Tuesday, January 13, 2015

गोवा की सैर: उत्तरी गोवा


सुनहरी रेत पर फ़िसलती चाँदनी, रंग-बिरंगे झाड़-फानूसों की अठखेलियाँ, नाना प्रकार के व्यंजन और मौज-मस्ती में लीन ज़िन्दगी से बेपरवाह युवा, ज़ेहन में सिर्फ एक ही छवि बनाते हैं – गोवा! क्षेत्रफल के हिसाब से देश का ये सबसे छोटा राज्य देसी-विदेशी सैलानियों की सूची में ऊपर रहता है।

कुछ दिनों पूर्व यूँ ही बनते-बनते बात बन गई और मैं सपरिवार निकल पड़ा गोवा की सैर को। मेरे जो मित्र वहाँ से हो आए थे, उनकी सलाह पर अमल करते हुए मैं मुंबई के रास्ते गोवा की ओर निकल पड़ा। मुंबई से सुबह-सुबह गोवा के लिए एक रेल चलती है – मांडवी एक्सप्रेस। दोस्तों ने बताया था कि इस गाड़ी की ख़ासियत इसकी पैंट्री है। एक बार रेलगाड़ी मुंबई की सरहदों से बाहर हुई तो नजारों ने यूँ बाँध लिया कि बस। हरे-भरे पहाड़, बलखाती नदियाँ, नारियल के कतारबद्ध पेड़, सुंदर गाँव और साथ चलते सड़क पर सरपट दौड़ते वाहन, बाहर नज़ारे तो मानो थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे और अन्दर पैंट्रीवाले खाने के विविध व्यंजनों की रफ़्तार थमने नहीं दे रहे थे। इडली, मेदुवडा, वड़ापाव, उपमा-शीरा और भी न जाने क्या-क्या खा-खा कर हमारी हालत ऐसी थी कि दोपहर के भोजन के लिए पेट में जगह नहीं बची। अनेक स्टेशनों, पुलों और सुरंगों से होती हुई हमारी रेल तकरीबन तीन घंटे विलंब से थिविम स्टेशन पर पहुंची।








हमारे मेज़बान (मैं उन्हें मेज़बान ही कहना पसंद करूंगा) ने हमें पहले ही बता दिया था कि स्टेशन से बाहर निकलते ही प्री-पेड काउंटर से हमें टैक्सी लेना है। आधे घंटे में हम उनके निवास पर थे। हमारा कमरा और गरमा-गर्म खाना, दोनों ही तैयार थे। वहीँ हमारी मुलाकात राजू से हुई। अगले तीन दिनों तक वही हमारा व्यवस्थापक, बावर्ची और टूर-प्लानर था। उसने हमसे पुछा – आप गोवा क्यूँ आये हैं? सवाल अटपटा था। हम चकराए। फिर उसने बताया कि गोवा आने वाले लोग अलग-अलग भावनाएँ और योजनाएँ लेकर यहाँ आते हैं। हर किसी को उसके पसंद के गोवा से मिलवाना ही उसका काम है। “आप खुश तो मैं भी खुश!” उसने हँसते हुए कहा था।

अगले दिन सुबह-सुबह उसने चाय के साथ हमें अनिलजी से मिलवाया। वे अपनी गाड़ी लेकर पर्यटकों की सेवा में उपस्थित रहते हैं। हमने उन्ही से पुछा कि हमें क्या देखना चाहिए और किस प्रकार उसको व्यवस्थित करना है। उन्होंने कहा कि आज सुबह से शाम तक मैं आप सबको उत्तरी गोवा घुमा लाता हूँ। जब हमने उनसे पैसों की बात की तो बोले, पहले आप घूम लो, अच्छा लगे तो पेट्रोल के दाम दे देना।

