गयी। नज़र जिधर घूमती थी, नज़ारे मन मोह लेते थे। पूर्व दिशा में चापोरा नदी का मुहाना और चापोरा बीच है जबकि दक्षिण में वागाटर-बीच है। अरब सागर का मनमोहक नज़ारा मजबूर कर देता है कि हम कहें – “दिल चाहता है...”। यहाँ हमने चालीस मिनट बिताये। वहां मौज़ूद अधिकांश लोग अब जाने लगे थे तो हम भी साथ हो लिए।



चापोरा किले ( #FortChapora ) से निकल कर सिर्फ दस मिनट में हम लोग वागाटर-बीच पर थे। इस बीच से चापोरा फोर्ट को देखने का एहसास ही अलग था। यहाँ से हम अंजुना बीच गए। जब पर्यटन का मौसम अपने चरम पर होता है, अंजुना बीच का फ़्ली-मार्केट पर्यटकों के बीच खासा लोकप्रिय होता है। वैसे ये बताते चलें कि आपने अपने शहर के साप्ताहिक हाट के बारे में तो ज़रूर ही सुना होगा। हमारे शहर में ये मंगलवार को लगता है और इसलिए मंगला-हाट कहलाता है। ये फ़्ली-मार्केट भी कुछ ऐसी ही चीज़ है। यहाँ से हम बागा-बीच पहुंचे। सूरज लहरों के पीछे छिप जाने को बेकरार हो रहा था, और हम उन लम्हों को अपनी यादों में समेट लेने के लिए बेताब थे। जब हम बीच की ओर बढे तो देखा कि चारों ओर काफी चहल-पहल है किन्तु एक स्थान-विशेष पर लोगों का हुजूम जैसे उमड़ा जाता था। नज़दीक जाकर देखा तो आश्चर्यचकित रह गए। वहाँ हिंदी फिल्मों के अभिनेता चंद्रचूड़ सिंह की शूटिंग चल रही थी। हम भी दर्शकों की भीड़ में शामिल हो गए। पाँच मिनट में ही शूटिंग ख़त्म और पैक-अप! फिर अभिनेता और अभिनेत्री के साथ तस्वीर खिंचवाने का दौर शुरू हुआ। हमने भी बहती गंगा में हाथ धो लिए और फिर अस्ताचलगामी सूर्य को विदाई देने चल दिए।





सूरज धीरे-धीरे लहरों के पीछे छिप गया और सिर्फ उसके लाल साफ़े के निशान रह गए। निशा ने शनैः- शनैः अपने आँचल लहराए और सारे जहाँ को अपने आगोश में लेने को मचल उठी थी। दिनभर की भाग-दौड़ से हम भी थक चुके थे, तो घोंसले की ओर लौटती चिड़ियों के झुण्ड के साथ हम भी अपने आशियाने की तरफ निकल गए। आज का दिन बहुत थकाने वाला था किन्तु हमने बहुत कुछ देखा और जाना। अनिलजी ने कहा कि सुबह साढ़े-सात बजे तैयार रहें, कल हम लोग दूधसागर जलप्रपात देखने चलेंगे। तो कल मिलते हैं।

Thursday, June 19, 2014

SUGGESTION

Every little seed, inside has a tree,

The power of it, we can't simply see.

The thoughts and ideas, dwelling in our mind,

Will blossom generously, only if we find –

An idea to nurture, and give it some time,

Do it, test it, tell it, you'll surely get a dime.

 

Call them intelligent; creative, nasty, foolish,

They're road to dreams, you always cherish,

A bowl fills with water, drop by drop,

Come one, come all, push hard, we move to the top,

Improvement is humane, and as they say,

Just keep on tryin', there's always a better way!

