Wednesday, March 4, 2026

होली की हार्दिक शुभकामना

होली 

है मनभावन,

रंगों का सावन,

रंग गुलाल, पुए पकवान,

हर तरह के भेद मिटाकर,

गली गली मे फगुआ गा कर,

आई बसंत बहार, मनाएँ होली का त्योहार।

Thursday, January 8, 2026

जनवरी की सुबह

 सर्द झील की सतह पर,

कोहरे के सैनिक चलते हैं।

शबनम के मोती ज्यों सारे,

ठिठुरे पेड़ों से झड़ते हैं।

सूरज की धूप को मानो,

आकाश-जाल ने उलझाया।

सर्द हवा के कंपन ने

अच्छे अच्छों को ठिठुराया।


हर रोज भौंकनेवाला वो

कुत्ता भी छुपकर दुबका है।

राख मे छुपी गर्मी पर

हक, आज तो उसका है।

चाय की टपरी पर अब तो

सानिध्य आग का प्यारा है।

मुँह खोलो तो ज्यूँ शब्द जमे

बस चाय का ही सहारा है।


Wednesday, December 10, 2025

रूकावट के लिए खेद है।

 रुकी उड़ानें कह रही हैं - जाग रे मानव, जाग!

अव्यवस्था की जंजीरों में, आज लगा दे आग।


फाइलों में है सोई नीतियाँ, और शिथिल है शासन,

चीर हरण कर इठलाता है, आज कोई दुःशासन


जनता की पीड़ा पर, इस मौन का क्या समाधान?

धधक उठा है जन का मन, जो ठेस लगी सम्मान।


जब सत्ता ने जन-पीड़ा को तुच्छ समझकर टाल दिया,

तब जनता ने सत्ताओं को, इतिहास मे डाल दिया।


ओ प्रबंधकों! उत्तर दो, किसका धर्म है छूटा?

क्यों यात्रा का थमा प्रवाह, विश्वास किसने है लूटा?


रनवे पर जो अटका है, वह यान नहीं इक राष्ट्र है,

अटकी है वह आशा, जिसके संरक्षक आप है!


जो कर्तव्य से विमुख हुए, वे अधोपतन को जाएँगे

कालचक्र का खेल अजब है, कहकर फिर पछताएँगे। 

Wednesday, November 19, 2025

कविताएँ अब पढ़ी नही जाती

कविताएँ अब पढ़ी नही जाती

कोई नही पढ़ता उन्हे

कविता पढ़ने को चाहिए 

रगों में लहू, लहू मे उबाल।

आँखो मे करूणा, हृदय मे प्यार 

मन मे शांति, विवेक मे धार।

और चाहिए, सीधी एक रीढ़।

इसलिए 

कविताएँ अब पढ़ी नही जाती

कोई नही पढ़ता उन्हे।

Tuesday, October 28, 2025

असर

तुझको याद किया, मुस्कुराता रहा

बेवजह, बेसबब, गुनगुनाता रहा।


तेरे गेसू की खुशबू, हवाओ मे थी

अपने ख्वाबों मे मै, गुल खिलाता रहा।


बादलों मे जो देखा, तो तुम ही मिली

मै ख्यालों मे तुमको, सजाता रहा।


जी करता है छू लूँ, मै नजरो से ही

तुमको देखा तो नजरे चुराता रहा।

Monday, January 13, 2025

मकर संक्रांति

 सूर्य की चाल पर नजर रखने वालों को दक्षिणपंथी से उत्तरायण सूर्य इस कदर भाता है कि उत्सव का सा माहौल हो जाता है। ठंड से ठिठुर रहे लोगों को सूर्य की आहट मिलती है। गर्माहट की उम्मीद भर से ही, राहत मिलती है।

कोई संक्रांति मनाता है, कोई पोंगल। कोई लोहड़ी मनाता है तो कोई टुसू। अलग जगह, अलग नाम, पर मूल बात वही - सूर्य ने मकर राशि मे प्रवेश कर लिया।