फिर क्या था। हमने नाश्ता किया और चल पड़े उनके साथ। हालाँकि हमें थोड़ी देर हो गयी थी पर हम लोग साढ़े-ग्यारह बजे अगुआडा फोर्ट ( #FortAuguada ) में थे। मांडवी नदी के उत्तरी मुहाने पर बना यह किला शानदार है। दो तलों वाला यह किला १६१२ में पुर्तगाली पोतों के विश्राम-स्थल और पेयजल आपूर्ति केंद्र के रूप में बनवाया गया था। उपरी तल में करीब 24 लाख गैलन पानी जमा रखने की सुविधा है। यहाँ का लाइट-हाउस देखने लायक है। इस स्थल पर खड़े होकर नदी पार पंजिम की खूबसूरती देखते ही बनती है। किले के निचले तल का उपयोग जहाजों की गोदी के रूप में होता था।


यहाँ करीब एक घंटे बिताने के बाद हम निचले तल की ओर निकल पड़े। रास्ते में हमने नेरुल नदी और उसमें चल रही अनेक नौकाएँ देखीं। यहाँ मैं एक बात बता दूँ कि यहीं से डॉलफिन-दर्शन के लिए नौकाएँ उपलब्ध होती हैं। नेरुल नदी के किनारे से होते हुए ताज-विवांता के बगल से गुजर कर हम इस स्थल पर सिर्फ पंद्रह मिनट की ड्राइव में ही पहुँच गए। यहाँ खड़े होकर सिंक्वारिम बीच पर जल-क्रीड़ा का आनंद लेते सैलानियों को देखने का अपना ही एक अनुभव था। अनेक दलालों ने हमें भी सस्ते दर पर वाटर-स्कूटर और पारा-ग्लाइडिंग करने के लिए आमंत्रित किया किन्तु हमें इनमे दिलचस्पी तो थी नहीं, सो उन्हें मना कर दिया। यहाँ तकरीबन बीस-पच्चीस मिनट बिताने के बाद हम कांडोलिम बीच की ओर बढ़ चले।
अब दिन के कोई सवा-एक बज रहे थे। कांडोलिम-बीच पर भीड़ भी ज्यादा नहीं थी। यहाँ सफाई अच्छी थी किन्तु लहरें काफी ऊँची उठ रही थी। यहाँ हमें एक shack नज़र आया जिसका नाम था – सन्नी-साइड-अप। लाइव संगीत पर झूमते लोग और उन्हें खिलाने में व्यस्त वेटर, अन्दर का माहौल बिलकुल अलग ही था। अनिलजी ने हमें बताया कि नए साल में यहाँ ज़बरदस्त पार्टियाँ होती हैं। हाँ, एक बात तो मैं बताना भूल ही गया। shack का हिंदी रूपांतरण शायद मड़ैया या झोपड़ी हो, किन्तु गोवा में ये सबसे ज्यादा पाए जाने वाले और सर्वाधिक दर्शनीय स्थलों में से एक होते हैं। गोवा का पर्यटन व्यवसाय इनके बिना अधूरा है। ये पर्यटकों को खाने-पीने के साथ आराम और मनोरंजन भी मुहैया कराते हैं। यहाँ भी बीस-पच्चीस मिनट बिताने के बाद हम लोग कलांगुट बीच की ओर बढ़ चले।