Friday, February 28, 2014

हैलो अंकल

मई की भीषण गर्मी ने मानो कर्फ्यू की घोषणा कर रखी थी।  आदमी तो आदमी, पशु-पक्षी भी दोपहर में बाहर निकलने से कतरा रहे थे। "स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया" की शाखा से बाहर आते हुए मधुकर बाबू एक पल को ठिठके। ज़ेब से रुमाल निकाल कर चेहरे को पोंछा और चारों ओर देखा। प्रत्यक्ष जीवन के सारे निशान उनके पीछे यानि कि बैंक के अंदर थे, बाहर नहीं। वे वापस आये, रुमाल को ठन्डे पानी से भिगोया और चेहरे पर बाँध लिया। ऊपर से हेलमेट लगाया और अपनी स्कूटर के पास आ कर खड़े हो गए। पल भर में ही वे रोड पर थे।
चिल्ड्रेन पार्क के बगल से दाहिना मोड़ लेते ही उन्हें एक ठेले पर "आम-पन्ना" दिखाई दिया। एक तो पेड़ों की छाँव, उस पर सूखते कंठ को तर कर लेने का साधन!  जानलेवा गर्मी में रुक कर दो मिनट सुस्ता लेने का इससे अच्छा बहाना और क्या हो सकता था भला?
"ओ भाई, ज़रा एक गिलास मेरे लिए भी बनाना। "
"अभी बनाता हूँ। "
मधुकर बाबू अब अपना हेलमेट उतार कर आस-पास का जायजा लेने में लग गए थे। तेज़ धूप मानो सड़क के अलकतरे को पिघला देना चाह रही थी। कुछ कुत्ते सड़क के किनारे खड़े ट्रक के नीचे सोये थे। ठेले के पास एक गाय खड़ी थी जिसके सामने "अशोक" की पत्तियां पड़ी थी। शायद ठेलेवाले ने ही उसे तोड़ कर दी होंगी। तभी उनके सामने से मोटर-साइकिल लेकर एक युवक निकला।
मधुकर बाबू सोचने लगे - ज़रूर इसे कोई अति-आवश्यक काम आ पड़ा होगा वर्ना इस गर्मी में कौन घर से निकलता है?
तभी युवक वापस लौटा और जिधर से आया था, उधर चला गया।
"अवश्य ही इसने कुछ छोड़ दिया है और अब उसे लेने जा रहा है", मधुकर बाबू ने अपने आप से कहा।
"कुछ बोले का सर?"
"नहीं-नहीं। मैंने तुमसे कुछ नहीं कहा।
मैं तो ये सोच रहा था कि आखिर ऐसा क्या काम आ पड़ा कि
इस लड़के को इतनी गर्मी में घर से निकलना पड़ा ?"
"अरे सर, आप भी तो घर से बाहर हैं।" ठेलेवाले ने मधुकर बाबू के हाथ में ग्लास थमाते हुए कहा।
उसकी रहस्यमय मुस्कान ने एक पल के लिए विचलित किया पर हाथों में ठंढक के एहसास ने उन्हें दूसरी ही दुनिया में पहुंचा दिया। 
ग्लास खाली होने तक युवक तीन-चार चक्कर लगा चुका था पर अब मधुकर बाबू की दुनिया में उसका कोई वज़ूद नहीं था।
आम-पन्ना ने जैसे उनके भीतर फिर से जीवन का संचार कर दिया था।
मधुकर बाबू ने फिर से रुमाल बांधा और चल दिए। गर्मी की धाह से आकृतियाँ हिलती-डुलती सी प्रतीत हो रही थी। उन्होंने देखा कि कोई लड़की अपनी कॉपी को सर पर रख कर गर्मी से लड़ने की असफल चेष्टा करते चली जा रही है। तभी बड़ी तेज़ी से वही युवक उनके बगल से निकला और लड़की के पास पहुँच कर गाड़ी रोक दी। मधुकर बाबू ने देखा कि लड़की छिटक कर एक किनारे हो गयी है। उसकी रफ़्तार भी बढ़ गयी है। जिस तरह खरगोश बाज़ के हमले से बचने के लिए भागता है, लड़की भी अब कुछ वैसा ही कर रही थी। मधुकर बाबू को ये अच्छा नहीं लगा। उन्होंने स्कूटर की रफ़्तार बढ़ाई और तुरंत वहाँ तक पहुँच गए।


"ऐ लड़के", उन्होंने कड़क आवाज़ में कहा। लड़की अब रुक गयी और थोडा खिसक कर मधुकर बाबू के स्कूटर की तरफ हो ली। डूबते को तिनके का सहारा जो मिल रहा था! वे फिर से गरजे -

"क्या हो रहा है? लड़की को क्यों तंग कर रहे हो?"

उनकी हरकत ने एक बेकार बैठे ऑटो वाले का ध्यान आकर्षित किया और वो भी अपनी गाड़ी लेकर चला आया।

"क्या हुआ भैया? कोई दिक्कत है क्या?"

"नहीं भाई। मुझे क्या दिक्कत होगी? दिक्कत तो इसे है।" मधुकर बाबू ने लड़के की तरफ इशारा करते हुए कहा।

"क्यों रे! मार खाने का मन है क्या? पता है न, पब्लिक जब मारती है त पुलिसो से भयंकर मारती है।" ऑटो-वाला बोला।

तू-तू मैं-मैं होता देख लोग अब रुकने लगे थे। शायद लड़के को लगा कि स्थिति जल्द ही बेकाबू हो जायेगी। उसने गाडी को गियर में डाला और चलता बना।

मधुकर बाबू ने लड़की को देखा। गर्मी से लाल चेहरा और आँखों में पानी। उन्हें बड़ी दया आयी। ऑटो-वाले से बोले,

"भैया। जरा इसे इसके घर छोड़ दोगे?"

"मेरे पास पैसा नहीं है अंकल।" लड़की बोली।

"तुम राशन-दूकान वाले विनय जी की लड़की हो न?" ऑटो-वाले ने पूछा।

"हाँ"

"आओ बैठो। मैं तुम्हारे पापा की दूकान के पास ही रहता हूँ। तुम्हे वहीँ छोड़ दूंगा। और हाँ! चिंता मत करो। पैसे मैं उनसे ले लूँगा।"

जब लड़की ऑटो में बैठ कर चली गयी तो मधुकर बाबू ने गहरी सांस ली -

"ये आज कल के लड़के! तौबा-तौबा।"



मधुकर बाबू घर पहुंचे तो पत्नी ने शीतल जल हाथों में थमाते हुए पूछा, "बैंक में भीड़ अधिक थी क्या? आपको देर लगी?"