सारा भारतवर्ष एक साथ गा उठता है - दुःख भरे दिन बीते रे भैया, अब सुख आयो रे।

कोई खिचड़ी बनाता है तो कोई दही-चूड़ा का भोग लगाता है। कोई पतंग उड़ाता है तो कोई बीहू गाता है। तिल और गुड़ तो हर कोई खाता है।

भारत के इस अखिल भारतीय पर्व पर कुछ पंक्तियाँ याद आती हैं - 

गुड़ का धेला, दही के मटके

हर थाली मे, कतरनी महके

सजधज कर ही, भोर बिहाने 

चली बहुरिया गंगा नहाने


बच्चों के हाथों मे लाई

देकर गई है जमुना ताई

मांझा लगाते, पतंग उड़ाते 

तिलकुट, गुड़, बताशे खाते


सूर्य देवता मकर को जाते

आज से अपनी तपिश बढ़ाते 

हम सब मिल उत्सव मनाए

उत्तरायण का जश्न मनाए

Wednesday, January 1, 2025

Happy New Year 2025

 साल के आखिरी दिन मैं मुस्कराया 

मन ही मन सोचा तो याद आया

जीने के लिए एक साल मिला था

क्या मैं इसे ढ़ंग से जी पाया?


खुशियाँ मिली तो गम भी मिले

ठोकर लगी पर उठ कर चले

रूक कर चले, चल कर रूके

मुस्कराए, कि एक और साल आया।

Tuesday, November 12, 2024

क्रांति क्या है?

 जब धाराएँ विपरीत हों

उछलती कूदती तेज गति

किनारे तोड़ देने को आतुर 

धारा के विपरीत तैरना ही नही

डट कर जगह पर स्थिर रहना 

भी, किसी क्रांति से कम नही।



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Monday, March 25, 2024

होली की हार्दिक शुभकामनाएँ

 

बसंत बहार, लाई रस की फुहार 

उड़े गुलाल, रंगों की चली धार।

स्वाद भरे, पकवानो की भरमार

मिलजुल कर, होली का हो त्योहार। 


होली की हार्दिक शुभकामनाएँ।

Monday, January 1, 2024

Happy New Year 2024

उम्मीदों की थामे डोर, एक कदम सपनो की ओर

बीते वर्ष को पीछे छोड़, नए वर्ष में स्वागत है।




Sunday, June 11, 2023

कशमकश

बाहर है सन्नाटा गहरा, मन के अंदर शोर है,

ये विचार है, या है बुद्धि, या फिर कोई और है।


Tuesday, May 9, 2023

माफ कर दिया

माफ कर दिया है, मगर भूला नही हूँ


वो पत्थर जो फेंके थे मुझ पर कभी

मुझे काँच का, जो तुमने समझ कर

वो काँच की किरचें, संभाल रखी हैं

वो पत्थर भी सारे, वहीं पर पड़े हैं।


पाँव छिले थे, कुछ खून बहा था

वो सारे निशाँ भी, वहीं पर अड़े हैं।

मैं बढ तो गया हूँ, बस अपनी खातिर

पर तुम्हारे इरादे, वहीं पर खड़े हैं।


न समझो कि डरता हूँ तुमसे मगर

जीवन में जीवन से बढ़ के है क्या?

तो अब मैने ठाना है, चोट न खाऊँगा 

"कौन हो तुम?" बस यूँ निकल जाऊँगा 


तो अब तुम मुझे, चोटिल करोगे कैसे?

माफ तो कर दिया है, मगर भूलूँगा कैसे?

Thursday, December 15, 2022

चाय की चुस्की

 सर्दी की सुबह होती

कनकनाती, थरथराती।

एक प्याली चाय की

दोनों हाथों थाम ली।

भाप देखो चाय की

और चुस्की चाय की।

Monday, August 15, 2022

आजादी का अमृत महोत्सव

 अमृत का जब जश्न मनाओ

छक कर जब तुम अमृत पाओ

भूल न जाना इस मंथन में

संग संग गरल भी निकला था


अमृत का जब प्याला भरना

खुशी के जय जयकारे करना

कोटि कोटि उन नीलकंठ के

कोटि कोटि आभार करना


Tuesday, April 12, 2022

लेखन

 इक आग है सीने मे, जो कागज को जलाती है

बिन लिखे नही बुझती, लिखे से फैल जाती है।

Friday, March 11, 2022

समय

 सोच सोच उलझन मे है मन, मिलता नही है कोई हल

इक इक पल एक वर्ष लगे है, वर्ष गुजरता जैसे पल।


Wednesday, March 2, 2022

सम्मान

 

 “आंटी, ज़रा दरवाज़ा बंद कर लीजिए| मैं अस्पताल जा रही हूँ|” संभावना ने मकान-मालकिन से कहा|

“इतनी रात में कहाँ जा रही हो?”