रास्ते में मैंने ध्यान दिया कि ऐसी कई दुकानें हैं जिनके सूचना-पट्ट पर रूसी भाषा में लिखा हुआ था। अनिलजी ने हमें बताया कि रूसियों ने गोवा में काफ़ी अचल संपत्ति खरीद रखी है। एकीकृत रूस और यूरोपीय देशों के नौजवान पर्यटक अक्सर इनके यहाँ देखे जाते हैं। कलांगुट एक भीड़-भाड़ वाला इलाका है। यहाँ पर्यटकों के मनोरंजन के लिए काफी कुछ मौज़ूद है। बीच की ओर जाने वाले रास्ते में गोवा-दमन और दिउ के प्रथम मुख्य-मंत्री स्वर्गीय दयानंद बांदोडकर की प्रतिमा है। इस बीच पर आनेवाले ज्यादातर सैलानी भारतीय थे। लोगों का तो मानो रेला लगा हुआ था किन्तु फिर भी सभी अपने-आप में जैसे अकेले थे। एक दूसरे से बेपरवाह, अपनी ही मस्ती में डूबे हुए। यहाँ जल-क्रीड़ा हेतु अनेक साधन तो हैं ही, भोजन की भी कोई कमी नहीं। अगर आप पैसे खर्च करने को तैयार हों तो टैटू बनवा लीजिए, या कोई वस्त्र ले लीजिए और कुछ भी नहीं सूझ रहा हो तो शराब तो टैक्स-फ्री है ही। वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि यहाँ की पुलिस को शराब सूँघने में महारत है और पी कर आप तट पर नहीं जा सकते। यदि आप इसकी ज़बरदस्ती करें तो हो सकता है कि आप गिरफ्तार कर लिए जाएं। आखिर ये आपके खुद की सुरक्षा के लिए ज़रूरी जो है।

बहरहाल, अब पेट में चूहे कूदने लगे थे तो हमने तय किया कि घर वापस चलते हैं और राजू के हाथ का गर्मा-गर्म खाना खाते हैं। तीन बजते-बजते हम सब खाने की मेज पर व्यस्त हो चुके थे। सिर्फ एक घंटे में हम तरोताज़ा होकर वापस निकल चुके थे। सिर्फ बीस मिनट की ड्राइव के बाद हम सब चापोरा फोर्ट के पास थे। पूरी तरह से खंडहर में तब्दील हो चुका यह किला एक ऊँची पहाड़ी पर स्थित है। रोड से किले तक का रास्ता बहुत ही उबड़-खाबड़ है और मुरुम सी मिट्टी होने के कारण पाँव जमाना मुश्किल होता है। सावधानी से चढ़ते हुए जब हम ऊपर पहुंचे तो हमारी सांसें थमी-की-थमी रह गयी। नज़र जिधर घूमती थी, नज़ारे मन मोह लेते थे। पूर्व दिशा में चापोरा नदी का मुहाना और चापोरा बीच है जबकि दक्षिण में वागाटर-बीच है। अरब सागर का मनमोहक नज़ारा मजबूर कर देता है कि हम कहें – “दिल चाहता है...”। यहाँ हमने चालीस मिनट बिताये। वहां मौज़ूद अधिकांश लोग अब जाने लगे थे तो हम भी साथ हो लिए।



चापोरा किले ( #FortChapora ) से निकल कर सिर्फ दस मिनट में हम लोग वागाटर-बीच पर थे। इस बीच से चापोरा फोर्ट को देखने का एहसास ही अलग था। यहाँ से हम अंजुना बीच गए। जब पर्यटन का मौसम अपने चरम पर होता है, अंजुना बीच का फ़्ली-मार्केट पर्यटकों के बीच खासा लोकप्रिय होता है। वैसे ये बताते चलें कि आपने अपने शहर के साप्ताहिक हाट के बारे में तो ज़रूर ही सुना होगा। हमारे शहर में ये मंगलवार को लगता है और इसलिए मंगला-हाट कहलाता है। ये फ़्ली-मार्केट भी कुछ ऐसी ही चीज़ है। यहाँ से हम बागा-बीच पहुंचे। सूरज लहरों के पीछे छिप जाने को बेकरार हो रहा था, और हम उन लम्हों को अपनी यादों में समेट लेने के लिए बेताब थे। जब हम बीच की ओर बढे तो देखा कि चारों ओर काफी चहल-पहल है किन्तु एक स्थान-विशेष पर लोगों का हुजूम जैसे उमड़ा जाता था। नज़दीक जाकर देखा तो आश्चर्यचकित रह गए। वहाँ हिंदी फिल्मों के अभिनेता चंद्रचूड़ सिंह की शूटिंग चल रही थी। हम भी दर्शकों की भीड़ में शामिल हो गए। पाँच मिनट में ही शूटिंग ख़त्म और पैक-अप! फिर अभिनेता और अभिनेत्री के साथ तस्वीर खिंचवाने का दौर शुरू हुआ। हमने भी बहती गंगा में हाथ धो लिए और फिर अस्ताचलगामी सूर्य को विदाई देने चल दिए।