"अरे नहीं-नहीं!" मधुकर बाबू धर्मपत्नी को रास्ते में घटी घटना के बारे में बताने लगे।

"आप भी क्यों दूसरों के फटे में में टाँग अड़ाने चल देते हैं ? कोई गुंडा-बदमाश होता तो ? आप के साथ मार-पीट करता तो ?" धर्मपत्नी जी की चिंता अब मुखर हो गयी थी।

"ऐसे कैसे मार-पीट कर लेता? और एक बात बताओ - अगर उस लड़की की जगह अपनी पाखी होती तो ? क्या तब भी तुम ऐसा ही कहती?"

"फिर भी," वे बोलीं। "आज-कल के लड़के-लड़कियों में पहले वाली बात नहीं है। ये लोग किसी को कुछ नहीं समझते। वादा करो आगे से ऐसे चक्करों में नहीं पड़ोगे।"

"अच्छा बाबा।" मधुकर बाबू ने हथियार डाल देने में ही अपनी भलाई समझी।



वक़्त की परतों ने इस घटना को मधुकर बाबू के स्मृति कुंड की किस गहराई में छुपा दिया, इसका पता उन्हें भी नहीं चला। आज वसंत-पंचमी है, देवी सरस्वती का पूजनोत्सव ! माँ-बेटी ने मिलकर पूजा की तैयारी कर रखी है। ऐसे में मधुकर बाबू ने सोचा कि क्यों न बाज़ार जा कर आधा किलो बुँदिया ले आया जाये। दरअसल उन्हें आज अपने स्कूल के उन दिनों की याद आ रही थी जब वहाँ सरस्वती पूजा होती और बच्चों को मिश्री-कंद, गाजर, बेर, अंकुरित मूंग और बुँदिया का प्रसाद मिलता था।

"पाखी। पाखी बेटा। जरा दरवाज़ा लगा लेना। मैं थोड़ी देर में बाज़ार से आता हूँ। "

"जी पापा"

अपनी स्कूटर लिए मधुकर बाबू अभी चिल्ड्रेन पार्क तक पहुंचे ही थे कि एक मोटरसाइकिल पर एक लड़का तेजी से आगे निकला। उसके पीछे बैठी लड़की ने से उसे कस कर पकड़ रखा था। अभी वे कुछ समझ पाते कि लड़के ने अपनी गाडी घुमाई और मधुकर बाबू के बगल में आकर धीमा हो गया। मधुकर बाबू ने उन्हें देखा तो गर्मी की दोपहर घटना ताज़ा हो आयी। वही लड़का और लड़की पर शायद… । दोनों उनके बगल से गुजरे और लड़के ने व्यंग कहा-

"हेल्लो अंकल!" और दोनों हसने लगे।

  

Monday, June 10, 2013

दिल जंपिंग जपाक जम्पक जम्पक

जिस देश में क्रिकेट धर्म हो और जहाँ की जनता "ॐ क्रिकेटाय: नमः" से अपना दिन शुरू करती हो, मैं उस देश में परदेशी की तरह हूँ। यूँ तो मुझे क्रिकेट का कोई ख़ास क्रेज नहीं है लेकिन हाल के दिनों में जो कुछ हुआ, उसने मुझे क्रेजी ज़रूर कर दिया है। मैंने सोचा कि क्यों न एक बार भईया से मिल कर अपनी बात कहूँ। सो मैं उनके घर पहुँच गया।
"भईया प्रणाम"
"अरे! तुम! आओ-आओ" भईया बोले।
मैंने बैठते ही सवाल दागा, "भईया, ये क्रिकेट में क्या हो रहा है?"
"अरे कुछ नहीं। खेल है, खेल हो रहा है।"

Tuesday, May 21, 2013

राजा कौन?

इस वर्ष ठंड का ये दूसरा दौर शुरू हो चुका है। कुहासे के आगे सूर्य-देव भी लाचार नज़र आते हैं। एक गुनी-जन ने बताया कि ये ठण्ड ग्लोबल वार्मिंग का नतीजा है! उनकी बातें सुन कर मुझे भईया की याद आई। इनकी बात की तरह भईया की बातों को समझना भी मेरे लिए कठिन होता है। भईया की याद आई तो ये भी याद आया कि उनसे मिले तो अरसा हो गया है। सो मैं उनके घर पहुँच गया।
"भईया, भईया।" मैंने जोर से आवाज़ लगायी।
"कौन है?" अन्दर से भैया की आवाज़ आई। साथ ही दरवाज़ा खुला - "अरे तुम! आओ, आओ।"
"भईया  प्रणाम। आप तो आज-कल मुझे याद भी नहीं करते। कितने दिन हो गए, आप आये भी नहीं।" मैंने शिकायत की।
"ठण्ड ज्यादा थी न, इसलिए अति-आवश्यकता होने पर ही निकलता था। और सुनाओ"
"दिल्ली में इतना बड़ा काण्ड हो गया और आप मौन हैं?" मैंने उन्हें छेड़ा।