“अरे आंटी, ये नई बीमारी न जाने क्या-क्या करवाएगी| आप दरवाज़ा बंद कर लो|” संभावना आगे बढ़ गई|

“क्या हुआ?” ये मकान मालिक थे| पत्नी की आवाज़ सुन कर कमरे से बाहर आ गए थे|

“अजी होना क्या है? हमने एक डॉक्टर को किरायेदार बना कर गलती कर दी है| जब मर्जी आती है, जब मर्जी जाती है| पूछो तो अस्पताल का बहाना बना देती है|

“तो आप क्या चाहती हैं? निकाल दें उसे?”

मकान-मालकिन ने कुछ कहा नहीं, सिर्फ टेढ़ी नज़रों से पति को देखा| संभावना ने दोनों को देखा और पलट कर चली गई|

“देखा आपने! किस तरह ये लड़की हमें घूर रही थी|

“हम्म...” पतिदेव ने चुप रह जाना ही श्रेयस्कर समझा|

 

 

“संभावना – ओ संभावना|” साथी डॉक्टर ने कुर्सी पर सो रही संभावना को जगाया|

“ढाई बज गए हैं| जल्दी चल| कैंटीन में खाना ख़त्म हो जाएगा|

“नहीं यार, तू जा| मैं रूम पे जाती हूँ| आखिर पेइंग गेस्ट के लिए लंच तो बना ही होगा...” दोनों हँस दिए| कोरोना जैसी भयानक बीमारी की काली छाया के बीच यही मुस्कुराहटें तो जीवन बचाने का काम कर रही थी|

“यार कभी कभी लगता है कि डॉक्टर बन कर गलती कर दी|

“तुझे ऐसा क्यूँ लगता है?”

“देख, हमारी पढाई ख़त्म नहीं हुई कि ये भयानक बीमारी आ गई| न दवाई, न इलाज़, उस पर तुर्रा ये कि छू लो तो फैल जाए|

“सही कहा, अब तो बीमारी बाहर है और इंसान कैद में|

“अब तो मुन्ना भाई की “जादू की झप्पी” भी उल्टा काम करेगी|

दोनों फिर से हँस दिए|

 

शाम के कोई सात बजे होंगे| ऊँघती अनमनी सी संभावना चाय की प्याली लिए बरामदे में बैठी थी| तभी मकान-मालिक ने पुकारा –

“संभवना, बेटा जरा इधर तो आना|

“जी अंकल”

“देखो बेटा ऐसा है कि...”

“ऐसा-वैसा कुछ नहीं| सीधी बात बोलते जुबान क्यों लड़खड़ाती है?” ये मकान-मालकिन थीं| “देखो संभावना, हम तुम्हें बतौर पेइंग गेस्ट, और नहीं रख सकते| तो आज ही हमारा कमरा खाली कर दो|

“आज ही? ऐसे कैसे आज ही खाली कर दो कमरा? पूरे महीने का किराया आपने एडवांस ले रखा है| अग्रीमेंट में ये भी लिखा है कि एक महीने का नोटिस दिए बिना आप कमरा खाली नहीं करवा सकते| वैसे आपको समस्या क्या है?” उनींदी सी संभावना के अन्दर का तनाव फट पड़ा|

“नहीं चाहिए हमें जुबान लड़ाने वाली किरायेदार| वो भी डॉक्टर| पता नहीं कब घर में बीमारी ले आए! हम दोनों बूढ़े, क्या पता बीमारी से हमारा क्या हाल होगा? रही बात नोटिस की...”