सूरज धीरे-धीरे लहरों के पीछे छिप गया और सिर्फ उसके लाल साफ़े के निशान रह गए। निशा ने शनैः- शनैः अपने आँचल लहराए और सारे जहाँ को अपने आगोश में लेने को मचल उठी थी। दिनभर की भाग-दौड़ से हम भी थक चुके थे, तो घोंसले की ओर लौटती चिड़ियों के झुण्ड के साथ हम भी अपने आशियाने की तरफ निकल गए। आज का दिन बहुत थकाने वाला था किन्तु हमने बहुत कुछ देखा और जाना। अनिलजी ने कहा कि सुबह साढ़े-सात बजे तैयार रहें, कल हम लोग दूधसागर जलप्रपात देखने चलेंगे। तो कल मिलते हैं।

Thursday, June 19, 2014

SUGGESTION

Every little seed, inside has a tree,

The power of it, we can't simply see.

The thoughts and ideas, dwelling in our mind,

Will blossom generously, only if we find –

An idea to nurture, and give it some time,

Do it, test it, tell it, you'll surely get a dime.

 

Call them intelligent; creative, nasty, foolish,

They're road to dreams, you always cherish,

A bowl fills with water, drop by drop,

Come one, come all, push hard, we move to the top,

Improvement is humane, and as they say,

Just keep on tryin', there's always a better way!

Friday, February 28, 2014

हैलो अंकल

मई की भीषण गर्मी ने मानो कर्फ्यू की घोषणा कर रखी थी।  आदमी तो आदमी, पशु-पक्षी भी दोपहर में बाहर निकलने से कतरा रहे थे। "स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया" की शाखा से बाहर आते हुए मधुकर बाबू एक पल को ठिठके। ज़ेब से रुमाल निकाल कर चेहरे को पोंछा और चारों ओर देखा। प्रत्यक्ष जीवन के सारे निशान उनके पीछे यानि कि बैंक के अंदर थे, बाहर नहीं। वे वापस आये, रुमाल को ठन्डे पानी से भिगोया और चेहरे पर बाँध लिया। ऊपर से हेलमेट लगाया और अपनी स्कूटर के पास आ कर खड़े हो गए। पल भर में ही वे रोड पर थे।
चिल्ड्रेन पार्क के बगल से दाहिना मोड़ लेते ही उन्हें एक ठेले पर "आम-पन्ना" दिखाई दिया। एक तो पेड़ों की छाँव, उस पर सूखते कंठ को तर कर लेने का साधन!  जानलेवा गर्मी में रुक कर दो मिनट सुस्ता लेने का इससे अच्छा बहाना और क्या हो सकता था भला?
"ओ भाई, ज़रा एक गिलास मेरे लिए भी बनाना। "
"अभी बनाता हूँ। "
मधुकर बाबू अब अपना हेलमेट उतार कर आस-पास का जायजा लेने में लग गए थे। तेज़ धूप मानो सड़क के अलकतरे को पिघला देना चाह रही थी। कुछ कुत्ते सड़क के किनारे खड़े ट्रक के नीचे सोये थे। ठेले के पास एक गाय खड़ी थी जिसके सामने "अशोक" की पत्तियां पड़ी थी। शायद ठेलेवाले ने ही उसे तोड़ कर दी होंगी। तभी उनके सामने से मोटर-साइकिल लेकर एक युवक निकला।
मधुकर बाबू सोचने लगे - ज़रूर इसे कोई अति-आवश्यक काम आ पड़ा होगा वर्ना इस गर्मी में कौन घर से निकलता है?
तभी युवक वापस लौटा और जिधर से आया था, उधर चला गया।
"अवश्य ही इसने कुछ छोड़ दिया है और अब उसे लेने जा रहा है", मधुकर बाबू ने अपने आप से कहा।
"कुछ बोले का सर?"
"नहीं-नहीं। मैंने तुमसे कुछ नहीं कहा।
मैं तो ये सोच रहा था कि आखिर ऐसा क्या काम आ पड़ा कि
इस लड़के को इतनी गर्मी में घर से निकलना पड़ा ?"
"अरे सर, आप भी तो घर से बाहर हैं।" ठेलेवाले ने मधुकर बाबू के हाथ में ग्लास थमाते हुए कहा।
उसकी रहस्यमय मुस्कान ने एक पल के लिए विचलित किया पर हाथों में ठंढक के एहसास ने उन्हें दूसरी ही दुनिया में पहुंचा दिया। 
ग्लास खाली होने तक युवक तीन-चार चक्कर लगा चुका था पर अब मधुकर बाबू की दुनिया में उसका कोई वज़ूद नहीं था।
आम-पन्ना ने जैसे उनके भीतर फिर से जीवन का संचार कर दिया था।
मधुकर बाबू ने फिर से रुमाल बांधा और चल दिए। गर्मी की धाह से आकृतियाँ हिलती-डुलती सी प्रतीत हो रही थी। उन्होंने देखा कि कोई लड़की अपनी कॉपी को सर पर रख कर गर्मी से लड़ने की असफल चेष्टा करते चली जा रही है। तभी बड़ी तेज़ी से वही युवक उनके बगल से निकला और लड़की के पास पहुँच कर गाड़ी रोक दी। मधुकर बाबू ने देखा कि लड़की छिटक कर एक किनारे हो गयी है। उसकी रफ़्तार भी बढ़ गयी है। जिस तरह खरगोश बाज़ के हमले से बचने के लिए भागता है, लड़की भी अब कुछ वैसा ही कर रही थी। मधुकर बाबू को ये अच्छा नहीं लगा। उन्होंने स्कूटर की रफ़्तार बढ़ाई और तुरंत वहाँ तक पहुँच गए।


"ऐ लड़के", उन्होंने कड़क आवाज़ में कहा। लड़की अब रुक गयी और थोडा खिसक कर मधुकर बाबू के स्कूटर की तरफ हो ली। डूबते को तिनके का सहारा जो मिल रहा था! वे फिर से गरजे -

"क्या हो रहा है? लड़की को क्यों तंग कर रहे हो?"

उनकी हरकत ने एक बेकार बैठे ऑटो वाले का ध्यान आकर्षित किया और वो भी अपनी गाड़ी लेकर चला आया।

"क्या हुआ भैया? कोई दिक्कत है क्या?"

"नहीं भाई। मुझे क्या दिक्कत होगी? दिक्कत तो इसे है।" मधुकर बाबू ने लड़के की तरफ इशारा करते हुए कहा।

"क्यों रे! मार खाने का मन है क्या? पता है न, पब्लिक जब मारती है त पुलिसो से भयंकर मारती है।" ऑटो-वाला बोला।

तू-तू मैं-मैं होता देख लोग अब रुकने लगे थे। शायद लड़के को लगा कि स्थिति जल्द ही बेकाबू हो जायेगी। उसने गाडी को गियर में डाला और चलता बना।

मधुकर बाबू ने लड़की को देखा। गर्मी से लाल चेहरा और आँखों में पानी। उन्हें बड़ी दया आयी। ऑटो-वाले से बोले,

"भैया। जरा इसे इसके घर छोड़ दोगे?"

"मेरे पास पैसा नहीं है अंकल।" लड़की बोली।

"तुम राशन-दूकान वाले विनय जी की लड़की हो न?" ऑटो-वाले ने पूछा।

"हाँ"

"आओ बैठो। मैं तुम्हारे पापा की दूकान के पास ही रहता हूँ। तुम्हे वहीँ छोड़ दूंगा। और हाँ! चिंता मत करो। पैसे मैं उनसे ले लूँगा।"

जब लड़की ऑटो में बैठ कर चली गयी तो मधुकर बाबू ने गहरी सांस ली -

"ये आज कल के लड़के! तौबा-तौबा।"



मधुकर बाबू घर पहुंचे तो पत्नी ने शीतल जल हाथों में थमाते हुए पूछा, "बैंक में भीड़ अधिक थी क्या? आपको देर लगी?"