“हाँ जी|” संभावना ने बात को बीच में ही काटते हुए कहा, “बिना एक महीने के नोटिस के, मैं कहीं भी नहीं जा रही| मज़ाक समझ रखा है| पैसे चाहिए, पेइंग गेस्ट रख लो| जब मन करे उसे निकाल बाहर करो| उस पर अपनी ऊम्र का धौंस दिखाओ|

मकान-मालकिन ने दराज़ से छह हज़ार रूपए निकाले और संभावना के हाथ में रख दिए|

ये लो अपने पैसे! तुम 22 फ़रवरी को आई थी| आज एक महीना हो गया| तुम्हारा एडवांस वापस कर दिया है, नोटिस पूरा हुआ| कल सुबह तक घर खाली कर दो|

“कल... आप पागल हो गई हैं? आज कर्फ्यू है| इतनी शाम मैं कमरा खोजने कहाँ जाऊं?” संभावना समझ गई थी कि अब इन्हें समझा पाना मुश्किल है|

“कहीं भी जाओ, हमें क्या? बस, हमारा कमरा खाली कर दो डॉक्टरनी जी|” मकान-मालकिन ने व्यंग से कहा|

संभावना का सर चकरा गया| उसे कुछ नहीं सूझा तो अपने कमरे में आकर निढ़ाल पर गई| उसे वह दिन याद आया जब उसे इस अस्पताल में नौकरी मिली थी| कितनी खुश हुई थी| पिता का सपना पूरा हुआ था| उसने भी पढाई में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी, तभी प्रवेश परीक्षा उतीर्ण कर कॉलेज का मुहँ देखना नसीब हुआ था| सालों की पढाई, फिर नौकरी| पर यहाँ तो सर मुंडाते ही ओले पर गए| कोरोना क्या आया, मानो साक्षात् काल ही आ गया| उसका सर दर्द होने लगा| उसने दोनों हाथों से अपना सर थाम लिया|

तभी जोरों से किसी के बर्तन पीटने की आवाज़ सुनाई दी| संभावना को लगा जैसे किसी ने उसके सर पर जोरों से वार किया हो| अचानक चारों ओर से ऐसी आवाजें आने लगी| वह खिड़की पर आई| पूरा शहर डॉक्टरों के सम्मान में ताली-थाली बजा रहा था|

Saturday, January 8, 2022

पथ का विचार

वह पथ क्या, जिस पथ पर, दौड़ा हर कोई सरपट

उबड़ खाबड़ ना, पथरीला ना, चिकना जैसे पनघट

संभल पथिक, ये उर्ध्वाधर सी राह पतन को जाती है

कदम जमा, और हाथ बढ़ा, ईश्वर ही तेरा साथी है।


Saturday, September 4, 2021

भूख या वफादारी?

 

गली का कुत्ता

भागकर दबोचता

कभी चिड़िया को

कभी चूहों को


भूखे कुत्ते को

गली का सेठ

रोटी देता है

कुत्ता दुम हिलाता है।


रोटी देख कर

कुत्ता, जो भूखा है

दुम हिलाता है

सेठ इसे वफादारी समझता है।


चोर आता है

कुत्ते को रोटी देता है

कुत्ता दुम हिलाता है

वफादारी? या भूख?


चोर जानता है

कुत्ता भी जानता है

भूख अलग है।

वफादारी अलग है।


सेठ सोचता है

अब भी, कि ये कुत्ता

मेरा वफादार है, पर

कुत्ता भूख का यार है।


उसे तो बस, भूख

मिटाने से प्यार है

सेठ समझता नही, शायद

उसे दुर्घटना का इंतजार है।


Wednesday, September 1, 2021

दीवारें

 सुना है, दीवारों के भी कान होते हैं

तो खुद से भी बातें, न किया करो

कहीं सुन न ले, तुम्हारी सब बातें


पर मेरी ये बात, नही मानना तुम

दीवारें शायद सुन लें तुम्हारी बातें

पर वो कभी कहेंगी नही किसी से


तुम्हारा दर्द महसूस करेंगी, रोएँगी

खुशी में तुम्हारी, साथ मुस्कराएँगी

छुपा लेंगी तुम्हारी तरह राज तुम्हारे