"अरे नहीं-नहीं!" मधुकर बाबू धर्मपत्नी को रास्ते में घटी घटना के बारे में बताने लगे।

"आप भी क्यों दूसरों के फटे में में टाँग अड़ाने चल देते हैं ? कोई गुंडा-बदमाश होता तो ? आप के साथ मार-पीट करता तो ?" धर्मपत्नी जी की चिंता अब मुखर हो गयी थी।

"ऐसे कैसे मार-पीट कर लेता? और एक बात बताओ - अगर उस लड़की की जगह अपनी पाखी होती तो ? क्या तब भी तुम ऐसा ही कहती?"

"फिर भी," वे बोलीं। "आज-कल के लड़के-लड़कियों में पहले वाली बात नहीं है। ये लोग किसी को कुछ नहीं समझते। वादा करो आगे से ऐसे चक्करों में नहीं पड़ोगे।"

"अच्छा बाबा।" मधुकर बाबू ने हथियार डाल देने में ही अपनी भलाई समझी।



वक़्त की परतों ने इस घटना को मधुकर बाबू के स्मृति कुंड की किस गहराई में छुपा दिया, इसका पता उन्हें भी नहीं चला। आज वसंत-पंचमी है, देवी सरस्वती का पूजनोत्सव ! माँ-बेटी ने मिलकर पूजा की तैयारी कर रखी है। ऐसे में मधुकर बाबू ने सोचा कि क्यों न बाज़ार जा कर आधा किलो बुँदिया ले आया जाये। दरअसल उन्हें आज अपने स्कूल के उन दिनों की याद आ रही थी जब वहाँ सरस्वती पूजा होती और बच्चों को मिश्री-कंद, गाजर, बेर, अंकुरित मूंग और बुँदिया का प्रसाद मिलता था।

"पाखी। पाखी बेटा। जरा दरवाज़ा लगा लेना। मैं थोड़ी देर में बाज़ार से आता हूँ। "

"जी पापा"

अपनी स्कूटर लिए मधुकर बाबू अभी चिल्ड्रेन पार्क तक पहुंचे ही थे कि एक मोटरसाइकिल पर एक लड़का तेजी से आगे निकला। उसके पीछे बैठी लड़की ने से उसे कस कर पकड़ रखा था। अभी वे कुछ समझ पाते कि लड़के ने अपनी गाडी घुमाई और मधुकर बाबू के बगल में आकर धीमा हो गया। मधुकर बाबू ने उन्हें देखा तो गर्मी की दोपहर घटना ताज़ा हो आयी। वही लड़का और लड़की पर शायद… । दोनों उनके बगल से गुजरे और लड़के ने व्यंग कहा-

"हेल्लो अंकल!" और दोनों हसने लगे।

  

Monday, June 10, 2013

दिल जंपिंग जपाक जम्पक जम्पक

जिस देश में क्रिकेट धर्म हो और जहाँ की जनता "ॐ क्रिकेटाय: नमः" से अपना दिन शुरू करती हो, मैं उस देश में परदेशी की तरह हूँ। यूँ तो मुझे क्रिकेट का कोई ख़ास क्रेज नहीं है लेकिन हाल के दिनों में जो कुछ हुआ, उसने मुझे क्रेजी ज़रूर कर दिया है। मैंने सोचा कि क्यों न एक बार भईया से मिल कर अपनी बात कहूँ। सो मैं उनके घर पहुँच गया।
"भईया प्रणाम"
"अरे! तुम! आओ-आओ" भईया बोले।
मैंने बैठते ही सवाल दागा, "भईया, ये क्रिकेट में क्या हो रहा है?"
"अरे कुछ नहीं। खेल है, खेल हो रहा है।"

Tuesday, May 21, 2013

राजा कौन?

इस वर्ष ठंड का ये दूसरा दौर शुरू हो चुका है। कुहासे के आगे सूर्य-देव भी लाचार नज़र आते हैं। एक गुनी-जन ने बताया कि ये ठण्ड ग्लोबल वार्मिंग का नतीजा है! उनकी बातें सुन कर मुझे भईया की याद आई। इनकी बात की तरह भईया की बातों को समझना भी मेरे लिए कठिन होता है। भईया की याद आई तो ये भी याद आया कि उनसे मिले तो अरसा हो गया है। सो मैं उनके घर पहुँच गया।
"भईया, भईया।" मैंने जोर से आवाज़ लगायी।
"कौन है?" अन्दर से भैया की आवाज़ आई। साथ ही दरवाज़ा खुला - "अरे तुम! आओ, आओ।"
"भईया  प्रणाम। आप तो आज-कल मुझे याद भी नहीं करते। कितने दिन हो गए, आप आये भी नहीं।" मैंने शिकायत की।
"ठण्ड ज्यादा थी न, इसलिए अति-आवश्यकता होने पर ही निकलता था। और सुनाओ"
"दिल्ली में इतना बड़ा काण्ड हो गया और आप मौन हैं?" मैंने उन्हें छेड़ा। 

Friday, April 19, 2013

My Jamshedpur 1

Water color has fascinated me ever since I was a kid. A few years ago, I had decided to paint a few interesting locations in and around Jamshedpur. Some of them are well-known landmarks of this town while others just go unnoticed. However, I hope you all will enjoy this along with me.

The first in the series is the water tank on a hillock which can be seen while going to NIT. After a month, we'll miss its regular viewing!

The first image can be downloaded by anyone who wants to paint it.
NIT water tank blank

Saturday, March 2, 2013

बचपन

Pinki by Ishika
जब हम बच्चे थे तब कॉमिक्स की दीवानगी हमारे सर चढ़ कर बोलती थॆ. ये दीवानगी आज के बच्चों में भी कुछ कम नहीं है. प्राण साहब की सदाबहार "पिंकी" पढने के बाद मेरी छुटकी "ईशिका" की प्रतिक्रिया कुछ यूँ थी ....

Wednesday, September 5, 2012

गुरुजनों को नमन

माचिस की तीली
आग समेटे
शहर - ग्राम
ढूंढता मुकाम
छोटे-छोटे
बेकार पड़े टुकड़े
लकड़ी के
गीले, टेढ़े-मेढ़े
बाँट दिया उनमे
आग अपना
अब सारे
खुद हैं रौशन
जग को दे रहे
उसकी रौशनी
उन तमाम गुरुजनों को, जिन्होंने मुझे वो बनाया, जो मैं आज हूँ, मैं नमन करता हूँ.
शिक्षक दिवस की शुभकामनाएं

Thursday, June 14, 2012

मैं कार्टून...

 यूँ तो मैं बहुत व्यस्त हो गया था लेकिन थोड़ी सी फुर्सत मिली कि मटकू भईया की याद आई. फिर क्या था, सुबह-सवेरे उनके घर पहुँच गया. 
"भईया प्रणाम"
"अरे कईसे हो? बहुत दिनों बाद हमारी याद आई?"
"क्या भईया, आप भी तो हमें भूल गए?" मैंने शिकायत की.
"अभी परसों ही तो तुम्हारे घर गया था. बच्चों ने बताया कि तुम आज-कल ज्यादा ही व्यस्त रहने लगे हो."
मैं थोडा लज्जित हुआ पर सँभलते हुए बोला, "अच्छा भईया, जरा ये बताइए कि जिसका लक्ष्य हमें गुदगुदाना हो, वह सर-फुटव्वल का कारण बन जाये तो आप क्या कहेंगे?"
"मैं कहूँगा, मैं हूँ कार्टून!" भईया मेरा इशारा पूरी तरह से समझ गए थे.